सीमान्त लागत का वर्गीकरण - Classification of Marginal Cost

सीमान्त लागत का वर्गीकरण - Classification of Marginal Cost


प्रारम्भिक किसी भी वस्तु के उत्पादन में प्रायः दो प्रकार के व्यय किये जाते हैं। प्रथम, वै व्यय जिन पर कुछ सीमा तक उत्पादन की इकाइयों में वृद्धि या कमी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अर्थात् उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने पर या कमी करने पर इन खचों की रकम में कोई परिवर्तन नहीं होता है। ऐसे खर्चों को स्थिर व्यय कहते हैं । द्वितीय, कुछ खर्चे ऐसे होते हैं, जो उत्पादन इकाइयों में कमी या वृद्धि होने पर कम या बढ़ जाते हैं। इन खर्चों को परिवर्तनशील व्यय या अस्थिर व्यय कहते हैं। स्थिर व्यय की यह प्रकृति होती है कि उत्पादन इकाई में बुद्धि होने पर प्रति इकाई स्थिर व्यय कम हो जाता है और इसके विपरीत दशा में बढ़ता जाता है। परिवर्तनशील व्यय सदैव प्रति इकाई एकसमान ही रहता है, चाहे उत्पादन की मात्रा में वृद्धि की गयी हो या कमी कर दी गयी हो। वर्तमान काल में यह सामान्य रूप से माना जाता है कि कुछ व्ययों के स्थिर व परिवर्तनशील व्ययों के रूप में बटवारे द्वारा लागत-नियन्त्रण व निर्णयन में पर्याप्त सहायता मिल सकती है। इस उद्देश्य के लिए जिस विधि का प्रयोग किया जाता है, उसे सीमावर्ती लागत विधि कहते हैं।


सीमावर्ती लागत विधि को उचित शब्दों में परिभाषित करना एक जटिल कार्य है। कुछ संस्थाओं में ऐसी विधि का प्रयोग किया जाता है, जिसके अन्तर्गत स्थिर व्यय और परिवर्तनशील व्यय का बटवारा तो किया जाता है, परन्तु उस विधि को सीमावर्ती लागत विधि के नाम से नहीं पुकारा जाता है। फिर यदि हम यह जान ले कि एक पूर्ण सीमावर्ती लागत विधि की मुख्य विशेषताएं क्या हैं तो हम इसकी उचित परिभाषा दे सकते हैं एक सीमावर्ती लागत विधि के दो मुख्य सिद्धान्त हैं:-


(1) सीमावर्ती लागत का निर्धारण


(2) लाभदायकता की स्थिति को दर्शाने व प्रबन्ध द्वारा निर्णय लेने में सुविधा हेतु उपर्युक्त लागतों का वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुतीकरण उक्त के अलावा एक सीमावर्ती लागत विधि की कुछ और विशेषताएं हैं जो निम्न प्रकार है 


(क) सीमावर्ती लागत को ही वस्तु की उत्पादन लागत माना जाता है। 


(ख) चालू कार्य व तैयार माल के स्कन्ध का मूल्यांकन सीमावर्ती लागत के आधार पर किया जाता है।


(ग) मूल्यों का निर्धारण सीमावर्ती लागत व दत्तांश (contribution) के आधार पर किया जाता है।


(घ) लाभ की गणना करने के लिए एक विशेष प्रकार के प्रारूप में लाभ-हानि खाता तैयार किया जाता है, जिसे सीमावर्ती लाभ-हानि खाता कहते हैं । 


(ड) लाभ की गणना एक विशेष ढंग से की जाती है। कुल बिक्री धन में से सीमावर्ती लागत को घटा देते है। शेष को दत्तांश कहते हैं। इस दत्तांश में से स्थिर व्ययों को घटाने पर शुद्ध लाभ ज्ञात होता है।


(च) उत्पादन - सीमा स्तर बिन्दु ( Break-even point) इस विधि का मुख्य अंग है। उपर्युक्त विवेचना के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सीमावर्ती लागत विधि वह विधि है जिसके द्वारा उत्पादन की इकाइयों में कमी या वृद्धि के कारण उत्पादन लागत में होने वाली कमी या वृद्धि का अध्ययन किया जाता है और परिवर्तनशील लागत को ही उत्पादन लागत का प्रमुख अश माना जाता है। यह एक ऐसी लागत विधि है जिसके अन्तर्गत उत्पादन लागत में प्रत्यक्ष सामग्री, प्रत्यक्ष श्रम व परिवर्तनशील अप्रत्यक्ष व्यय को ही शामिल किया जाता है और चालू कार्य व तैयार माल के स्कन्ध का मूल्यांकन सीमावर्ती लागत पर किया जाता है। चूंकि उत्पादन स्तर में वृद्धि या कमी करने पर परिवर्तनशील लागत ही बढ़ती या घटती है, अतः लागत विधि को उत्पादन स्तर में एक इकाई अधिक उत्पादन के कारण कुल लागत में हुए परिवर्तन को निर्धारित करने की तकनीकी' के रूप में भी माना जा सकता है।