सतत और व्यापक मूल्यांकन: उद्देश्य, सिद्धान्त और आवश्यकता - Continuous and Comprehensive Evaluation: Objectives, Principles and Needs

सतत और व्यापक मूल्यांकन: उद्देश्य, सिद्धान्त और आवश्यकता - Continuous and Comprehensive Evaluation: Objectives, Principles and Needs


सतत एवं व्यापक मूल्यांकन शिक्षा के उद्देश्यों से निकली एक कड़ी है जो बच्चे के व्यापक विकास की प्रक्रिया को सुगम करने में सहायक होती है। इसमें अन्तर्निहित सिद्धान्त शिक्षाशास्त्र के मजबूत आधारों पर टिके हैं और आकलन को कक्षा में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के अभिन्न अंग के रूप में पेश करते हैं ताकि सही मायने में शिक्षा के उद्देश्यों को साकार किया जा सके। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में न सिर्फ स्कूली ज्ञान के विभिन्न क्षेत्र आकलन का विषय होते हैं बल्कि कला, कौशल, बच्चे के रुचि रुझान एवं सामाजिक अभिवृत्ति और मूल्य आदि भी इसमें शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया बच्चे की जरूरत के हिसाब से शिक्षक को अधिक उत्तरदायी बनाने और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को जरूरत के अनुसार परिवर्तित करने में सहायक होती है। आकलन की यह नई समझ बच्चों को तनाव, भय, चिंता आदि से दूर रखने का भी कारगर उपाय है। साथ ही बच्चों के कार्यों का रिकार्ड और दस्तावेजीकरण बच्चों का सीखना कैसे होता है. इस पर शिक्षक और सीखने वाले की समझ को भी समृद्ध करने में मदद करता है। यह अभिभावकों के लिए बच्चों के सीखने का एक प्रमाण भी पेश करता है।


यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि पिछले कुछ दशकों में बच्चों के प्रति नजरिए में बदलाव आया है। पहले यह माना जाता था कि बच्चे महज कोरी स्लेट हैं। यह सीखने के सिद्धान्तों में बदलाव का द्योतक भी है। हम जानते हैं कि समस्त सीखना किसी अनुकरण या अभ्यास मात्रा से संभव नहीं है। बच्चा जब स्कूल आता है तो एक हद तक वह अपने समुदाय और परिवेश का ज्ञान अपने साथ लेकर आता है। बच्चों के शिक्षण के लिए इसके खास निहितार्थ हैं -


स्कूल में बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को बच्चे के पूर्व ज्ञान में बढ़ोतरी या उसके सीखने की निरंतरता के रूप में स्वीकारना। स्कूल आने से पूर्व ज्ञान को महत्त्व देना।


* बच्चे का एक व्यक्ति के तौर पर सम्मान करना।


* बच्चे की सीखने की प्रक्रिया के अनुकूल शिक्षण विधि अपनाना।


* शिक्षण विधियों में ही आकलन के तरीके और उपकरणों को शामिल करना।


हर व्यक्ति का सीखना एक जैसा नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार चीज़ों को समझता है तथा अर्थ निर्माण करता है। हम सभी जानते हैं कि किन्हीं दो व्यक्तियों के अनुभव एक जैसे नहीं होते। प्रत्येक बच्चे की एक दूसरे से अलग व स्वतंत्रा सत्ता को स्वीकारने के साथ ही यह बात भी माननी चाहिए कि प्रत्येक बच्चे के सीखने की प्रक्रिया भिन्न हो सकती है। आकलन के परम्परागत तरीके इसकी अनदेखी करते हैं। पास फेल की परिपाटी केवल कुछ बच्चों को ही आगे बढ़ने के अवसर देती है। परीक्षा प्रणाली एक प्रकार से पास-फेल और डिवीजन के मार्फत समाज में फैली गैर-बराबरी को ही पोषित करती है। इसके अलावा एक और बात है जो परम्परागत आकलन के तरीकों में बदलावकी मांग करती है। एक समस्या इस प्रणाली का बहुत ज्यादा पाठ्यक्रम केन्द्रित होना है। स्कूली ज्ञान के परम्परागत विषय क्षेत्रों के अलावा बच्चे की प्रतिभा के विभिन्न आयामों को आकलन का हिस्सा ही नहीं बनाया जाता। यह प्रणाली बच्चों में भ्रम पैदा करती है कि जितना भी ज्ञान है वह स्कूली किताबों में मौजूद है। इसमें ज्ञान को एक सीमित मायने में ही अहमियत दी जाती है। बच्चे की व्यक्तिगत रुचियों, विशेषताओं और रुझानों को परम्परागत प्रणाली महत्त्व नहीं देती। अतः आकलन की एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाए जिसमें-


• बच्चों के द्वारा सीखे गए का आकलन सीखने के दौरान लगातार चलता रहे न कि सारा दारोमदार सत्र के अंत की परीक्षाओं पर हो और जरूरत होने पर उसे मदद मुहैया कराई जा सके।


• बच्चों के सीखने की गति और रुचियों को ध्यान में रखते हुए विविध उपकरणों और शिक्षण विधियों का उपयोग किया जाए ताकि हर एक बच्चा सीख सके।


• प्रत्येक बच्चे की अभिरुचियों और व्यक्तिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उनका भी आकलन किया जाए ताकि बच्चे का व्यापक विकास संभव हो सके।


बच्चे के अपने परिवेशीय ज्ञान को कक्षा-कक्ष और स्कूल में जगह मिल सके ताकि वह अपने-आपको अन्य बच्चों जिन्हें तथाकथित रूप से 'तेज' कहा जाता है से हीन न समझे और उनमें समानता का भाव विकसित हो सके। सभी बच्चे पास फेल के चंगुल से मुक्त होकर परीक्षा के भय से मुक्त हो सकें।