उपभोक्ता व्यवहार का सिद्धान्त - consumer behavior theory
उपभोक्ता व्यवहार का सिद्धान्त - consumer behavior theory
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. मार्शल ने प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों तथा गणित विशेषज्ञ प्रो. के जेवन्स व वालरस द्वारा प्रतिपादित आर्थिक विचारों के आधार पर सीमान्त उपयोगिता पर आधारित, उपभोक्ता व्यवहार सिद्धान्त का विकास किया। प्रो मार्शल के अनुसार किसी वस्तु या सेवा में आवश्यकता को सन्तुष्ट करने की शक्ति अथवा क्षमता को ही उपयोगिता कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति की रोटी खाने से भूख शान्त होती है तो हम कह सकते हैं कि रोटी में भूख शांत करने की जो क्षमता है, वही उसकी उपयोगिता भी है। प्रो मार्शल के अनुसार उपयोगिता की निम्न विशेषताएँ होती हैं:
(1) उपयोगिता का सदैव लाभदायक अथवा कल्याणकारी होना जरूरी नहीं है-उपयोगिता का सम्बन्ध हमेशा लाभदायक हो यह आवश्यक नहीं हैं, जैसे शराब,
सिगरेट, अफीम आदि के उपभोग में उपयोगिता तो प्राप्त होती हैं क्योंकि इनके उपयोग से उपभोक्ता को सन्तुष्टिमिलती है, परन्तु इनसे लाभदायकता के स्थान पर स्वास्थ्य की हानि होती है। अतः अर्थशास्त्र में उपयोगिता का लाभदायकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।
(2) उपयोगिता व्यक्तिगत होती है- उपयोगिता का सम्बन्ध व्यक्ति से होता है क्योंकि एक वस्तु एक व्यक्ति के लिए उपयोगी तथा दुसरे व्यक्ति के लिए अनुपयोगी हो सकती है।
(3) उपयोगिता आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करती है- व्यक्ति को भूख लगने पर रोटी उसके लिए उपयोगी तथा दूसरे व्यक्ति के लिए अनुपयोगी हो सकती है।
(4) उपयोगिता एक सापेक्षिक शब्द है यह व्यक्ति, समय तथा स्थान के साथ बदलती रहती है। एक वस्तु एक व्यक्ति विशेष के लिए, एक समय में उपयोगी हो सकती है तथा दुसरे समय में अनुपयोगी। जैसे गर्मी में बर्फ उपयोगी होती है परन्तु सर्दी में नहीं। शराब एक शराबी के लिए उपयोगी है परन्तु शराब नहीं पीने वालों के लिए यह अनुपयोगि है।
( 5 ) उपयोगिता व सन्तुष्टिमें अन्तर है- उपयोगिता का अर्थ प्रत्याशित उपयोगिता (expected utility) से होता है। अपभोक्ता उपयोगिता के बारे में उस समय विचार करता है जब वही किसी वस्तु को खरीदने की सोचता है। अत: उपयोगिता वास्तविक उपभोग पर निर्भर नहीं करती । इसके विपरीत सन्तुष्टिसे अभिप्राय किसी वस्तु के प्रयोग से प्राप्त उपयोगिता से है।
(6) उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक विचार है-इसे केवल अनुभव किया जा सकता उपयोगिता को स्पर्श करके या आखों से देखा नहीं जा सकता। यह धारणा व्यक्ति की आन्तरिक भावना से सम्बन्ध रखती है। इसका कोई भौतिक रूप नहीं होता है।
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