बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ - Characteristics of Buddhist Education
बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ - Characteristics of Buddhist Education
1) शिक्षा प्रणाली:- वैदिक कालखंड में गुरुकुल में तथा बौद्ध कालखंड में माव विहारों में शिक्षा प्रदान की जातो थो प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक शिक्षा प्रदान की जाती थी शिक्षा के द्वार समान रूप से सभी समुदायों के लिए खुले थे।
2) संस्कार:- बौद्धकालीन शिक्षा में दो प्रमुख सरकार थ
1. पबज्जा संस्कार
2. उपसंपदा संस्कार
1) पबज्जा संस्कार:- बौद्ध काल शिक्षा की शुरुआत पबज्जा संस्कार से होती है। पब का शाब्दिक अर्थ है बाहर जाना। इस संस्कार का अभिप्राय था कि बालक अपने परिवार और पूर्व स्थिति का परित्याग करके, संघ में प्रवेश करता था। मठ के सबसे बड़े भिक्षु दवारा यह संस्कार कराया जाता था।
विनय पिटक के अनुसार छात्र सिर के बाल मुंडवाकर पीले वस्त्र धारण करके प्रवेश करने वाले मन के ओिं के चरणों को अपने मस्तक से स्पर्श करता था और पालथी मार के बैठकर तीन बार बुद्धम् शरणं गच्छामि, धम्म शरणम् गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि कहता था। ऐसा करने के बाद उन्हें भ्रमण अथवा सामनेर कहा जाता था। बौद्ध मठा में शिक्षा की अवधि १२ वर्ष तक रहन की कारण इनको शिक्षा २० वर्ष म पूरी हो पाती थी।
2) उपसंपदा:- शिक्षा पूर्ण होने के बाद भावी जीवन की व्यावहारिक कुशलता के लिए बौद्ध युग में उपसंपदा संस्कार होता था यह प्रायः विद्यार्थियों के २० वर्ष की उम्र में होता था। उपसम्पदा संस्कार के समय मठ के सभी बौद्ध भियु एक निश्चित तिथि पर एक स्थान पर एकत्रित होते थे। उपसपदा के बाद श्रमण भिक्षु हो जाते थे।
(3) शिक्षा ग्रहण की आयु आठ वर्ष: साधारणत: बौद्ध कालखंड में २० वर्ष की आयु तक अध्ययन काल होता था। इसमें ८ वर्ष पबन्ता तथा १२ वर्ष उप संपदा का समय होता था।
4) वर्णाश्रम पद्धति का विरोध:- गौतम बुद्ध ने अपने काल में वर्णाश्रम पद्धति का प्रखर विरोध किया। यज्ञ के लिए पशुओं की बलि देने का विरोध किया।
(5) शिक्षण विधि:- शिक्षण विधि में व्याख्यान वाद-विवाद, पर्यटन, सूत्र, स्वाध्याय, विश्लेषण आदि प्रमुख विधियों का प्रयाग किया जाता था। मुख्यतः रटने पर बल दिया जाता था बौद्ध युग की मौखिक भाषा पाली थी। भगवान बुद्ध ने पाली भाषा का ही अपने प्रवचन का माध्यम बनाया था।
(6) पाठयक्रम:- शिक्षा का प्रमुख उद्देश निर्वाण प्राप्ति था इसलिए बौद्धकालीन शिक्षा में पाठ्यक्रमों में धर्मशास्त्रों का स्थान प्रथम था प्रमुख धार्मिक ग्रंथ त्रिपिटक था। बौद्ध कालीन शिक्षा निम्मिलिखित तीन भागों में विभाजित था-
1) प्राथमिक शिक्षा 2) उच्च शिवा 3) विनय ग्रंथ
1) प्राथमिक शिक्षा:- इसमें बालक-बालिकाओं को पढ़ना-लिखना प्रारंभिक व्याकरण, प्रारंभिक गणित तथा धार्मिक आचार की शिक्षा दी जाती थी।
2) उच्च शिक्षा:- उच्च शिक्षा में धर्मशास्त्रा की शिक्षा दो जाती थी। धार्मिक और लौकिक शिक्षा में उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम विभाजित था। धार्मिक पाठ्यक्रम केवल भिक्षुओं के लिए था।
उनका धार्मिक और जीवनोपयोगी दोनों प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। इसमें बौद्ध धर्म, साहित्य, विपिटक, विनय, धम्म आदि मुख्य धार्मिक विषय था।
जीवनापयोगी विषया में मना और विहारा के निर्माण का व्यावहारिक ज्ञान दान की सम्पति का प्रबंध और हिसाब-किताब आदि सम्मिलित थे। लौकिक पाठ्यक्रम साधारण नागरिका के लिए था। इसके पाठ्यक्रम में धर्मशास्त्र, साहित्य, तर्कशास्त्र, न्यायशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र आदि का समावेश था। अतः बौद्धकालीन शिक्षा के पाठ्यक्रम में धार्मिक, दार्शनिक एवं लौकिक विषया के समन्वय के कारण पाठ्यक्रम सर्वसुलभ, उपयोगी, व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक था।
3) विनयग्रंथ :- विनयग्रंथ का अध्ययन करना यह बौद्धकालीन पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण घटक था। भगवान गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनक उपदशा का ग्रंथरूप में संकलित किया गया। बौद्ध भिक्षु संघ विषयक नियम अर्थात विनय इस विनय के एकत्रीकरण का विनयपिटक ग्रंथ कहते है।
4) व्यावसायिक शिक्षा:- बौद्ध काल में व्यावसायिक शिक्षा पर भी जोर दिया गया था।
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