सृजनशील विद्यार्थियों की शिक्षा - creative student education
सृजनशील विद्यार्थियों की शिक्षा - creative student education
ग्राहम वालेस ने चार दशक पहले साक्षात्कारों, प्रश्नावलियों तथा संस्मरणों की सहायता से, प्रख्यात सृजनात्मक चिंतकों की चिन्तन प्रक्रिया में निहित चरणों का अध्ययन किया। उन्होंने पता लगाया कि यद्यपि चिन्तन में वैयक्तिक भिन्नताएँ होती हैं तथापि इसका एक क्रमबद्ध स्वरूप भी होता है। उन्होंने पाँच चरणों: तैयारी, उद्भवन, प्रदीप्तिकरण, मूल्यांकन, तथा समीक्षा, का उल्लेख किया है।
1. तैयारी: चिन्तन करने वाला व्यक्ति, समस्याओं का रेखांकन करता है तथा समस्या-समाधान के लिए आवश्यक सामग्रियों तथा प्रदत्तों को एकत्र करता है। कई दिनों, सप्ताहों तथा महीनों तक सतत प्रयास के बावजूद समस्या का हल नहीं मिलता है। चिंतक जानबूझकर या अनिच्छा से अपने को इस प्रक्रिया से अलग कर लेता है। यहाँ से दूसरे चरण की शुरूआत होती है। यहाँ मानसिक विन्यास तथा कार्यात्मक जड़ता ( नदबजपवदंस पिगपलि) से व्यक्ति को दूर रहने की जरूरत होती है।
2. उद्भवनः जैसे ही व्यक्ति समस्या से हट जाता है तथा उसके बारे में नहीं सोचता है, त्यों ही, मानसिक सेट, प्रकार्यात्मक स्थिरता या अन्य विचार, जो सामाधान को बाधित करते हैं, कमजोर पड़ जाते हैं। शायद थकान या समस्या में अधिक तल्लीनता भी इस अवधि में कम हो जाती है। सृजात्मक चिन्तन में संलग्न अचेतन चिन्तन प्रक्रिया भी इस चरण में कार्य करने लगती है।
3.प्रदीप्ति करण: जब कहीं से कुछ नहीं होता, तो अंतर्दृष्टि के रूप में समस्या का संभावित समाधान दिखता है। प्रदीप्तन, आहा के साथ समाधान के एक अचानक विचार के रूप में चेतना में घटित होता है।
4.मूल्यांकन: जो समाधान प्राप्त होता हैं, उसकी उपयुक्तता की जाँच या परीक्षण किया जाता है। जो सूझ मिलती है वह अक्सर असंतोषदायी भी होती हैं, जिनमें परिमार्जन आवश्यक होता है।
5. पुनः समीक्षा: यदि हम संतोषदायी समाधान तक नहीं पहुँचा पाते तो पुनः समीक्षा (त्मअपेपवद ) आवश्यक हो जाती है।
हमने सृजानात्मक चिन्तन के जिन चरणों का विवेचन किया है, उनसे इनके चरणों की एक सामान्य तस्वीर मिलती है, जो अत्यन्त सृजनशील या प्रतिभावान लोगों द्वारा, समस्या समाधान के लिए अपनायी जाती है। सृजनात्मक चिन्तन के अध्ययन का एक दूसरा दृष्टिकोण इस तरह के चिन्तन की समस्या समाधान से भिन्नता पर ध्यान देता है।
एक शिक्षक होने के नाते, यह हमारा कर्तव्य है कि हम बच्चों के भीतर मौजूद सृजनात्मक क्षमताओं की पहचान कर उनका विकास करे। सृजनात्मकता का विकास करने के लिए हम कक्षा में कुछ तरीके अपना सकते हैं, जिसमें से कुछ इस प्रकार है:
• विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता देना।
• अपने विचारों का आकलन करना तथा उनमें से उपयोगी विचारों का चुनाव करना। जोखिम लेने की क्षमता का विकास करना।
• बालकों का खुद पर विश्वास बढ़ाना कि वे जो कर रहे हैं वह ठीक है तथा उचित हैं।
• बालकों की यह चुनने में मदद करना कि उन्हें क्या पंसद है ?
• स्वयं सृजानात्मक सोच के साथ कार्य करके, बालकों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना। कक्षा शिक्षण के दौरान विद्यार्थियों से प्रायः पूछे कि क्या कोई इस समस्या का नया या भिन्न उत्तर देना चाहता है।" इस प्रकार के उत्तरों को कक्षा चर्चा में शामिल करें।
• यदि कक्षा में विभिन्न विचार आ रहे हैं तो उनके आधार पर संवाद को प्रोत्साहित करें।
• कई बार ऐसे भी प्रदत्त कार्य दें जो मूल्यांकन का हिस्सा न हो बल्कि उनमें रचनात्मक अभिव्यक्ति की संभावना हो।
• विद्यार्थियों में सृजनात्मक चिन्तन में संवर्धन का प्रयास कुछ युक्तिओं तथा उपकरणों का उपयोग करके किया जा सकता है। इनमें से प्रमुख हैं
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