संप्रेषण की प्रक्रिया - communication process

संप्रेषण की प्रक्रिया - communication process


जैसा कि बताया जा चुका है कि संप्रेषण की प्रक्रिया एकपक्षीय न होकर द्विपक्षीय या बहुपक्षीय होती है तथा दूसरे के विचारों तथा भावों के प्रभाव पूर्ण आदान-प्रदान के लिये प्रेषण स्त्रोत तथा प्राप्तकर्ता दोनों की ही समान रूप से प्रभावी भूमिका रहती है। इस प्रकार के आदान-प्रदान का जो रूप होता है, उससे संबंधित तत्वों तथा उनकी भूमिका को निम्न प्रकार समझा जा सकता है।


1. संप्रेषण स्रोत : विचारों तथा भावों के आदान-प्रदान की शुरूआत जिस स्त्रोत या व्यक्ति द्वारा की जाती है संप्रेषण प्रक्रिया का उसे ही प्रारंभिक बिन्दु माना जाता है। जब तक अपने विचारों या भावों को कोई व्यक्ति किसी के साथ विनिमय या प्रेषित करने को तैयार नहीं होता तब तक संप्रेषण प्रक्रिया की शुरूआत नहीं हो सकती । इस तरह संप्रेषण प्रक्रिया में संप्रेषण स्रोत से तात्पर्य उस व्यक्ति तथा समूह विशेष से होता है जो अपनी भावनाओं तथा विचारों को किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्ति समूहों तक पहुँचाना चाहता है। शांति


2. संप्रेषण सामग्री : संप्रेषण कर्ता या स्त्रोत के द्वारा जो कुछ भी अपने विचारों, भावों तथा अनुभवों आदि के रूप में किसी और को प्रेषित किया जाता है उसे ही संप्रेषण सामग्री कहा जाता हैं यह सामग्री जितने अच्छे रूप से स्रोत द्वारा संजोयी जा सकती है वह वैसा ही प्रभाव प्राप्तकर्ता के ऊपर छोड़ती है। 


3. संप्रेषण माध्यम : अपनी भावनाओं तथा विचारों को दूसरों तक पहुँचाने के लिये तथा दूसरों की भावनाओं और विचारों को ग्रहण कर उनके प्रति अपनी अनुक्रिया व्यक्त करने के लिये स्रोत तथा प्राप्त कर्ता द्वारा जिन माध्यमों का सहारा लिया जाता है, उन्हें संप्रेषण माध्यम का नाम दिया जाता हैं ये माध्यम शाब्दिक तथा अशाब्दिक दोनों में से किसी रूप में भी हो सकते हैं। भाषा का प्रयोग कर मौखिक या लिखित रूप में अपनी बात कही जा सकती है या फिर अशाब्दिक संकेतों जैसे शारीरिक भाषा, हाव भाव, संकेत भाषा आदि के द्वारा संप्रेषण किया जा सकता है।


संप्रेषण माध्यम चाहे शाब्दिक प्रयोग में लाया जाये अथवा अशाब्दिक दोनों में संकेतन तथा विसंकेतन प्रक्रियाओं का अनिवार्य रूप से प्रयोग होता है। भाषा के मौखिक या लिखित रूप में जब हम शब्दों का प्रयोग करते हैं तो यहाँ स्रोत के रूप में पहले हम संकेतन का उपयोग ही करते हैं। हमें दूध चाहिये तो अपने इस विचार या भाव को 'दूध दो' इस प्रकार के भाषा संकेतन का उपयोग कर किसी दुकानदार से व्यक्त करेंगे। अब अगर दुकानदार हमारी यह बात समझना चाहता है तो उसे इस संकेतन का विसंकेतन करके ही समझना पड़ेगा । अगर वह हमारी भाषा हिन्दी नहीं जानता तो उसे इसका विसंकेतन करके हमारे द्वारा किए गए संप्रेषण को समझने तथा उसके प्रति अनुकूल अनुक्रिया करने में परेशानी होगी। अतः संप्रेषण का माध्यम वही उपयुक्त रहता है जिसका संकेतन तथा विसंकेतन संप्रेषण से जुड़े हुए व्यक्तियों द्वारा भलीभांति हो सके।


4. प्राप्तकर्ता : स्रोत द्वारा प्रेषित संदेश, विचार तथा भावों को जिस व्यक्ति विशेष या समूह द्वारा ग्रहण किया जाता है उसे प्राप्तकर्ता का नाम दिया जाता है। संप्रेषण प्रक्रिया में यदि प्राप्तकर्ता किसी प्रेषित संदेश,

विचार, भाव, अनुभवों या अनुभूतियों कोग्रहण करने हेतु इच्छुक नहीं है अथवा उसमें ग्रहण करने की पर्याप्त क्षमता या योग्यता नहीं है तो संप्रेषण कर्ता तथा सम्प्रेषित सामग्री की गुणवत्ता उन्हीं तक रह जाती है उसका लाभ संप्रेषण प्रक्रिया को नहीं मिल पाता अतः प्राप्तकर्ता का संप्रेषण हेतु पूर्ण सक्षम, क्रियाशील तथा अभिप्रेरित रहना अत्यंत आवश्यक है।


5. अनुक्रियात्मक सामग्री : जो कुछ भी स्रोत द्वारा संप्रेषण माध्यम की सहायता से प्रेषित किया जा रहा है, उसे प्राप्तकर्ता द्वारा ग्रहण कर किस रूप में समझा गया तथा उसके प्रति उसकी क्या अनुक्रिया रही इसी की अभिव्यक्ति को अनुक्रियात्मक सामग्री का नाम दिया जाता है। इसी सामग्री को अब उचित संप्रेषण माध्यम की सहायता से स्रोत तक पहुँचाने की प्राप्तकर्ता द्वारा निभाई जाती है और इसी की प्रभावशीलता पर स्रोत और प्राप्तकर्ता के बीच संप्रेषण चालू रहना निर्भर करता है। 6. संप्रेषण में सहायक या बाधक तत्व : संप्रेषण प्रक्रिया की सफलता या असफलता में संप्रेषण में सहायक या बाधक तत्वों की भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। सम्प्रेषित सूचना या विचार सामग्री को स्रोत से प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने में संप्रेषण माध्यमों की भूमिका को भी ये तत्व घटाते बढ़ाते रहते हैं।