सामाजिक संघर्ष की चुनौतियाँ और शांति स्थापना - Challenges of Social Conflict and Peacebuilding

 सामाजिक संघर्ष की चुनौतियाँ और शांति स्थापना - Challenges of Social Conflict and Peacebuilding


आज देश सामाजिक कुरीतियों, सांस्कृतिक धरोहर के प्रति नफरत, भाषावाद, जातिवाद, प्रातीयता, साम्प्रदायिकता व विविध संकीर्ण भावनाओं के चंगुल में बुरी तरह फंसा प्रतीत होता है। जितना ही हम स्थिति सुधारने हेतु प्रयत्न करते हैं उतना ही अधिक हम और उलझतेजाते हैं। लोगों में परम्पर प्रेम, स्नेह, सहानुभूति सहयोग, ईमानदारी, सहिष्णुता, उदारवादिता, आत्म-सम्मान, कर्तव्यनिष्ठा, विवेकशीलता, विनम्रता तथा आत्मानुशासन में कमी दिखाई देने लगी है। अनैतिक आचरण करने से लोगों का परहेज धीरेधीरे समाप्त होता जा रहा है। हिंसा हमारे जीवन में प्रवेश कर चुकी है व बाहु बल सम्पन्नमानव, संस्कृति व मूल्यों के कुचलने का कुचक्र रच रहे हैं। लोग आलसी होते जा रहे हैं. दूसरों का हिस्सा छीनकर स्वयं ले रहे हैं, बेईमानी करके पैसा बटोरना उनके व्यवहार में शामिल हो गया है, पड़ोसी की भूख प्यास, कठिनाइयाँ, विपत्तियों, कष्टों बीमारी व अशिक्षा से उन्हें कोई सरोकार नहीं रहता। अमानवीय प्रवृति के लोग संपूर्ण समाज के मूल्यों को दूषित व नष्ट करने में गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। कैसी विडम्बना है किमनीषियों के भारत के नागरिकों का जमीर, अंतःकरण व आत्मा सुषुप्त व असहाय अवस्था में सोई हुई है। इस अवस्था में मानव को पहुंचाने का श्रेय घर तथा समुदाय को जाता है। अन्याय, अशांति, संघर्ष व अलगाव के युग के अंत के लिए यह जरूरी है कि समाज के सदस्य बच्चों में मूल्यों को विकसित करने हेतु प्रयास करें तथा विद्यालय में मिलने वाली मूल्य शिक्षा के समर्थन हेतु उपयुक्त वातावरण का निर्माण करें।