पत्राचार शिक्षा - correspondence education
पत्राचार शिक्षा - correspondence education
शिक्षा का उदेश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना तथा सबको शिक्षित करना है किन्तु भारत जैसे विशाल देश में इस उद्देश्य की पूर्ति कर पाना बहुत ही जटिल कार्य है। 1964 ई. में कोठारी आयोग ने पत्राचार शिक्षा की सिफारिश करते हुए ये विचार व्यक्त किए-
एक ऐसी प्रणाली चाहिए जो आवश्यक रूप से शिक्षा को ऐसे लोगों तक पहुँचाए, जो अपने निजी प्रयास से, अपने सुविधानुसार और अपने द्वारा चुने गए समय पर अध्ययन करना चाहते हैं।
पत्राचार शिक्षा की आवश्यकता
शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में विस्तार को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है, कि सभी व्यक्तियों को शिक्षा दी जाए। जो नियमित रूप से विद्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हैं वे आगे शिक्षा प्राप्त कर सकें । वे छात्र जो पारिवारिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से वंचित रह गए हों अथवा बीच में ही उन्हें अध्ययन छोड़ना पड़ा वे पुनः अपनी शिक्षा जारी रख सकते है। इस व्यवस्था में व्यक्ति घर पर तथा अंशकालिक रूप से अपनी सुविधानुसार पढ़ सकता है।
पत्राचार पाठ्यक्रम में प्रयुक्त की जाने वाली सामग्री इस पाठ्यक्रम में मुख्यतः दो तरह की सामगी प्रयोग में लाई जाती है-
1.मुद्रित सामग्री
2. अमुद्रित सामग्री ।
मुद्रित सामग्री की श्रेणी में आते हैं- पत्राचार पाठ्य पुस्तक, अभिक्रमित सामग्री, चित्र, चार्ट, रेखाचित्र तथा अन्य दृश्य सामग्री, अन्य पुस्तकें, संदर्भ सामग्री जो शैक्षिक संगठन द्वारा विद्यार्थियों को दी जाती है, इसके अतिरिक्त संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले गृहकार्य, स्वयं किए गए गृह कार्य । अमुद्रित सामग्री की श्रेणी में स्लाइड्स, फिल्मस्ट्रिप्स, फिल्म, फिल्मलूप्स, ओडियो टेप्स, वीडियो टेप्स, वीडियो डिस्क, रिकाडर्स तथा अकाशवाणी व दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रम टेली टीचिंग तथा टेलीकॉन्फ्रेंसिंग आते हैं।
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