सीखने के संज्ञानवादी सिद्धान्त - cognitive theory of learning
सीखने के संज्ञानवादी सिद्धान्त - cognitive theory of learning
1. सूचना प्रसंस्करण सिद्धान्त
सूचना प्रसंस्करण सिद्धान्त बताता है कि मानव मस्तिष्क संगणक की तरह कार्य करता है। संगणक की तरह यह सूचना ग्रहण करता है, इस पर कार्य करता है, इसके प्रकार तथा विषय-वस्तु को परिवर्तित करता है, सूचना का संग्रह करता है, इसे पुनः प्राप्त करता है तथा इसके लिए उत्तर देता है। इस सिद्धान्त के अनुसार सीखना एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में मस्तिष्क संगणक की तरह सूचना को एकत्रित करता है तथा इसे पूर्व ज्ञान के सन्दर्भ में संगठित करता है। यह प्रक्रिया संकेतीकरण (Encoding) कहलाती है। सूचना को संग्रहित करने की प्रक्रिया संग्रहण (Storage) कहलाती है। सूचना को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया, जब आवश्यकता होती है, पुनःप्राप्ति (retrieval) कहलाती है। इस पूरे तंत्र का निर्देशन नियंत्रण प्रक्रियाओं द्वारा किया जाता है जो यह निर्धारित करता है कि कब और कैसे सूचना इस तंत्र से होकर गुजरेगी। सूचना प्रसंस्करण संवेदिक स्मृति में एनकोड की जाती है जहाँ प्रत्यक्षीकरण तथा अवधान निर्धारित करता है कि क्रियात्मक स्मृति में क्या संग्रहित किया जाएगा जिसे भविष्य में उपयोग में लाया जा सके।
संपूर्ण रूप से प्रसंस्कृत तथा पूर्व निर्मित ज्ञान से जुडी हुई सूचना दीर्घकालीन स्मृति का अंग बन जाती है जिसे क्रियात्मक स्मृति में वापस जाने के लिए उत्प्रेरित किया जा सकता है।
2. गेस्टाल्ट (पूर्णाकार) सिद्धान्त
गेस्टाल्ट जर्मन भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है समग्र अथवा पूर्णाकार। इससे किसी वस्तु, अनुभव, परिस्थिति या समस्या की समग्रता का बोध होता है। गेस्टाल्टवादी मानते हैं कि जब हम किसी समस्या का प्रत्यक्षीकरण करते है तो हम इसे अंशों में विश्लेषित नहीं करते वरन हम इसके सम्पूर्ण का प्रत्यक्षीकरण करते हैं। अंशों में विश्लेषित करने से वस्तु की समग्रता नष्ट हो जाती है। व्यक्ति किसी वस्तु को एक इकाई में ग्रहण कर उसके विभिन्न भागों पर प्रकाश डालता है। किसी वस्तु को उसके पूर्ण रूप में देखने और समझने के बाद उसके भागों का अध्ययन करना अधिक सुगम होता है।
गेस्टाल्टवादी सीखने को एक उद्देश्यपूर्ण, अन्वेषणात्मक तथा रचनात्मक प्रक्रिया मानकर चलती हैं। उनके अनुसार सीखनेवाला जो द्वितीय सेमेस्टर प्रथम पाठ्यचर्या कुछ सीख रहा होता है, उसका समग्र रूप में प्रत्यक्षीकरण करता है।
तथा उसमें निहित संयोजनों का सही ढंग से विश्लेषण करता है। व्यक्ति का वातावरण के प्रति अवबोध तथा बुद्धिमतापूर्ण उचित अनुक्रिया व्यक्त करने की योग्यता अंतर्दृष्टि कहलाती है। अंतर्दृष्टि एक ऐसी मानसिक योग्यता है जिसके द्वारा किसी समस्या का हल अचानक ही मष्तिष्क में आ जाता है। पूर्णाकार में अंतर्दृष्टि निहित होती है। किसी समस्या का पूर्ण रूप में प्रत्यक्षीकरण, इसके समाधान हेतु सूझ या अंतर्दृष्टि का निर्माण करता है, जिसमें समस्या या परिस्थिति के विभिन्न उद्दीपनों का पैटर्न युगपत बनता है जिससे अचानक ही समस्या का हल निकल आता है। कोहलर के अनुसार अंतर्दृष्टि का अर्थ हल को एकाएक पकड़ लेना है जिसमें ऐसी प्रक्रिया आरम्भ होती है जो परिस्थिति के अनुसार चलती रहती है। पूर्णाकारवाद के नियम
1. संरचनात्मकताः इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी समस्या या परिस्थिति के विभिन्न उद्दीपनों के युग्मपत को एक निश्चित संरचना के रूप में देखता है जिससे उसमें समस्या के समाधान हेतु अंतर्दृष्टि विकसित होती है।
2. समानताः जो वस्तुएँ आकर में समान होते हैं वे दूसरे वस्तुओं के समूह से पृथक दिखाई देते हैं।
3.सानिध्य: इस नियम के अनुसार जो वस्तुएँ निकट होती हैं वे एक समूह में दिखाई देती हैं।
ये रेखाएँ आपस में सानिध्य के कारण रेखाओं के तीन समूह के रूप में दिखते हैं।
1. संवरण ( Closure): चार रेखाएँ खिंची गई है, परन्तु वे एक चतुर्भज के समान दिखाई देती है क्योंकि हमारा मष्तिष्क इन रेखाओं के बीच के रिक्त स्थान का अवलोकन नहीं करता।
गेस्टाल्ट की अधिगम में भूमिका
गेस्टाल्ट की सीखने में भूमिका के सन्दर्भ में कोहलर तथा कॉफ्का के प्रयोग विशेष रूप से प्रसिद्द हैं।
कोहलर ने अपने प्रयोगों से यह दिखाया कि मनुष्य प्रयत्न तथा भूल द्वारा नहीं सीखता वरन जब कोई नई समस्या उत्पन्न होती है तो वह परिस्थिति का अवलोकन करता है तथा अपने उद्देश्य की पूर्ति ध्यान में रखकर इसका पूर्ण रूप में प्रत्यक्षीकरण करता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक वह समस्या का समाधान या उद्देश्य की पूर्ति न कर ले। इस प्रकार के सीखने को अंतर्दृष्टि अथवा सूझ द्वारा सीखना कहते हैं।
प्रयोग सं. 1- कोहलर ने सुल्तान नाम के एक भूखे चिपेंजी को एक पिंजरे में बंद रखा जिसमें एक ने छड़ी रखी गई। पिंजरे के बाहर केले इतनी दूरी पर रखे गए जिन्हें छड़ी की सहायता से आसानी से प्राप्त किया जा सके। भूखा चिपेंजी केले को देखकर व्याकुल हो उठा तथा उसने केले को प्राप्त करने के बहुत प्रयास किए किन्तु वह केले को पा न सका। अंततः, उसकी दृष्टि पिंजरे के अन्दर रखी छड़ी पर पड़ी तथा छड़ी की लम्बाई का केले की पिंजड़े से दूरी के साथ संयोजन कर, छड़ी को उठाकर उसकी सहायता से केले को प्राप्त कर लिया।
प्रयोग सं. 2- दूसरे प्रयोग में पिंजरे में दो छड़ियाँ रखी गई, जिन्हें परस्पर जोड़ा जा सकता था। अब केले को इतनी दूरी पर रखा गया कि उसे तभी प्राप्त किया जा सकता था जब चिपेंजी दोनों छड़ियों को जोड़कर एक बना दे। केले को प्राप्त करने के लिए चिपेंजी एक छड़ी के साथ कोशिश करता रहा अचानक उसने दूसरी छड़ी को देखा और उसे भी उठा लिया। दोनों छड़ियों की कुल लम्बाई तथा केले की पिंजरे से दूरी का संपूर्ण रूप में प्रत्यक्षीकरण करने पर चिपेंजी को अचानक से सूझ मिली और उसने दोनों छड़ियों को जोड़कर एक छड़ी बना दी तथा उसकी सहायता से केले को प्राप्त कर लिया।
प्रयोग सं 3- इस प्रयोग में पिंजरे के अन्दर दो बॉक्स रख दिए गए तथा केले को पिंजरे की छत से इतनी ऊंचाई से लटकाया गया कि उसे तभी प्राप्त किया जा सकता था जब चिपेंजी दोनों बक्सों को एक के ऊपर रखे। उसने उछल-उछल कर केले को प्राप्त करने के बहुत प्रयास किए पर वह असफल रहा। उसके बाद वह एक बॉक्स के ऊपर चढ़कर केले को पकड़ने का प्रयास करने लगा पर उसे सफलता नहीं मिली। अनायास ही उसकी दृष्टि दुसरे बॉक्स पर पड़ी। उसने एक बक्से को दूसरे बॉक्स के ऊपर रखा तथा केले को प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार कोहलर के प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य या चिपेंजी जैसे जानवर किसी समस्या या परिस्थिति के विभिन्न अंगों के मध्य संयोजन तथा सम्बन्ध स्थापित कर इसका पुनर्गठन करते हैं, जिससे समस्या के समाधान हेतु अचानक अंतर्दृष्टि या सूझ का विकास होता है।
गेस्टाल्टवाद व पूर्णाकारवाद एवं शिक्षा
अधिगम वातावरण: शिक्षक द्वारा इस प्रकार का अधिगम वातावरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि बच्चा स्वयं सीखने के लिए प्रेरित हो, वह किसी समस्या के विभिन्न पक्षों का एक युग्म या इकाई के रूप में अवलोकन करे जिससे उसमें समस्या के निदान हेतु अंतर्दृष्टि विकसित हो।
पूर्ण समस्या: शिक्षक द्वारा किसी समस्या पाठ को पूर्ण रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि बच्चे को उस समस्या या पाठ का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो तथा उसमें अंतर्दृष्टि उत्पन्न हो।
पाठ का संगठन: शिक्षक को पाठ का संगठन इस प्रकार करना चाहिए कि वह सम्पूर्णता प्राप्त कर ले तथा बच्चे में अंतर्दृष्टि उत्पन्न करने योग्य बन जाए।
सामान्यीकरण: शिक्षक को कक्षा में पढाए गए विभिन्न तथ्यों का सामान्यीकरण करना चाहिए ताकि बच्चा पाठ की विषय वस्तु को सम्पूर्ण रूप से अनुभव कर सके।
उपरोक्त विवेचना से यह निष्कर्ष निकलता है कि गेस्टाल्टवाद सीखने के व्यवहारवादी सिद्धांतों पर आघात करता है। यह सूझ-बुझ के सामान्य ज्ञान द्वारा सीखने पर बल देता है। यदि बच्चा किसी अनुभव या वस्तु को संपूर्णता में ग्रहण करता है तो उसमें उस वस्तु से प्रश्नों को हल करने की अंतर्दृष्टि उत्पन्न होती है।
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