आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की चुनौतियां - Challenges of tribal and nomadic women
आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की चुनौतियां - Challenges of tribal and nomadic women
भारत में निवास करने वाले लगभग 84 मिलियन आदिवासी गरीबी, अशिक्षा बेरोजगारी, विस्थापन, कर्ज तथा सरकारी कार्यक्रमों के बारे में जानकारी और पहुँच के अभाव में आज भी निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में हैं, जिनके कारण उन्हें अनगिनत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्हें शोषण और हिंसा का शिकार होना पड़ता है। आदिवासी स्त्री के लिए यह परिस्थितियाँ और भी विकट हो जाती हैं। उन्हें दोहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता है- पहला, स्त्री होने के नाते और दूसरे, आदिवासी स्त्री होने के नाते।
आदिवासी स्त्रियों की समस्याओं और चुनौतियों को सामाजिक- सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलूओं से समझा जा सकता है।
1. सामाजिक-सास्कृतिक चुनौतियाँ
जैसा कि हमने देखा कि आदिवासी समुदायों में यद्यपि कि शिक्षा का स्तर पहले की तुलना में सुधरा है, फिर भी स्त्रियों की साक्षरता दर केवल 34.8% ही है।
बाल-विवाह का प्रचलन नहीं रहा है। परंतु बाहरी ('सभ्य) समाज के संपर्क में आने के बाद से उनमें भी बाल-विवाह के मामले देखे गए हैं। ऐसी स्थिति में लड़कियाँ कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं, जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है।
बाहरी समाज (खास कर हिंदू एवं ईसाई) के संपर्क में आने के कारण इन समुदायों में पितृसत्तात्मक नियम और कड़े हो गए हैं, जिसकी वज़ह से स्त्रियों की यौन शुचिता और चरित्र को लेकर समुदाय के सदस्यों का रवैया ज्यादा कड़ा हो गया है, जैसा पहले नहीं था।
रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण आदिवासी समुदायों का शहरों की तरफ अशंकालिक या स्थायी प्रवसन (माइग्रेशन) उनके पारंपरिक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पारिवारिक संबंधों पर तथा आस-पड़ोस के रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। उन्हें अपने सांस्कृतिक मूल्य त्याग कर नए शहरी सांस्कृतिक मूल्यों को ग्रहण करने पर बाध्य होना पड़ता है।
2. आर्थिक चुनौतियाँ
आदिवासी स्त्रियों का बड़ा आर्थिक आधार जंगल से जुड़ा है। यह उनके लिए रोजी रोटी का जरिया 'से है। 1952 में सरकार ने पहली बार औद्योगिक विकास को ध्यान में रखते हुए वन नीति को जारी किया, जिसमें जंगल के एक हिस्से को व्यावसायिक तौर पर कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल की बात कही गई। यहीं से स्थानीय निवासियों खासकर आदिवासी स्त्रियों और सभ्य समाज के आर्थिक हितों के बीच टकराहट शुरू हुई। 1988 में फिर भारत सरकार एक वन नीति लेकर आई, जिसमें आदिवासियों को समस्या की जगह समाधान के रूप में देखा गया। हालांकि तेज आर्थिक विकास के नज़रअंदाज ने जंगल पर आधारित आदिवासियों की जीवन से जुड़ी अर्थव्यवस्था नज़रअंदाज होने लगी। सरकार की विकास परियोजनाएँ, सरकारी और निजी औद्योगिक इकाईयों की स्थापना, खनन, हाइड्रो इलेक्ट्रिक तथा सड़क और परिवहन की परियोजनाओं के चलते कुछ मामलों में उन्हें अपने जंगल और जमीन से अलग होना पड़ा। समय के साथ आदिवासी स्त्रियों एक बड़ा हिस्सा अपना गाँव-घर छोड़ कर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की तरफ जाने ( प्रवसन या माईग्रेशन) के लिए बाध्य होने लगे।
आदिवासी समुदायों की एक बड़ी आर्थिक समस्या कर्ज की है।
अपने छोटे-बड़े खर्चों को पूरा करने के लिए (शादी में वधू-मूल्य चुकाने, गाँव को खुशी या दंड स्वरूप भोज देने आदि) उन्हें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता है। अशिक्षित होने के नाते वे कभी भी यह नहीं जान पाते कि कितना कर्ज चुकाया है और अभी कितना बकाया है, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार अपने जमीन जाएदाद पर साहूकार को अधिकार देना पड़ता है या कर्जदाता के यहाँ बंधुआ मज़दूर की तरह कार्य करना पड़ता है, या फिर अपने घर की स्त्रियों को बेचना या वेश्यावृत्ति के धंधे में लगाना पड़ता है (हसनैन, 2002)। इस तरह न चाहते हुए भी स्त्रियाँ आर्थिक तंगी के चलते वेश्यावृत्ति के कुचक्र में फंस जाती हैं।
विकास परियोजनाओं के चलते आदिवासी समुदायों का विस्थापन भारत में एक आम बात हो गई है, क्योंकि जगंल, खदान आदि आदिवासी बहुल इलाकों में ही हैं। जैसा कि हमने पहले पढ़ा है कि आदिवासी स्त्रियाँ इन जगलों से कंद-मूल फल के अलावा ईंधन के लिए लकड़ियाँ भी लाती है अतः जंगल से बेदखल होने का अर्थ होता है अपनी रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले संसाधन से दूर हो जाना। ऐसे में अपनी जीविका चलाने के लिए उन्हें वेश्यावृत्ति का सहारा लेना पड़ता है।
3. राजनितिक चुनौतियाँ
चाहे मातृसत्तात्मक समाज हो, चाहे फिर पितृसत्तात्मक समाज, आदिवासी समाज में स्त्रियों को घर के स्तर पर भले ही सत्ता प्राप्त हो पर सामुदायिक स्तर पर उन्हें पारंपरिक रूप से कोई भी राजनैतिक अधिकार नहीं हैं। वे न तो समुदाय की बैठकों की मुखिया हो सकती हैं और ज्यादातर समुदायों में तो वे इन बैठकों में भागीदारी भी नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में स्त्री से संबंधित विशेष मुद्दों पर भी निर्णय लेने का अधिकार समुदाय के पुरूषों का होता है।
हालांकि 73वें संविधान संशोधन में पंचायतों में स्त्रियों की भागीदारी अनिवार्य कर दी गई है परंतु ऐसा देखा गया है कि पंचायत की सदस्य होने के बाद भी आदिवासी महिलाएँ पंचायत की बैठकों में नहीं आती हैं (भसीन, 2007 )
ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि गरीबी और असुरक्षा की भावना से स्वतंत्र होने पर ही एक स्त्री खुशहाल और स्वस्थ रह सकती है (दासगुप्ता, 20001, सेन, 2002)। फिर भी, भारत के विभिन्न आदिवासी समुदायों के तमाम पहलुओं (सांस्कृतिक-सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक) का अध्ययन करने के बाद यह पाया गया है कि भले ही सभ्य समाज की स्त्री की तुलना में आदिवासी स्त्री की स्थिति कुछ हद तक बेहतर हो पर इन समाजों में भी स्त्री की परिस्थिति (स्टेटस) पुरुषों की तुलना में निम्न ही है। हाल के अध्ययन तो बताते हैं कि नव-उपनिवेशवाद, जाति समूहों एवं मिशनरी से संपर्क, औद्योगीकरण, राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण आदिवासी समुदायों में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। इसके परिणामस्वरूप उनमें सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन हो रहे हैं, जो उनके सामाजिक संरचनाओं में बदलाव ला रहे हैं, जिससे स्त्रियों की स्थिति और भी खराब हो गई है।
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