पूजीकरण के सिद्धान्त , लागत का सिद्धान्त - Capitalization Theory, Cost Theory

पूजीकरण के सिद्धान्त , लागत का सिद्धान्त - Capitalization Theory, Cost Theory

सामान्यतः पूंजीकरण की आवष्यकता दो स्थितियों में आती है। व्यावसाय / कंपनी सुरू कर प्रस्थापित करते वक्त एवं चालू व्यावसाय / कपनी में विकास तथा बदलाव करते वक्त व्यवसाय / कंपनी सुरू करते वक्त पूजीकरण सुरू से किया जाता है एवं भविष्य में जरूरतों की संभावना अनुभव के आधार पर की जाती है। दोनो ही स्थिती में पूंजीकरण की निधी का निर्धारण बड़े कौश्यल्य से एवं सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। पूंजी के कुल नीधि का निर्धारण दो माध्यमों से किया जाता है। इन दो माध्यमों को ही पूंजीकरण के सिद्धान्त कहते है, जिसका वर्णन आगे किया गया है।


लागत का सिद्धान्त


व्यवसाय / कपनी सुरू करते समय स्थायी सम्पत्तियों जैसे, यंत्र, मशीनरी, जमीन, विस्हींग इत्यादी वस्तुओं में विनियोग की आवश्यकता होती है, तथा व्यवसाय प्रवर्तन एवं सूसंचालन सगठन हेतु विभिन्न खर्च करने पडते है। दिन प्रतिदिन में व्यवसायीक व्यवहारों के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है। इन विभिन्न मामलों पर की जाने वाली लागत का कुलयोग करने पर व्यवसाय / कंपनी के पूजीकरण की राशी ज्ञात होती है। सिद्धान्त के अनुसार व्यवसाय / कंपनी का पुजीकरण उसके विभिन्न मामलों पर अनुमानित लागत के आधार पर किया जाता है। 


लागत के पूजीकरण की कुल राशी = स्थायी सम्पत्तियों में अनुमानित विनियोग राशी + कार्यशिल पूजी लागत + व्यवसाय स्थापना की लागत + व्यवसाय में बदलाव की लागत


पूजीकरण का यह सिद्धान्त तर्क संगत जान पड़ता है, क्योंकी किसी भी व्यवसाय को सुरू करते समय पूंजी की मांग सम्पत्तियों को खरेदी करने के लिए पड़ती है, तथा व्यवसाय के सुचारू संचालन हेतु पड़ती है। इस कारण लागत के आधार व्यवसाय / कपनी का पूजीकरण करना युक्तीसंगत होता है।


लगत का सिद्धान्त में व्यवसाय / कंपनी के आय प्राप्ती की क्षमता का विचार नहीं किया जाता जिससे व्यावसाय / कंपनी के वास्तविक मुल्य को प्रदर्शित करना पूर्णतः असंभव होता है, जो की पूंजीकरण का मूख्य उद्देश्य है।