आकलन व मूल्यांकन का निर्माणवादी प्रारूप - Constructivist Format of Assessment and Evaluation

आकलन व मूल्यांकन का निर्माणवादी प्रारूप - Constructivist Format of Assessment and Evaluation


आकलन व मूल्यांकन का निर्माणवादी प्रारूप आकलन व मूल्यांकन के तंत्र को अधिगम के निर्माणवादी परिप्रेक्ष्य में संगठित करता है। आकलन व मूल्यांकन की प्रक्रिया निर्माणवादी अधिगम के संप्रत्ययों को केंद्र में रखकर विद्यार्थियों के अधिगम तथा विकास का मूल्यांकन करती है। यह अधिगम उपलब्धि' के स्थान पर अधिगम प्रक्रिया का आकलन करती है। यह अधिगम प्रक्रिया का सतत एवं व्यापक आकलन करते हुए निष्कर्ष निकालती है कि विद्यार्थियों की अधिगम संलग्नता या अनुभव उनके अभिरुचि, अभिक्षमता तथा अधिगम शैली के अनुरूप है या नहीं। यह बताती है कि विद्यार्थी किस प्रकार तथा किस सीमा तक अधिगम उद्देश्यों की पूर्ति करता है? यानी विद्यार्थी कैसे सीखता है, उसके सीखने का तरीका क्या है तथा वह कितना सीखता है, उसके सीखने की व्यवस्था किस प्रकार की जाए कि उसका अधिगम सुनिश्चित हो सके? यह विद्यार्थी की अधिगम प्रक्रिया के दौरान संलग्नता तथा खोज की प्रवृति को उसके अधिगम तथा विकास के आकलन का आधार मानती है।

यदि विद्यार्थी अधिगम गतिविधियों के नियोजन तथा संचालन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह सम्पूर्ण अधिगम प्रक्रिया के दौरान अपनी विशिष्ट क्षमताओं को व्यवहार में लाता है, स्वयं अभिप्रेरित रहकर दूसरों को भी अभिप्रेरित करने का प्रयास करता है, वह अधिगम के लिए आवश्यक विभिन्न तथ्यों की खोज के लिए विभिन्न स्रोतों का चयन एवं मूल्यांकन करता है तथा इन तथ्यों को अपनी क्षमता तथा सहपाठियों एवं शिक्षक के साथ अंतःक्रिया के आधार पर क्रमबद्ध एवं विश्लेषित कर निष्कर्ष निकालता है (जो उसके द्वारा निर्मित ज्ञान कहलाता है) तो यह निर्णय लिया जाता है कि उसका अधिगम सुनिश्चित हुआ है। शिक्षकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उन्हीं के अनुदेशन या व्याख्या के अनुरूप उत्तर देना अधिगम उपलब्धि नहीं कहलाता अपितु शिक्षकों द्वारा दिए गए अनुदेशन या व्याख्यान को ज्ञान के एक स्रोत के रूप में समझना, उस पर गहन विचार-विमर्श करना, चिंतनशील प्रश्न पूछना तथा टिप्पणी करना उसके अधिगम का द्योतक माना जाता है।


आकलन व मूल्यांकन के निर्माणवादी प्रारूप में अधिगम उद्देश्य अधिगम संलग्नता के रूप में निर्धारित किए जाते हैं तथा इनका निर्धारण संबंधित शिक्षक के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों द्वारा अपनी रुचि, अभिक्षमता तथा अधिगम शैली के अनुरूप किया जाता है।

इस प्रकार एक ही पाठ को सीखने के लिए विद्यार्थियों के अधिगम उद्देश्य तथा गतिविधियाँ अलग अलग हो सकते हैं। यदि विद्यार्थी इस प्रक्रिया में संलग्न रहता है तथा इसे सफलतापूर्वक संपन्न कर लेता है तो उसका अधिगम सुनिश्चित हो जाता है।


आकलन व मूल्यांकन की प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहती है, विद्यार्थियों के अधिगम तथा क्रमशः विकास के लिए आवश्यक प्रतिपुष्टि भी नियमित रूप से प्राप्त होती है। इससे शैक्षणिक गतिविधियों तथा विद्यार्थियों के अधिगम युक्तियों में क्रमशः गुणात्मक सुधार आता है। इस प्रकार निर्माणवादी आकलन व मूल्यांकन की प्रकृति रचनात्मक, निदानात्मक एवं उपचारात्मक होती है। साथ-ही-साथ यह व्यापक या समग्र रूप से विद्यार्थियों के अधिगम का आकलन करती है। उनके अधिगम के विभिन्न आयामों संज्ञानात्मक, क्रियात्मक तथा भावात्मक सभी पक्षों का आकलन होता है। उनके पाठ क्रियाओं से जुड़ी क्षमताओं के साथ-साथ पाठ-सहगामी क्रिया संबंधी क्षमताओं का भी आकलन होता है।

इस प्रकार निर्माणवादी आकलन व मूल्यांकन की प्रकृति सतत एवं व्यापक होती है। निर्माणवादी आकलन व मूल्यांकन में स्व मूल्यांकन या समूह साथी मूल्यांकन के लिए विशेष स्थान होता है। इस युक्ति द्वारा विद्यार्थी आकलन को अधिगम के रूप में अनुभव करते हैं। यह उनके पाठ्य-वस्तु के समझ में समृद्धि करता है तथा उनके परा-संज्ञानात्मक कौशलों का भी विकास करता है।


आकलन व मूल्यांकन की प्रक्रिया परंपरागत आकलन उपकरणों एवं युक्तियों के साथ-साथ कई वैकल्पिक आकलन उपकरणों एवं युक्तियों को व्यवहार में लाती है। उदहारणस्वरूप- अवलोकन, रेटिंग स्केल, साक्षात्कार, पोर्टफोलियो, प्रदत्त कार्य, परियोजना, प्रस्तुतीकरण, समूह साथी मूल्यांकन, प्रश्नोत्तरी, रचनात्मक अभिव्यक्ति इत्यादि।

ये वैकल्पिक आकलन उपकरण एवं युक्तियाँ परंपरागत आकलन व्यवस्था को निर्माणवादी प्रारूप प्रदान करती है। विद्यार्थियों के अधिगम तथा विकास का सतत आकलन सहज तथा प्रभावशाली ढंग से संचालित होता है। इन उपकरणों द्वारा व्यापक आकलन भी संभव है क्योंकि यह विद्यार्थियों के अधिगम के विभिन्न आयामों संज्ञानात्मक, क्रियात्मक तथा भावनात्मक सभी पक्षों को समावेशित करते हैं। लिखित तथा मौखिक परीक्षा की संरचना तथा संगठन में आवश्यक परिवर्तन लाकर इनका उपयोग निर्माणवादी आकलन व मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है। इसमें उच्च चिंतन कौशलों या विचारशील चिंतन पर आधारित प्रश्नों की समुचित संख्या होनी चाहिए ताकी विद्यार्थियों में रटने की प्रवृति के स्थान पर विचारशील चिंतन की क्षमता विकसित हो। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में बहुविकल्पीय प्रश्न समुचित संख्या में पूछे जाने चाहिए।


विद्यार्थियों के अधिगम का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन उनके परीक्षा के प्रति भय का भाव एवं रटने की प्रवृति कम कर देता है तथा उनके विशिष्ट क्षमताओं एवं सृजनात्मकता का संवर्धन करता है एवं उनके व्यक्तित्व को समग्र रूप से विकसित करता है।