भाषा विकास में शिक्षा का योगदान - Contribution of Education in Language Development

भाषा विकास में शिक्षा का योगदान - Contribution of Education in Language Development

अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)


1. बालकों के भाषा विकास को उन्नत बनाने में माता-पिता व अन्य परिजनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।


2. भाषा विकास में पारिवारिक वातावरण का महत्वपूर्ण स्थान होता है।


3. बच्चों में भाषा विकास के लिए श्रवण संवेदना का विकसित होना आवश्यक है। 


4. बच्चे अन्य व्यक्तियों के शब्दों को जिस ढंग से बोलते हुए या प्रयुक्त करते हुए सुनते हैं वे अनुकरण द्वारा उन्शब्दों को उसी ढंग से बोलना व प्रयोग करना सीख लेते हैं।


5. भाषा विकास में बच्चों के साथ होने वाली बातचीत भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। 


6. भाषा विकास में बच्चों को सुनाई कहानियों तथा गीतों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहता है।


7. माता-पिता को अपने बच्चों को पुस्तकों, समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं आदि को पढ़ने के समुचित अवसर देने चाहिए। 


8. माता-पिता को बच्चों को पर्याप्त बोलने व सुनने के भी अवसर देने चाहिए।


9. भाषा विकास में खेल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। खेल के मैदान में बालकों को तरह-तरह के नए-नए शब्दों को सुनने का अवसर मिलता है।


10. बच्चों के समुचित भाषा विकास के लिए माता-पिता को उन्हें दोषपूर्ण पारिवारिक वातावरण से यथासम्भव अलग-थलग रखना चाहिए एवं बालक में किसी प्रकार का बाणी दोष होने पर उसे दूर करने का तत्काल प्रयास करना चाहिए।


औपचारिक शिक्षा ( Formal Education)


भाषा विकास की प्रक्रिया में औपचारिक शिक्षा का भी महत्वपूर्ण स्थान रहता है। 


1. बच्चे जिस रूप में शब्दों का उच्चारण सुनते हैं, उसी रूप में उनका उच्चारण करना सीख लेते हैं एवं शिक्षक उसके अनुकरणीय व्यक्ति होते हैं।


2. कक्षा में शिक्षकों को शिक्षार्थियों के बीच पाये जाने वाले वैयक्तिक विभेदों को भी ध्यान में रखना चाहिए।


3. रुचि के अभाव में प्रायः शिक्षार्थी न तो अपनी शिक्षा की ओर न ही भाषा विकास की ओर आवश्यक ध्यान दे पाते हैं। फलतः वे नए-नए शब्दों को सीखने के अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते हैं।


4. विद्यालय में शिक्षार्थियों को आवश्यकतानुसार कहानी कविता व एकांकी आदि सुनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।


5. बिद्यालय में वाद-विवाद की व्यवस्था करके छात्रों को बोलने के पर्याप्त अवसर भी दिये जाने चाहिए। 


6. बच्चे खेलकूद के माध्यम से नये-नये शब्दों को शीघ्रता व सहजता से सीख लेते हैं। इसके अलावा खेल के मैदान में तथा खेल प्रतियोगिताओं के दौरान शिक्षार्थियों को बोलने व स्वयं को अभिव्यक्ती करने के भी अवसर मिलते हैं। 


गैर- औपचारिक शिक्षा ( Non Formal Education)


बालकों के भाषा विकास में संचार उपक्रम तथा सामाजिक व धार्मिक समस्याओं आदि की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। 


1. बच्चे रे डोटी वी व अन्य श्रव्य साधनों से शब्दों को जिस ढंग से बोलते हुए सुनते हैं,

वे उसी का अनुकरण करने लगते हैं तथा उसी ढंग से उच्चारण करना, शब्दों का प्रयोग करना तथा वाक्य संरचना करना सीख लेते हैं। 


2. श्रवण संवेदना का अधिकतम विकास करके ही बच्चों में अनुकूलतम भाषा विकास को प्रशस्त किया जा सकता है।


3. बच्चों द्वारा धार्मिक ग्रंथों का सुस्वर वाचन भी उनके भाषा विकास को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। 


4. सामाजिक संगठनों के द्वारा किये जाने वाले आयोजन भी प्रकारान्तर से बच्चों के भाषा विकास को प्रभावित करते है।