सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की चुनौतियां - Challenges of Continuous and Comprehensive Evaluation

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की चुनौतियां - Challenges of Continuous and Comprehensive Evaluation


सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में शैक्षणिक प्रक्रिया का ऐसा ताना-बाना बुना जाना है, जिसके केन्द्र में बच्चा हो। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को समझने की है। साथ ही यह भी समझना है कि दरअसल बच्चे अपने आसपास की दुनिया के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। वे सहज रूप से अपने आसपास की दुनिया से अंतःक्रिया करके ज्ञान का निर्माण करते हैं। शिक्षक को सबसे पहले यह करना है कि वह इस प्रक्रिया को समझे और उसमें हिस्सेदार बनने की कोशिश करे। साधारणतया माना जाता है कि किसी बच्चे को अगली कक्षा में जाने से रोकना और फेल करना ठीक है। लेकिन यह बात शिक्षाशास्त्र की अवधारणाओं की दृष्टि से सही नहीं है। जब बच्चा स्वभाविक प्रक्रिया में सीख रहा है तब उसे फेल करने या कक्षा में रोके रखने का औचित्य स्पष्ट नहीं होता। बच्चों को इस तरह के अवसर देना जरूरी है कि वह सीखकर अगली कक्षा में पहुँच सकें। कई बार शिक्षक इसे एक कार्यक्रम के तौर पर देखते हैं जो अभी आया है और कल खत्म हो जाएगा। कई शिक्षक इस पर भी यकीन करते हैं

कि यह पहले से चला आ रहा है और जब वह स्वयं पढ़ाई करते थे तब भी सतत एवं व्यापक मूल्यांकन होता था, इसलिए यह नई बोतल में पुरानी शराब है। कई शिक्षक इसे ऐसे भी समझते हैं कि परम्परागत परीक्षाओं को सतत और व्यापक मूल्यांकन की परीक्षाओं से बदल दिया गया है। कई शिक्षक इसे ऐसे भी देखते हैं कि सीसीई आ गया जैसे कि शिक्षकों पर नजर रखने वाला कोई तंत्र हो। आमतौर पर शिक्षक मानते है सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की प्रक्रिया वैचारिक रूप से अच्छी है। मगर उन्हें यह चुनौतीपूर्ण लगता है कि इस प्रक्रिया को व्यवहारिक रूप कैसे दिया जाए? इसके साथ यह भी चुनौती है कि कहीं यह प्रक्रिया यांत्रिक बनकर न रह जाए। अन्य एक बाधा इसकी सामाजिक स्वीकृति की भी है। लंबे समय से शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के आकलन के परम्परागत तरीके रहे हैं। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन इन पुरानी पद्धतियों में वांछित सुधार करने का एक प्रभावशाली तरीका है। इसको आत्मसात करते हुए अपनाने का अर्थ यह है कि हम मूल्यांकन की परम्परागत प्रणाली को उसके नए स्वरूप में अपना रहे हैं। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, बच्चों के मूल्यांकन की प्रक्रियाओं में मूलभूत सुधार करते हुए सीखने-सिखाने की बात करता है।

इसके क्रियान्वयन के लिए सरल और सहज उपकरण/शैक्षणिक साधनों एवं तकनीकों की जानकारी जरूरी है। साथ ही उनका रिकार्ड रखना या दस्तावेजीकरण करना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के अन्तर्गत बच्चों के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जाना है। इसके लिए समूह में कार्य करना, बाल मेला, प्रोजेक्ट कार्य, पोर्टफोलियो, सृजनात्मक कार्य, अभिव्यक्ति के अवसर देने होंगे और बच्चों की प्रगति के बारे में इनसे क्या-क्या सूचनाएं मिलती हैं. उन्हें सजगता के साथ देखना होगा।


सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में शिक्षकों की तैयारी के साथ पूरे शिक्षा तंत्र की तैयारी महत्त्व रखती है। यह तैयारी स्पष्ट नजरिए की मांग करती है। अक्सर शिक्षक यह चिंता प्रकट करते हैं कि वे किसी प्रक्रिया को उसके वास्तविक मायनों के साथ काम अपना रहे होते हैं, किंतु जब प्रशासनिक अमले या अकादमिक सहयोग एवं व्यवस्था के लोग विद्यालयों में जाते हैं तो वे इस काम को मान्यता देने के बजाय कई बार शिक्षक साथियों को हतोत्साहित करते हैं।

कभी-कभी तो प्रधानाध्यापकों और अन्य साथियों से ही ऐसे कामों को समर्थन नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह होती है कि आकलन को बच्चों के सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से अलग काम या कार्यक्रम के रूप में देखने का नज़रिया हावी रहता है। यदि इस प्रक्रिया को विद्यालयों की प्रक्रिया से अलग करके देखा-समझा जाता है तो यह काम बोझ जैसा लगेगा। ऐसे में इसके असल मायने गुम हो जाते हैं और यह प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह जाती है इसलिए व्यवस्था की तैयारी का मुद्दा महत्त्व का है। इसके साथ ही विद्यालय में शिक्षक-छात्रा अनुपात, बच्चों की बैठने की उचित व्यवस्था तथा शिक्षण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी महत्त्वपूर्ण है। इस पूरी प्रक्रिया में अंकों और ग्रेड से हटकर बच्चे को संकेतकवार टिप्पणियों के रूप में फीडबैक साझा करने की प्रक्रिया विकसित की गई है। टिप्पणी लिखना और फीडबैक साझा करना यह इस प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। टिप्पणी लिखना एक कठिन कार्य है। शिक्षक स्वयं यह मानते हैं कि यह एक नया काम है। सामान्यतः शिक्षकों की टिप्पणियां बहुत अच्छा', 'अच्छा', 'सुधार की आवश्यकता है'

आदि के रूप में हुआ करती थीं। इन टिप्पणियों का स्वरूप बिवरणात्मक और सकारात्मक हो. इस पर अब शिक्षक समूह में समझ बन रही है। इन टिप्पणियों को लिखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। टिप्पणियों को देने में खासतौर से तब दिक्कत आ रही है जब बच्चे उस अवधारणा को नहीं जानते हैं या अगर सही में कहें तो शिक्षक जिन बच्चों को पहले फेल कर देते थे। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, सीखे हुए का मूल्यांकन" के बजाय सीखने के लिए मूल्यांकन" की पैरवी करता है। समाज में परीक्षा को लेकर गलतफहमी की जड़ें इतनी गहरी जमी हुई हैं कि उन्हें आसानी से उखाड़ फेंकना संभव नहीं। कई अभिभावकों ने विद्यालयों में आकर इस तरह के प्रश्न पूछा कि परीक्षाएं क्यों नहीं हो रही हैं? अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे परीक्षाओं में न केवल पास हों बल्कि अच्छे से अच्छे अंक अर्जित करें। उन्हें इस बात की परवाह या जानकारी नहीं होती कि बच्चों को क्या आता है। निश्चित ही यह एक द्वंद है। हम मानते हैं कि ये जड़ें धीरे-धीरे कमजोर होंगी। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन बच्चों को फेल और पास के खांचों में बांटने को ठीक नहीं मानता है। आज के दौर में हम जहां शिक्षा के लोकव्यापीकरण की बात कर रहे हैं, वहीं कुछ बुनियादी समस्याएं बनी हुई हैं जो बच्चों को शिक्षा से वंचित रखती है। हमें मिलकर इन समस्याओं के हल भी खोजने होंगे।