समाज - community

समाज - community


सामाजिक संबंधों के ताने बाने को समाज कहतें हैं. समाज मानवीय अंतःक्रियाओं की संरचना है। मानवीय क्रियाएँ चेतन और अचेतन दोनों परिस्थितियों में निरंतर क्रियान्वित रहतीं हैं। व्यक्ति का व्यवहार कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास की अभिव्यक्ति है। उसकी कुछ नैसर्गिक तथा कुछ अर्जित आवश्यकताएँ होती हैं - काम, क्षुधा, सुरक्षा इत्यादि। इनकी पूर्ति मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है, वह स्वयं इनकी पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता इसलिए इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य ने एक व्यवस्था को विकसित किया है, जिसमें सभी समाहित हो कर अपने उद्देश्य पूर्ति में एक साथ सहभागी होते हैं । इस व्यवस्था को ही हम समाज के नाम से सम्बोधित करते हैं। यह व्यक्तियों का ऐसा संकलन है जिसमें वह निश्चित संबंध और विशिष्ट व्यवहार द्वारा एक दूजे से बँधे होते हैं। व्यक्तियों की वह संगठित व्यवस्था विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न मानदंडों को विकसित करती है, जिनके कुछ व्यवहार सामाजिक रूप से अनुमत कुछ निषिद्ध होते हैं। और समाज को उन्नत करने और स्थापित रहने के लिए उसके सदस्यों की कुछ आवश्यक शर्त होती हैं -


1) उपलब्ध पर्यावरण के अनुरूप अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति


2) अपनी प्रजाति के संवर्धन हेतु संतति उत्पन्न करना,


3) अपनी गतिविधियों को एकीकृत करना।


चूँकि समाज व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों की एक व्यवस्था है, इसलिए इसका कोई मूर्त स्वरूप नहीं होता है व इसकी अवधारणा अनुभूतिमूलक है। समाज हमेशा अपने सदस्यों में ही अस्तित्व रखता है, अतः सामाजिक संबंधों का ताना-बाना समाज के अस्तित्व का अपरिहार्य अंग है।

ज्ञान और प्रतीति के अभाव में सामाजिक संबंधों का विकास संभव नहीं है। पारस्परिक सहयोग एवं संबंध का आधार समान स्वार्थ होता है। समान स्वार्थ की सिद्धि समान आचरण द्वारा संभव होती है। इस प्रकार का सामूहिक आचरण समाज द्वारा निर्धारित और निर्देशित होता है। वर्तमान सामाजिक मान्यताओं की समान लक्ष्यों से संगति के संबंध में सहमति अनिवार्य होती है। यह सहमति पारस्परिक विमर्श तथा सामाजिक प्रतीकों के आत्मीकरण पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सदस्य को यह विश्वास रहता है कि वह जिन सामाजिक विधाओं को उचित मानता और उनका पालन करता है, उनका पालन दूसरे भी करते हैं। इस प्रकार की सहमति, विश्वास एवं तदनुरूप आचरण सामाजिक व्यवस्था को स्थिर रखते है। व्यक्तियों द्वारा सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्थापित विभिन्न संस्थाएँ इस प्रकार कार्य करती है, जिससे एक समवेत इकाई के रूप में समाज का संगठन अप्रभावित रहता है। असहमति की स्थिति अंतर्वैयक्तिक एवं अंतः संस्थात्मक संघर्षों को जन्म देती है जो समाज के विघटन के कारण बनते है। यह असहमति उस स्थिति में पैदा होती है जब व्यक्ति सामूहिकता के साथ आत्मीकरण में असफल रहता है।

आत्मीकरण और नियमों को स्वीकार करने में विफलता कुलगति अधिकारों एवं सीमित सदस्यों के प्रभुत्व के प्रति मूलभूत अभिवृत्तियों से संबद्ध की जा सकती है। इसके अतिरिक्त ध्येय निश्चित हो जाने के पश्चात् अवसर इस विफलता का कारण बनता है। हैरी ऍम. जॉनसन ने समाज के चार लक्षण बताएं हैं


1) निश्चित क्षेत्र:- समाज हमेशा एक क्षेत्रीय समूह होता है, किसी एक समाज में हालाकि कई क्षेत्रीय समूह होते हैं जैसे शहर, गाँव, पड़ोस, प्रान्त, संकुल इत्यादि।


 2) संतति:- समाज में नए सदस्यों की भर्ती मूल रूप से उस सभ्यता के संतति संवर्धन हेतु प्रजनन प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। वैसे हमेशा से समाज के नए सदस्य अप्रवास, दत्तक ग्रहण इत्यादि द्वारा भी शामिल किये जातें हैं,

पर प्रजनन हमेशा से नए सदस्यों को शामिल करने के लिए प्रमुख प्रक्रिया रही हैं।


3) संस्कृति:- हर समाज की अपनी व्यापक संस्कृति होती है जो की आत्मनिर्भर होती है। एक समाज दूसरे समाज से सम्बन्ध रखता है, जैसे- व्यापार, भ्रमण इत्यादि परन्तु उस सम्बन्ध का स्वरूप संस्कृति पर निर्भर करता है।


4) स्वतंत्रता:- समाज का महत्त्वपूर्ण लक्षण यह भी है कि उसकी मान्यता किसी उपसमूह कि स्थिति में नहीं प्राप्त है और वह समूह अपनी स्वतंत्र पहचान रखता है।


वर्तमान में परिवार और उसके बाद दूसरी महत्वपूर्ण संस्था विद्यालय है।

अधिकांश देशों में प्राथमिक स्तर तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गयी है। चूँकि शिक्षा देश के विकास की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। इसलिए इसे उच्च प्राथमिकता दी गयी है। विद्यालय बालक को देश-विदेश के इतिहास, भाषा, विज्ञान, गणित, कला तथा भूगोल की जानकारी प्रदान करते है। कालेज, विश्व विद्यालय और अन्य उच्च संस्था व्यक्ति को किन्हीं खास विषयों का विशिष्टि ज्ञान प्रदान करते हैं। व्यक्ति को इस योग्य बनाते है कि वे अपनी जीविका उपार्जित कर सकें और समाज का एक उपयोगी अंग बन सके। वर्तमान में शिक्षा संस्थाओं की बहुता है और इस संस्था में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र, छात्राओं की भीड़ है। बालक, बालिकाएं समान रुप से तकनीकी एवं गैर-तकनीकी हर क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।


परिवार और शिक्षण संस्था ओं के बाद व्यक्ति के लिए उसका पड़ोस और आस-पास का इलाका सबसे अधिक महत्व रखता है। पड़ोसी अलग-अलग जातीय समुदाय से संबंधित हो सकते हैं।

उनके व्यावसाय धार्मिक विश्वास और रहन-सहन का ढंग भी अलग-अलग हो सकता है, किन्तु पड़ोसी होने के कारण कुछ सम्मिलित जिम्मेदारियां होती है। जैसे पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों का कल्याण इस बात में है कि गली मुहल्ला साफ-सुथरा रहे, सभी लोग यह चाहेगें कि पड़ोस में शान्ति पूर्ण वातावरण रहे, सभी यह चाहेगें कि उनके बच्चे बुरी आदतों का शिकार न बनें और पड़ोस में आमोद-प्रमोद का स्वस्थ्य वातावरण बना रहे। अच्छे पड़ोसी के लिये यह आवश्यक है कि वह पास-पड़ोस को साफ-सुथरा रखें, पड़ोसियों के दु:ख दर्द में शामिल हो, उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यासन रखें, चोरों और अजनबी लोगों पर नजर रखें, बच्चों को कुसंग से बचायें आदि।।


जैसे-जैसे पारिवारिक पड़ोस में वृद्धि होती जाती है समाजिक क्षेत्र का विस्तार होता चला जाता है। कई परिवारों से गाँव, कस्बे, शहर बनते हैं, तत्पश्चात देश और सम्पूर्ण विश्व पड़ोस से तात्पर्य सिर्फ घर से घर ही नहीं, बल्कि गाँव का पड़ोसी गाँव, शहर का पड़ोसी शहर, देश का पड़ोसी देश इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व बनता है। भारतीय संस्कृति ने वसुधैव कुटुम की भावना से सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना है और संपूर्ण विश्व को एक समाज मान कर सबके सुख और कल्याण की कामना के साथ समाज की संकल्पना की है।