रोकड़ प्रवाह प्रबंध - cash flow management

रोकड़ प्रवाह प्रबंध - cash flow management


वित्तीय प्रबंधन की कुशलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह रोकड़ प्रवाह का प्रबंध कितनी कुशलता के साथ करता है। रोकड़ का प्रवाह अंतर्वाह तथा वहिर्वाह होता है। अतः प्रबंधक को दोनों में उचित सामजस्य बनाकर रखना चाहिए। उसका यह प्रयास होना चाहिए कि रोकड़ का अंतर्वाह अधिकतम हो तथा उसका वहिर्वाह न्यूनतम हो। इसके लिये रोकड़ की वसूली समय पर होनी चाहिए तथा उसका संवितरण विलम्ब से होना चाहिए। इसके दो भागों में बाँटा जा सकता है


अ) अंतर्वाह को अधिकतम करना (Maximisation of cash inflows) रोकड़ में अंतर्वाहों को अधिक से अधिक करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए -


1) एकल बैंक खाता (Single Bank Account)- फर्म को चाहिए कि यदि उसके खाते कई बैंकों में खुले हो तो उसे एक ही बैंक में खाता रखना चाहिए तथा अन्य बैंको के खातो को बन्द कर देना चाहिए।

इससे एक ही स्थान पर अंतर्वाह होगा और उसकी जानकारी होती रहेगी।


2) ताला - संदूक प्रणाली अपनाना (Adoption of lock box system) – इस प्रणाली के अंतर्गत फर्म अपने प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर डाकघरों में ताला लगा संदूक किराये पर ले लेती है। क्षेत्र-विशेष के ग्राहकों को यह निर्देश दे दिया जाता है कि वे अपने चैक उसी ताला लगे संदूक में ही जमा कर दें। फर्म द्वारा अधिकृत व्यक्ति उस संदूक को खोलकर सभी चैकों को अपने बैंक में जमा कर देता है इससे समय की पर्याप्त बचत होती है और शीघ्रता से वसूली केन्द्रित ढंग से हो पाती है।


3) विकेंद्रित वसूली केंद्र (Decentralised collection centre) इसके लिये फर्म को विभिन्न व्यापारिक केंद्रों के लिये अलग-अलग संग्रहण या वसूली केंद्र स्थापित करने चाहिए ग्राहक या देनदार जिनसे रूपया वसूल किया जाना हो अपने भुगतान को अपने पास के केंद्र में जाकर रूपया या चैक से देते हैं।

उस केंद्र विशेष के व्यवस्थापक ग्राहकों से प्राप्त धनराशि को बैंक में शीघ्र ही जमा करा देते हैं। इस प्रकार से प्रधान कार्यालय में ही वसूली राशि प्राप्त करने के स्थान पर कई विकेंद्रित केंद्रों में इस प्रकार की व्यवस्था करके समय व लागत दोनों में कमी करते है और तेजी के साथ वसूली संभव हो पाती है।


4) चैकों की प्राप्ति के लिये शीघ्र व्यवस्था ( Quick arrangement for receipt of cheque) बड़ी फर्मे विभिन्न माध्यमों के सहारे, शीघ्रातिशीघ्र चैक को प्राप्त करने की व्यवस्था करती है। इसके लिये, कूरियर सेवा प्रत्यक्ष वसूली, स्पीड पोस्ट, हवाई डाक आदि माध्यमों का प्रयोग किया जा सकता है।


5) इलेक्ट्रॉनिक हस्तांतरण (Electronic transfer) वर्तमान में कोर बैंकिंग सेवा के माध्यम से बैंक धनराशि का इलेक्ट्रानिक हस्तातरण कर देती है। बिना विलम्ब किये इस प्रकार धनराशि फर्म के खाते में जमा हो जाती है। इसमें समय की अत्यधिक बचत हो जाती है तथा इसका चार्जेज भी बहुत कम लिया जाता है।


ब) रोकड़ वहिर्वाहों को न्यूनतम करना (Minimisation of cash outflows) भुगतान के लिये रोकड वहिर्वाहों को न्यूनतम करने के लिये निम्न उपाय अपनाने चाहिए -


1) केंद्रित भुगतान केंद्र (Centralised Disbursement Center) इसके लिये फर्म भुगतान के लिये केवल मुख्यालय से ही सारी व्यवस्था करती हैं। भुगतानों में देरी करने का यह लोकप्रिय तरीका है, जब फर्म अपने मुख्यालय से देरी से चैक निर्गमित करती है तो उसे ग्राहक के पास पहुंचने में समय लगता है।

साथ ही ग्राहक के बैंक द्वारा वसूली में भी समय लगता है। इस समय अंतराल का लाभ फर्म को मिल जाता है। इसे कार्यवाही समय (Floating Time ) कहते हैं।


2) शीघ्र भुगतान का टालना (Avoidance of early payments) - फर्म को चाहिए कि वह भुगतान में शीघ्रता न करें। माल क्रय करने के लिये पूर्तिकर्ता से अधिक से अधिक समय का उधार लेना चाहिए। साथ ही नकद क्रय के स्थान पर उधार क्रय ही करना चाहिए। इस प्रकार भुगतान के लिये कुछ समय मिल जाता है।


3) नकद कटौती का लाभ न लेना (Leaving cash discount) यदि फर्म नकद माल क्रय करती है तो उसे इसके लिये नकद छूट मिल सकती है।

परंतु फर्म को चाहिए कि वहिर्वाह रोकने के लिये नकद छूट के लाभ को न लेकर उधार ही क्रय करना चाहिए। इससे नकद वहिर्वाह कम होगा।


4) तरण का लाभ लेना (Taking advantage of float) चैक के लिखने तथा उसके भुगतान के समय में जो अंतराल होता है इस अंतराल को ही तरण कहते हैं। यदि फर्म ने चैक 01 अप्रैल को लिखकर दिया, तो प्राप्तकर्ता उसे अपने बैंक में जमा करेगा। उसे भुगतान लेने में मान लीजिये उसे 25 दिन लग जाते हैं तो इस अंतर को लाभ उठाकर फर्म इस धन का समुचित उपयोग कर सकता है। इस प्रकार से तरण का सही अनुमान लगाकर उसे उपयोगी ढंग से विनियोजित करके अपनी अर्जन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।