फर्म के मूल्यांकन की अवधारणा - concept of firm valuation
फर्म के मूल्यांकन की अवधारणा - concept of firm valuation
कई स्थितियों में, फर्म के मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। फर्म का पुनर्निर्माण करना हो, उसकी ख्याति ज्ञात करनी हो, उसका मूल्य जानना हो, फर्मों का संविलयन, एकीकरण या अधिग्रहण करना हो, आदि परिस्थितियों में फर्म का मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है।
फर्म का मूल्य, उसकी अर्जन क्षमता पर ही नहीं अपितु उसके संचालन तथा वित्तीय स्थितियों पर निर्भर करता है। साथ ही, फर्म के मूल्य पर गुणात्मक (Qualitative) तथा परिमाणात्मक (Qualitative) घटकों का भी प्रभाव पड़ता है। गुणात्मक पहलू, प्रबंधकीय कौशल, योग्यता, अनुभव आदि, विक्रय के स्टाफ के सुदृढ़ होने से तथा उत्पादन विभाग के उत्कृष्ट होने से संबंधित है। इसका मूल्यांकन आसानी से नहीं किया जाता जबकि सभी मात्रात्मक पहलुओं का मुल्यांकन आसानी से किया हा सकता है।
मूल्य का तात्पर्य
फर्म के मूल्यांकन के अंतर्गत उसके विभिन्न संपत्तियों का मूल्य ज्ञात करना होता है। मूल्य कई प्रकार के हो सकते हैं। अत: मूल्य के विभिन्न प्रकारों की जानकारी आवश्यक है।
(1) पुस्तक मूल्य - पुस्तक मूल्य का तात्पर्य, फर्म की पुस्तकों में दिखाई गई मूल्यों से है। दूसरे शब्दों में, आर्थिक चिट्ठे में, संपत्तियाँ जिन मूल्यों पर दिखाई जाती हैं वही उनका पुस्तक मूल्य है। व्यवहार में तथा लेखांकन अवधारणा के तहत संपत्तियों का मूल्य उनके ऐतिहासिक लागत मूल्य पर निर्भर करता है तथा उन्हें उनके बाजार मूल्य पर नहीं दिखाया जाता है।
फर्म के पुस्त मूल्य के अनुसार, उसका मूल्य ज्ञात करने के लिए, चिट्टे में दी गई अंशधारियों के अंशों के मूल्य को आधार बानया जाता है। इसके अनुसार,
फर्म के शुद्ध मूल्य (Net Value) को समता अंशों की संख्या में भाग देकर उसका मूल्य ज्ञात किया जाता है। सूत्र के रूप में,
फर्म का मूल्य = शुद्ध मूल्य / समता अंशों की संख्या
पुस्त मूल्य विधि की कमी यह है कि यह मूल्य आर्थिक चिट्ठे में दिखाई गई संपत्तियों के ऐतिहासिक लागत (Historical Coat) पर आधारित होती है। ऐतिहासिक लागत का न तो फर्म की अर्जन क्षमता से ( earning capacity) और न ही फर्म के मूल्य से संबंध होता है। इस सीमा के होते हुए भी, फर्म के मूल्यांकन की यह विधि निम्नलिखित कारणों से उपयुक्त मानी जाती है:
1. विश्लेषण की दृष्टि से, पुस्त मूल्य से ही गणना करना अधिक सुलभ व सुसंगत होता है।
2. ऐसी फर्म के लिये, जिसमें बड़ी मात्रा में स्थायी संपत्तियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं, पुस्त मूल्य अधिक उपयुक्त है। विशेष रूप से उस स्थिति में जब कि ये स्थायी संपत्तियाँ नई हो।
3. फर्म की कार्यशील पूँजी की जानकारी प्राप्त करने के लिए, पुस्त मूल्य का प्रयोग करना अधिक उचित है।
(2) बाजार मूल्य - व्यवहार में, फर्म के मूल्यांकन के लिये बाजार मूल्य को प्राय: आधार बनाया जाता है। यहाँ पर बाजार मूल्य का तात्पर्य स्टॉक मार्केट में अंशों के निर्धारित मूल्य से है। इसे फर्म का अधिक उचित शुद्ध मूल्य माना जा सकता है क्योंकि यह मूल्य विनियोजकों द्वारा फर्म के अर्जन तथा उसमें निहित जोखिम के आधार पर, निर्धारित किया जाता है। इस प्रकार से, बाजार मूल्य विनियोग तथा सट्टे संबंधी घटकों से निर्धारित होता है। यह बाजार में फर्म के विषय में किये गये विश्लेषणों पर भी आधारित होता है।
इस विधि में भी कमी है क्योंकि सट्टे पर आधारित होने के कारण इसमें उच्चवचन अधिक हो सकता है। फिर भी, यह फर्म के मूल्यांकन में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यवहार में, फर्म के क्रेता, फर्म के मालिकों को बेचने के लिये प्रेरित करने के लिये, बाजार मूल्य से कुछ अधिक मूल्य देने को तैयार हो सकते है।
(3) निर्धारित मूल्य – किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा फर्म के मूल्य की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। स्वतंत्र एजेंसी विभिन्न घटकों को ध्यान में रखकर फर्म का मूल्य निर्धारित करती है। इस निर्धारित मूल्य को ही फर्म का मूल्य माना जाता है। यह मूल्य, सामान्यत: संपत्तियों के प्रतिस्थापन मूल्य ( Replacement Value) पर आधारित है। प्रतिस्थापन मूल्य का तात्पर्य उस मूल्य से है जिस पर संपत्तियों को प्रतिस्थापित किया जा सके। इस मूल्य को भी, व्यवहार में, अधिक अपनाया जाता है क्योंकि इसके निम्नलिखित लाभ है-
1. स्वतंत्र एजेंसी, फर्म का मूल्य ज्ञात करने के लिए विभिन्न घटकों का विश्लेषण करती है।
2. स्वतंत्र एजेंसी, फर्म की शक्ति तथा दुर्बलताओं को भी मूल्य निर्धारण करते समय ध्यान में रखती है।
3. संपत्तियों के प्रतिस्थापन मूल्य को अपनाना, कुछ विशेष दशाओं में, जैसे- वित्तीय संस्थाओं के लिये, प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन करने वाली फर्मों के लिये, अधिक उपयुक्त है।
वैसे तो, इस विधि का अपनाना उपयोगी है किंतु इस विधि के साथ अन्य घटकों पर भी ध्यान देकर ही मूल्य निर्धारित किया जातना चाहिए।
(4) प्रति अंश अर्जन – फर्म के मूल्यांकन के लिये प्रति अंश अर्जन को भी आधार बनाया जा सकता है। वास्तव में, यदि फर्म का क्रय किया जाना हो या संविलयन होना हो तो यह देखना चाहिए कि क्रय अथवा संविलयन के पश्चात् उस फर्म की प्रति अंश अर्जन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह अर्जन बढ़ेगी। यदि उसके पश्चात्, फर्म का अर्जन बढ़ता है तो यह अधिक उचित होगा कि उसी को आधार बनाकर फर्म का मूल्यांकन किया जाये। यदि विक्रेता फर्म की प्रति अंश अर्जन घटाती है तो वह अधिक उचित न होगा तथा ऐसे फर्म का क्रय करना लाभप्रद नहीं होगा।
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