जाति व्यवस्था - Caste System
जाति व्यवस्था - Caste System
अम्बेडकर ने समाज के एक बड़े समूह को समस्त मानवीय अधिकारों, स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व, आत्मसम्मान, आत्माभिव्यक्ति, भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति से वंचित करने के लिए जाति व्यवस्था को उत्तरदायी माना। उन्होंने गहन अध्ययन तथा विश्लेषण द्वारा जाति व्यवस्था की उत्पत्ति, प्रकृति, विशेषताओं और कमजोरियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक जाति व्यवस्था कायम रहेगी, भारतीय समाज न तो समानता पर आधारित रह सकता है और ना ही ऐसी व्यवस्था में व्यक्ति को अपने प्राकृतिक मानवाधिकार ही हासिल हो सकता है। सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए काम करने वाले तत्कालीन समाज सुधारकों के दृष्टिकोण से अम्बेडकर की विचारधारा का फर्क इस आधार पर था कि अन्य समाज सुधारकों (राजाराममोहन राय, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, रानाडे, फुले) ने विद्यमान कुरीतियों विधवा पुनर्विवाह निषेध, नारी अशिक्षा, बाल विवाह, अस्पृश्याता आदि का समान रूप से विरोध करते हुए इस क्षेत्र में सुधार के लिए प्रचार का कार्य किया। जबकि अम्बेडकर का मानना था कि समस्त कुप्रथाओं और असमानताओं की जड़ जाति व्यवस्था है। अतः यदि जाति व्यवस्था समाप्त हो जाए तो समानता पर आधारित हिन्दू समाज का पुनर्निर्माण संभव हो सकता है। जाति व्यवस्था कोई मूर्त इमारत या वस्तु नहीं है, जिसे तोड़कर तुरंत नई इमारत खड़ी की जा सके। जाति ईटों की दीवार या कांटेदार तारों की लाइन जैसी वस्तु नहीं है, जो हिन्दुओं को आपसी मेल मिलाप से रोकती हो, जाति तो एक धारणा है और यह एक मानसिक स्थिति है।
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