बाल्यावस्था ,विशेषताएँ - childhood characteristics
बाल्यावस्था ,विशेषताएँ - childhood characteristics
शैशवावस्था के उपरांत बाल्यावस्था आती है। 6 से 12 वर्ष की अवस्था को बाल्यावस्था कहा गया है। यह अबस्था बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की अवस्था होती है। मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस काल को मानव विकास का अनोखा काल कहा जाता है। इस अवस्था को समझ पाना कठिन होता है क्योंकि विकास की दृष्टि से यह एक जटिल अवस्था होती है। इस अवस्था में विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक सामाजिक एवं नैतिक परिवर्तन बच्चे में उत्पन्न होते हैं।
बाल्यावस्था की मुख्य विशेषताएँ
1) शारीरिक व मानसिक स्थिरता
6 या 7 वर्ष की आयु के बाद बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास में स्थिरता आ जाती है। वह स्थिरता उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को दृढ़ता प्रदान करती है। फलस्वरूप उसका मस्तिष्क परिपक्व सा और वह स्वयं वयस्क-सा जान पड़ता है। इसलिये रॉस ने बाल्यावस्था को मिथ्या परिपक्वता का काल बताया है।
2) मानसिक योग्यताओं में वृद्धि
बाल्यावस्था में बच्चे की मानसिक योग्यताओं में निरंतर वृद्धि होती है। उसकी संवेदना और प्रत्यक्षीकरण की क्षमताओं में वृद्धि होती है। वह साधारण बातों पर अधिक देर तक अपने ध्यान को केंद्रित कर सकता है।
3) जिज्ञासा की प्रबलता
बच्चे की जिज्ञासा विशेष रूप से प्रबल होती है। वह जिन वस्तुओं के संपर्क में आता है उनके बारे में हर तरह के प्रश्न पूछकर जानकारी प्राप्त करना चाहता है। ये प्रश्न शैशवावस्था के साधारण प्रश्नों से भिन्न होते हैं।
4) वास्तविक जगत से संबंध
इस अवस्था में बच्चा वास्तविक जगत की परिस्थितियों का संज्ञान लेता है। वह हर वस्तु से आकर्षित होकर उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।
5) रचनात्मक कार्यों में आनंद
बच्चे को रचनात्मक कार्यों में अधिक आनंद आने लगता है। बच्चे को साधारणतः घर के बाहर कार्य करने में रुचि होती उसके विपरीत बालिका घर में ही कोई-न-कोई कार्य करना चाहती है। जैसे सिलाई कढ़ाई करना इत्यादि ।
6) सामाजिक गुणों का विकास
इस अवस्था में बच्चे में अनेक सामाजिक गुणों का विकास होता है। जैसे सहयोग, सहनशीलता, सदभावना, आज्ञाकारिता ।
7) नैतिक गुणों का विकास
इस अवस्था के आरंभ में ही नैतिक गुणों का विकास होने लगता है उसे अच्छे-बुरे उचित-अनुचित बार्ता के बारे में समझ आती है।
8 ) बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास
शैशवावस्था में बच्चे का विकास अंतर्मुखी होता है। बाल्यावस्था में यह विकास बहिर्मुखी होता है क्योंकि शैशवावस्था में बच्चे एकान्तप्रिय और केवल अपने में ही रुचि लेने वाला होते है। बाल्यावस्था में बाहय जगत में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाती है।
9) संवेगों का दमन व प्रदर्शन
बच्चे अपने संवेगों पर अधिकार रखना एवं अच्छी और बुरी भावनाओं में अंतर करना सीख जाते है।
10 ) संग्रह करने की प्रवृत्ति
बाल्यावस्था में बच्चों में संग्रह करने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा पाई जाती है। बच्चे विशेष रूप से काँच की गोलियों, टिकटों, मशीनों के भागों और पत्थर के टुकड़ों का संचय करते है। बालिकाओं में चित्रों खिलौनो गुड़ियाँ और कपड़ों के टुकड़ों को संग्रह करने की प्रवृत्ति पायी जाती है।
11) निरुद्देश्य भ्रमण की प्रवृत्ति
बच्चे में बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर घूमने की प्रवृत्ति अधिक होती है।
12 ) काम प्रवृत्ति की न्यूनता
बच्चे अपना अधिकांश समय मिलने-जुलने, खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने में व्यतीत करता है अतः बच्चे में काम-प्रवृत्ति की न्यूनता होती है।
13) सामूहिक प्रवृत्ति की प्रबलता
इस अवस्था में बच्चे की सामूहिक प्रवृत्ति बहुत प्रबल होती है। इसलिये ज्यादा से ज्यादा समय वो दूसरे बालकों के साथ खेलने में व्यतीत करता है।
14) सामूहिक खेलों में रुचि
बालकों को सामूहिक खेलों में अत्यधिक रुचि होती है। वह 6 या 7 वर्ष की आयु में छोटे समूहों में और काफी समय तक खेलता है। खेल के समय बालिकाओं की अपेक्षा बालकों में काफी झगड़े होते है।
15) रूचियों में परिवर्तन
इस अवस्था में बच्चे की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। ये रुचियाँ स्थायी रूप धारण न करके वातावरण में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होती रहती है।
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