पाठ्यक्रम के निर्माण में सहभागी घटक - Components involved in the creation of the curriculum

पाठ्यक्रम के निर्माण में सहभागी घटक - Components involved in the creation of the curriculum


पाठ्यक्रम के निर्माण अथवा विकास की प्रक्रिया में उन सभी व्यक्तियों संस्थाओं एवं अन्य अनुभवी घटकों की सहभागिता आवश्यक होती है जो किसी न किसी रूप में शिक्षा से संबंधित होते हैं। ऐसे घटकों में शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, जनसामान्य विषय विशेषज्ञ समाज-शास्त्री, राजनीतिज्ञ मनोवैज्ञानिक, अनुसंधान संगठन आदि प्रमुख हैं। एक ब्रिटिश विद्वान श्री जोशलीन ओवन ने पाठ्यक्रम के निर्माण में विभिन्न घटकों की सहभागिता पर बल देते हुए कहा था कि "हम पाठ्यक्रम की यदि कोई कार्यनीति प्रस्तावित कर सकते हैं तो वह भागीदारी की कार्यनीति है। इस कार्य में सभी संबद्ध पक्षों को सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए।" पाठ्यक्रम के निर्माण अथवा विकास के क्षेत्र से संबंधित विभिन्न घटकों की अधिकाधिक भागीदारी से पाठ्यक्रम के प्रमुख आयोजकों एवं विषय विशेषज्ञों को अनेक ऐसी बातों एवं आवश्यकताओं का ज्ञान होता है, जिनके प्रति उनका ध्यान नहीं होता है। पाठ्यक्रम के निर्माण अथवा विकास में भागीदार घटकों तथा उनकी भूमिका का संक्षेप में विवरण यहाँ दिया जा रहा है।


(1) शिक्षक - पाठ्यक्रम के निर्माण के सभी स्तरों पर शिक्षक एक सर्वाधिक महत्व पूर्ण सहभागी घटक है। शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण, अंतर्वस्तुव के चयन एवं संगठन, शिक्षण विधियों एवं प्रविधियों के चयन, सहायक सामग्री के चयन, मूल्यांकन विधियों के निर्धारण आदि सभी चरणों में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्तिगत रूप से छात्रों एवं उनकी समस्याओं को समझने, उन पर ध्यान देने तथा निर्णय लेने का कार्य प्रभावी रूप से शिक्षक ही कर सकता है। अतः पाठ्यक्रम विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भागीदारी शिक्षक की ही होनी चाहिए।


( 2 ) छात्र - मनौवैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोई भी शैक्षिक कार्यक्रम छात्रों के सहयोग पर ही सफल हो सकता है। कक्षा व कक्षा के बाहर की शैक्षिक क्रियाएँ, अंतर्वस्तुक का चयन, सहायक शिक्षण सामग्री का चयन आदि अनेक क्षेत्रों में छात्रों का सक्रिय सहयोग महत्वपूर्ण है।

पाठ्यक्रम विशेषज्ञ इस बात पर बल देते हैं कि पाठ्यक्रम के निर्माण या विकास की प्रक्रिया में छात्रों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता का समर्थन प्राय: सभी देश करते हैं। किंतु इस प्रक्रिया में हमें उनकी सीमाओं का भी ध्यान रखना आवश्यक है। भारत में शैक्षिक कार्यक्रमों में छात्रों की सहभागिता के अच्छा परिणाम के साथ-साथ यह भी अनुभव किया गया है कि इनकी भागीदारी प्रायः व्यवस्था ही उत्पन्न करती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनमें उत्तरदायित्व की भावना का अभाव होता है। अतः पाठ्यक्रम के निर्माण में छात्रों की सहभागिता प्राप्त करने के साथ उनमें उत्तरदायित्व के बोध को विकसित करना आवश्यक है। 


( 3 ) विषय विशेषज्ञ - विषय विशेषज्ञ संबंधित विषय का पूर्ण ज्ञाता तथा उसकी तकनीकी को जानने समझने वाला व्यषक्ति होता है, इसलिए पाठ्यक्रम के विकास में इनकी भूमिका निर्विवाद है।

विषय विशेषज्ञ को अपने विषय से संबंधित बिंदुओं को पूरी निष्पक्षता के साथ अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए। उसे विषयों के व्यावहारिक पक्ष को समझते हुए संदर्भ इकाइयों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इस कार्य को सार्थक करने के लिए उसे शिक्षण कार्यों तथा अन्यो विद्यालयीन कार्यों में भी भाग लेना चाहिए, ताकि उसे विषय के व्यावहारिक पक्ष को समझने में सहायता मिल सके। उसे ज्ञान प्राप्त करने के सभी स्रोतों की जानकारी होनी चाहिए उसे अनुसंधान के निष्कार्षों प्रयोगों एवं नवाचारों का मूल्यांभकन करके उनका समुचित उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।


(4) जनसामान्य और अभिभावक - प्रजांतात्रिक व्यवस्था जनसामान्यक अथवा छात्रों के अभिभावकों को पाठ्यचर्या के संबंध में अपना मत एवं अपनी प्रतिक्रिया व्याक्त करने का अधिकार होता है।

शिक्षा के संबंध में तो यह और भी महत्वपूर्ण है। अतः पाठ्यक्रम के निर्माण व विकास में जनसामान्य की भगीदारी उचित है। इस प्रक्रिया में शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में उनकी सहभागिता होनी चाहिए। पाठ्यचर्या के तकनीकी पक्षों में जनसामान्य की सलाह ली जा सकती है। जिस पर तकनीकी विशेषज्ञ निर्णय ले सकते हैं। इस प्रकार पाठ्यक्रम के निर्माण में जनसामान्य के विचार अवश्य सुनने चाहिए। कई बार उनके विचारों को ठीक से ध्यान देने पर उनसे उपयोगी संकेत भी मिलते हैं, जो हमारी प्रगति के लिए आवश्यक दिशा प्रदान कर सकते हैं।


(5) समाजशास्त्री - पाठ्यचर्या के निर्माण अथवा विकास में सामाजिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पाठ्यक्रम को छात्रों की सामाजिक-आर्थिक भूमि तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।

समाज की प्रकृति को समझने तथा छात्रों की पारिवारिक सामाजिक पृष्ठभूमि को जानने के लिए समाजशास्त्रियों का सहयोग आवश्यक है। अतः पाठ्यक्रम के विकास की प्रक्रिया में समाजशास्त्रियों की सहभागिता महत्वपूर्ण है।


(6) राजनीतिज्ञ – शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिज्ञों की भूमिका हमेशा से विवाद का विषय रहा है। कुछ विचारक मानते हैं कि शिक्षा में राजनीतिज्ञों का हस्तक्षेप उचित नहीं है। इसके विपरीत विचारकों का दूसरा वर्ग भी है जो शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिज्ञों की सहभागिता को उचित मानते हैं। प्रथम वर्ग के विचारक जो राजनीतिज्ञों की आलोचना करते हैं उनको यह समझना चाहिए कि इससे शिक्षा में लाभ के स्थान पर हानि अधिक होती है। राजनीतिज्ञों को भी शिक्षा के प्रति अपनी आस्था बढ़ाने तथा अपने दायित्वों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। अतः राजनीतिज्ञ भी पाठ्यक्रम विकास की प्रक्रिया में सहभागी बनें तथा उसमें अपेक्षित सुधार हेतु सक्रिय सहयोग प्रदान करें। हमारे देश में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब राजनीतिज्ञों के दबाव के परिणामस्वारूप पाठ्यक्रम में परिवर्तन हुए हैं। अत: इन समस्या ओं के समाधान के लिए राजनीतिज्ञों की पाठ्यक्रम के निर्माण व विकास में सहभागिता होनी चाहिए।