सामूहिक वाद-विवाद - collective debate

सामूहिक वाद-विवाद - collective debate


सामूहिक वाद-विवाद की कोई सामान्य परिभाषा नहीं है। इसको प्रजातान्त्रिक व्यूह-रचना माना जाता है, क्योंकि इसमें छात्रों को ही अधिक क्रियाशील रहना पड़ता है। शिक्षक केवल निरीक्षण तथा निर्देशक का कार्य करता है यह सदैव छात्र केन्द्रित होती है। इसकी व्यवस्था साधारणतः दो प्रकार से की जाती है।


• शिक्षक द्वारा - इस परिस्थिति में वातारण कुछ प्रभुत्ववादी होता है। में


• छात्रों द्वारा इसमें परिस्थिति पूर्ण रूप में प्रजातान्त्रिक होती है।


इस प्रविधि का स्वरूप इस प्रकार है-


• सामूहिक वाद-विवाद के दो रूप होते है, औपचारिक तथा अनौपचारिक । औपचारिक कार्यक्रम को पहले से बनाया जाता है। इसमें विशिष्ट नियमों का अनुसरण किया जाता है।


• सामूहिक वाद-विवाद किसी शैक्षिक समस्या तथा पाठ्यक्रम सम्बन्धी समस्या पर आयोजित किया जाता है।


• छात्रों द्वारा व्यवस्था करने पर उन्हें नेता का चयन करना पड़ता है जो उसका कार्यक्रम बनाता है


• इसमें छात्रों के प्रश्नों तथा उत्तरों को ही महत्व दिया जाता है। इसके मुख्य सिद्धांत अधोलिखित है


• यह विधि सक्रियता तथा मौलिकता के विकास को अवसर देती है।


• प्रत्येक छात्र को प्रश्न पूछने तथा उत्तर देने का समान अधिकार होता है।


• प्रजातन्त्रिक सिद्धांतो का अनुसरण किया जाता है।


• सामाजिक तथा मनोवैज्ञनिक सिद्धांतों को महत्व दिया जाता है।


इसकी प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार है-


• इसमें आलोचना के लिए अधिक अवसर होता है। त्रुटिपूर्ण आयाम का खडन किया जाता है। समस्या समाधान के लिए व्यापक आयामों के प्रयोग का अवसर दिया जाता है।


• जो छात्र समस्या समाधान तथा अपने निर्णय लेने में कमजोर होते है उनके लिए यह आव्यूह अधिक उपयोगी होता है।


• सामूहिक वाद-विवाद छात्रों की अभिवृतियों के विकास के लिए अधिक उपयोगी होता है।


• इस आव्यूह की सहायता से छात्रों की सृजनात्मक क्षमताओं का विकास किया जाता है समस्याओं के लिए समाधान खोजने में वे अपनी निर्णयशक्ति का प्रयोग करते है। निर्णय लेने में वे विभिन्न आयामों का प्रयोग करते है। इस प्रविधि की उपयोगिता निम्नलिखित है-


इसमें सामाजिक-अधिगम को अधिक अवसर मिलता है। सामूहिक वाद-विवाद व्यूह-रचना से ज्ञानात्मक तथा भावात्मक पक्षों के उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है। निम्न स्तर के उद्देश्यो की प्राप्ति के लिए इसे प्रयुक्त नही किया जा सकता है। छात्रों में ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ अभिरूचियों तथा अभिवृतियों का विकास भी होता है। इसकी सीमायें निम्न प्रकार है-


• छात्र विषयान्तर बातें अधिक करने लगते है।


• कुछ ही छात्र बोलते रहते है।


• छात्रों में दो समूह बन जाते है जिससे उनमें स्पर्धा तथा ईर्ष्या हो जाती है।


• पूर्व स्पर्धा के कारण वे आलोचना अधिक करते है।