परामर्श की विधियाँ एवं तकनीक - Consulting Methods and Techniques
परामर्श की विधियाँ एवं तकनीक - Consulting Methods and Techniques
परामर्श द्वारा प्रयुक्त विधियाँ एवं तकनीक विद्यार्थी की विशेषता और व्यक्तित्व के अनुसार होनी चाहिए। विलियमसन ने परामर्श-तकनीकों को निम्नलिखित पाँच शीर्षकों के अंतर्गत वर्णित किया है-
1. मधुर सम्बन्ध स्थापित करना- जब पहली बार सेवार्थी परामर्शदाता के पास आता है तो परामर्शदाता का सबसे पहला कार्य होता है कि वह उसके साथ स्वागतपूर्ण तरीके से पेश आये । उसे आरामदेह स्थिति में लाकर सेवार्थी को विश्वास में ले लेना चाहिए मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का मुख्य आधार होता है परामर्शदाता की योग्यता की ख्याति, व्यक्तिगतता का सम्मान तथा साक्षात्कार से पहले विश्वास और सेवार्थी के साथ संबंधों को विकसित करना।
2. स्वयं-बोध उत्पन्न करना सेवार्थी को स्वयं की योग्यताओं और उत्तरदायित्वों का स्पष्ट ज्ञान एवं समझ होनी चाहिए। इन सबकी समझ सेवार्थी को इन योग्यताओं और उत्तरदायित्वों के प्रयोग से पहले ही हो जानी चाहिए। इसके लिए परामर्शदाता को परीक्षण-संचालन और परीक्षण अंकों की व्याख्या का अनुभव होना आवश्यक है। परीक्षण-अंक निदान और पूर्व अनुमान परामर्श प्रक्रिया में ठोस आधार प्रदान करते हैं।
3. परामर्श क्रिया के लिए कार्यक्रम का नियोजन और सुझाव- परामर्शदाता सेवार्थी के लक्ष्यों, उसकी अभिवृत्तियों या दृष्टिकोणों आदि से प्रारंभ करता है
तथा अनुकूल और प्रतिकूल आँकड़ों या तथ्यों की ओर संकेत करता है। वह साक्षियों या प्रमाणों को तौलता है और वह इस तथ्य को समझता है कि वह विद्यार्थी को कोई विशेष सुझाव क्यों दे रहा है। विलियमसन का मानना है कि परामर्शदाता को अपने दृष्टिकोण का कथन निश्चितता से करना चाहिए। उसे अनिर्णायक की तरह नहीं दिखना चाहिए।
परामर्शदाता प्रत्यक्ष सुझाव या सलाह देने से नहीं डरता है क्योंकि सेवार्थी आँकड़ों का उपयोग नहीं समझ सकता है। विलियमसन ने आँकड़े इकट्ठे करने के पश्चात् सेवार्थी को सलाह देने की निम्न विधियाँ बताई हैं-
i. प्रत्यक्ष सलाह- इसमें परामर्शदाता निर्भय होकर अपनी राय बता देता है। इस प्रकार की पद्धति बड़े कठोर मस्तिष्क वाले लोगों के लिए उपयुक्त है जो किसी भी क्रिया या गतिविधि का विरोध नहीं करते हैं तथा फेल होने से भी नहीं डरते हैं।
ii. पर्शुएसिव (Persuasive) विधि- यह विधि तब लाभकारी होती है जब आँकड़े स्पष्ट रूप से कोई निश्चित विकल्प की ओर संकेत करते हैं। परामर्शदाता प्रमाणों का केवल विश्लेषण करता है और विकल्पित क्रियाओं के परिणामों को देखता है।
4. व्याख्यात्मक विधि व्याख्यात्मक विधि परामर्श में सबसे अधिक वांछित विधि है। इसमें परामर्शदाता ध्यानपूर्वक लेकिन धीरे-धीरे निदानात्मक आँकड़े को समझता है और उन संभावित स्थितियों की ओर संकेत करता है जिनमें सेवार्थी की शक्तियों या क्षमताओं का प्रयोग किया जा सकता हो। इसमें आँकड़ों के उपयोग को सविस्तार और ध्यानपूर्वक तर्क सहित समझाया जाता है। इस सहायता में उपचारात्मक कार्य और शैक्षिक या शिक्षण नियोजन का कार्य सम्मिलित होते हैं।
5. अन्य कार्यकर्ताओं का सहयोग- कोई भी परामर्शदाता सभी प्रकार के सेवार्थियों/विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता है। उसे अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए तथा उसे विशिष्टीकृत सहायता के स्रोतों का ज्ञान होना चाहिए। उसे विद्यार्थियों को अन्य उपयुक्त स्रोतों से सहायता प्राप्त करने की सलाह देनी चाहिए।
इन उपर्युक्त विधियों एवं तकनीकों के अतिरिक्त कुछ अन्य परामर्श प्रविधियाँ भी हैं जो निम्नलिखित हैं-
1. मौन धारण- कभी-कभी कई परिस्थितियों में मौन रहकर किसी की बात को सुनना बोलने से अधिक प्रभावशाली होता है । जब सेवार्थी अपनी समस्या का वर्णन कर रहा होता है तब परामर्शदाता सेवार्थी की बात को बड़े गौर से सुनता है तथा उस पर गंभीरता से विचार करता है
2. स्वीकृति परामर्शदाता सेवार्थी की बात को अस्थायी स्वीकृति देता है। कई बार परामर्शदाता कुछ शब्द इस प्रकार से कह देता है जिनसे यह मालूम पड़ जाता है कि सेवार्थी जो कुछ कह रहा है उसे वह स्पष्टतः समझ रहा है। परन्तु इन शब्दों को परामर्शदाता इस तरह कहता है जिससे सेवार्थी के बोलने के धाराप्रवाह में कोई रुकावट नहीं आती है । उदाहरणार्थ, 'ठीक है', 'बहुत अच्छा', 'हूँ' इत्यादि । कई अवसरों पर परामर्शदाता अपनी स्वीकृति प्रदान करने के लिए कोई शब्द नहीं कहता, केवल स्वीकारात्मक ढंग से सिर ही हिला देता है।
3. स्पष्टीकरण- कई अवसरों पर परामर्शदाता को चाहिए कि वह सेवार्थी की बातों का या उसके द्वारा दिए गए वर्णन का स्पष्टीकरण करे। परामर्शदाता का यह कर्तव्य है
कि वह सेवार्थी को इस बात से परिचित करा दे कि वह उसे समझ रहा है तथा स्वीकार करता है। कभी-कभी परामर्शदाता को यह आवश्यक हो जाता है कि वह सेवार्थी के वर्णन का स्पष्टीकरण कर दे, परन्तु स्पष्टीकरण करते समय सेवार्थी को किसी प्रकार की ज़ोर ज़बरदस्ती का आभास नहीं होना चाहिए।
4. पुनर्कथन स्वीकृति एवं पुनरावृत्ति दोनों से ही सेवार्थी को यह बोध होता है कि परामर्शदाता उसकी बात को समझ रहा है तथा स्वीकार करता है। पुनरावृत्ति के द्वारा परामर्शदाता उसी बात को दोहराता है जिसे सेवार्थी ने वर्णित किया है परन्तु परामर्शदाता पुनर्कथन के समय किसी प्रकार का संशोधन या स्पष्टीकरण सेवार्थी के मापन में नहीं करता है।
5. मान्यता- अपनी समस्या के बारे में सेवार्थी विभिन्न विचार व्यक्त करता है। परामर्शदाता इन विचारों में कुछ को मान्यता प्रदान कर देता है तथा कुछ को नहीं। जिन विचारों को मान्यता प्रदान कर दी जाती से है वे सेवार्थी को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। सेवार्थी परामर्शदाता के ज्ञान एवं व्यक्तित्व से भी प्रभावित होता है।
6. प्रश्न पूछना सेवार्थी को अपनी समस्याओं के सम्बन्ध में अधिक विचार करने की प्रेरणा देने के लिए परामर्शदाता को कुछ प्रश्न पूछने चाहिए। ये प्रश्न सेवार्थी के वक्तव्य का अंश समाप्त होने के पश्चात ही पूछे जाने चाहिए।
7. हास्य रस- परामर्श के दौरान सेवार्थी का तनाव दूर करने के लिए तथा वार्तालाप को रूचिकर बनाने के लिए हास्य रस का प्रयोग करना भी एक आवश्यकता सी बन जाती है।
8. सारांश स्पष्टीकरण- सेवार्थी के वक्तव्य का कुछ भाग लाभकारी नहीं भी हो सकता है। इसके कारण समस्या स्वयं ही सेवार्थी को अस्पष्ट दिखाई देती है। ऐसी स्थिति में परामर्शदाता के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह सेवार्थी के भाषण को संक्षिप्त करे तथा उसका संगठन करे जिससे सेवार्थी समस्या को अधिक स्पष्ट रूप से समझ सके परामर्शदाता का प्रयास यही रहना चाहिए कि वह कभी भी अपनी ओर से विचार ना जोड़े।
9. विश्लेषण - सेवार्थी की समस्या के लिए परामर्शदाता समाधान प्रस्तुत करने की पहल कर सकता है। लेकिन परामर्शदाता सेवार्थी से उस हल पर अमल नहीं करवा सकता। परामर्शदाता सेवार्थी पर ही छोड़ देता है कि वह उस समाधान को स्वीकार करे या अस्वीकार करे या उसमें कुछ संशोधन करे। इस सम्बन्ध में सेवार्थी पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाता है।
10. व्याख्या या विवेचना- परामर्शदाता को सेवार्थी के वक्तव्य की ही विवेचना या व्याख्या करने का अधिकार होना चाहिए । उसे अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ना चाहिए। परामर्शदाता व्याख्या द्वारा सेवार्थी के वक्तव्य का परिणाम निकालता है। इन निष्कर्षों को निकालने में अकेला सेवार्थी असमर्थ होता है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि परामर्शदाता द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अन्य परीक्षणों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों से मेल खा सकते हैं और नहीं भी।
11.परित्याग- कई बार सेवार्थी जो कहता या सोचता है वह त्रुटिपूर्ण होता है इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण विचारधाराओं को त्यागना चाहिए। इसका परित्याग करने के लिए परामर्शदाता को बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए ताकि सेवार्थी विद्रोही प्रवृत्ति का न हो जाए और इस परित्याग का उल्टा अर्थ न निकाल ले।
12. आश्वासन परामर्श की सबसे महत्वपूर्ण तथा मनोवैज्ञानिक पक्ष से जुड़ी प्रविधि के रूप में 'आश्वासन' प्रदान करने से सेवार्थी की समस्या हल होने की आशा बंध जाती है। आश्वासन द्वारा परामर्शदाता सेवार्थी के कथनों को स्वीकार भी करता है और स्वीकृति के साथ-साथ अनुमोदित या समर्थन प्रदान करता है आश्वासन के समान प्रभाव दिखाई देते हैं। आश्वासन को स्वीकृति से अधिक विस्तृत या व्यापक माना जाता है। अतः आश्वासन में स्वीकृति भी सम्मिलित होती है।
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