संविलयन एवं अधिग्रहण के उत्प्रेरक तत्व - Catalysts of Mergers and Acquisitions

संविलयन एवं अधिग्रहण के उत्प्रेरक तत्व - Catalysts of Mergers and Acquisitions


संविलयन एवं अधिग्रहण के कई उत्प्रेरक या उनको प्रभावित करने वाले घटक है। उनके प्रमुख प्रेरकों को निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:


(1) वित्तीय उत्प्रेरक


(2) रणनीतिक उत्प्रेरक


(3) सहक्रियात्मक उत्प्रेरक


(4) संगठनात्मक उत्प्रेरक


इनका वर्णन अग्रलिखित है-


(1) वित्तीय उत्प्रेरक (Financial Motives) - विलयन तथा अधिग्रहण करने वाली कंपनियों को वित्तीय संबंधी उत्प्रेरणा अधिक प्रभावित करती है। ये वित्तीय उत्प्रेरक, संक्षिप्त में, निम्नलिखित हो सकते है:


(क) कोष को अधिक प्राप्त करने की क्षमता विकसित करना।


(ख) अतिरिक्त कोष को अधिक लाभप्रद क्षेत्र में लगाना।


(ग) संविलयन के पश्चात् आय बढ़ाकर प्रति अंश अर्जन में तथा बाजार के हिस्से (market share) में वृद्धि करना।


(घ) परिचालन संबंधित मितव्ययिता का लाभ उठाना।


(ड.) कर संबंधी नियोजन करना।


(च) अंशधारियों के मूल्यों का सृजन करना।


(2) रणनीतिक उत्प्रेरक (Strategic Motives) प्राय: कंपनियाँ रणनीतिक योजना के तहत अनेक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु संविलयन एवं अधिग्रहण करती हैं। इस संबंध में कुछ प्रमुख उत्प्रेरक निम्नलिखित हो सकते है।


(क) बड़े पैमाने की मितव्ययिता का लाभ उठाने के लिये, रणनीतिक योजना के तहत कंपनियाँ अधिग्रहण व संविलयन कर सकती हैं। 


(ख) कंपनी के विस्तार करके विकास की ओर अग्रसर करने के लिये भी इस प्रकार से रणनीतिक योजना तैयार करके संविलयन किया जा सकता है।


(ग) बाजार में भागीदारी बढ़ाने की दृष्टि से भी इसे अपनाया जा सकता है। 


(घ) प्राय: कंपनियाँ बाजार में अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिये भी अधिग्रहण करती है। 


(ड.) नये उत्पाद को बाजार में स्थापित करने के लिए भी इसे अपनाया जा सकता है।


(च) अपने वित्तीय तथा अन्य संसाधनों को बढ़ाने के लिये रणनीतिक दृष्टि से संविलयन किया जा सकता है।


(छ) बाजार के जोखिमों को तथा अच्चावचन के प्रभावों को न्यूनतम करने के लिये भी यह रणनीति अपनाई जा सकती है।


(ज) विभिन्नीकरण तथा स्थिरता लाने की दृष्टि से इस तरह की रणनीतिक योजना अपनाई जा सकती है।


(3) सहक्रियात्मक उत्प्रेरक (Synergy Motive) - प्राय: कंपनियाँ सहक्रियात्मक लाभ (Synergy Profit) प्राप्त करने के लिये भी संविलयन तथा अधिग्रहरण की नीति अपनाती हैं। सहक्रियात्मक का तात्पर्य उस संयोजित प्रभाव से है जो दो या अधिक क्रियाओं को जोड़ने पर उनके व्यक्तिगत प्रभाव के योग से अधिक हो। यदि 'अ' कंपनी 'ब' कंपनी का संविलयन होता है तो दोनों के संविलयन का मूल्य इन अलग-अलग कंपनी के मूल्य के योग से अधिक होगा सूत्र के रूप में।


{V (A) + V (B)} <V (AB)


यहां पर


V(A) है 'अ' कंपनी का स्वतंत्र मूल्य


V(B) है 'ब' कंपनी का स्वतंत्र मूल्य


V(AB) है दोनों के संविलयन के पश्चात् मूल्य


इस तरह से जो यह अधिक मूल्य प्राप्त होगा तो संविलित इकाईयों प्रति अंश अर्जन से (Earning per share) में वृद्धि होगी।


संविलयन तथा अधिग्रहण की दशा में निम्नलिखित सिनर्जी प्राप्त हो सकती है :-


(अ) पूँजी के एकत्र करने में अधिक सुविधा होगी तथा संविलयन कंपनी के वित्तीय तथा अन्य संसाधनों में वृद्धि संभव हो सकेगी।


(ब) ऋण लेने की क्षमता में भी वृद्धि हो सकती है।


(स) पूँजी की लागत में अपेक्षाकृत कमी हो सकेगी।


(द) बैंकों, वित्तीय संस्थाओं तथा अन्य व्यापारियों से अधिक सुविधा के साथ-साथ में वृद्धि हो सकेगी।


(य) प्रति अंश अर्जन तथा मूल्य में वृद्धि की संभावना बढ़ सकेगी।


(4) संगठनात्मक उत्प्रेरक (Organizational Motive) - निम्नलिखित हैं: कुछ महत्वपूर्ण संगठनात्मक उत्प्रेरक है।


(अ) संविलित कंपनियों का प्रबंध और कुशल करने के लिये भी संविलयन एवं अधिग्रहण किया जा सकता है।


(ब) अकुशल प्रबंधकों हटाने की दृष्टि से भी इससे संबंधित योजना को अपनाया जा सकता है।


(स) अकुशल प्रबंधकों को हटाने की दृष्टि से भी इससे संबंधित योजना को अपनाया जा सकता है।


(द) प्रायः उच्चस्तर के प्रबंधक अपनी मौद्रिक शक्ति (Money power) को बढ़ाने के लिये भी इस योजना को अपनाते है।


(य) योग्य प्रबंधकों (Talent ) को संस्था में ही रोके रखने के लिये भी संविलयन को अपनाया जा सकता है।