रचनाशीलता , रचनाशीलता की प्रकृति तथा विशेषताएँ - Creativity, nature and characteristics of creativity

रचनाशीलता , रचनाशीलता की प्रकृति तथा विशेषताएँ - Creativity, nature and characteristics of creativity

रचनाशीलता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह किसी नए विचार या नई वस्तु का निर्माण करता है या किसी नई वस्तु की खोज करता है। इसके अंतर्गत व्यक्ति की यह योग्यता भी सम्मिलित है जिसके द्वारा वह पूर्व-प्राप्त ज्ञान का पुनर्गठन करता है।


रचनाशीलता की प्रकृति तथा विशेषताएँ


उपर्युक्त परिभाषा तथा रचनाशीलता के क्षेत्र में किए गए विभिन्न अध्ययनों के आधार पर रचनाशीलता की प्रकृति तथा उसकी विशेषताओं का निम्नलिखित रूप से उल्लेख किया जा सकता हैं


• रचनाशीलता सार्वभौमिक होती है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में कुछ-न-कुछ मात्रा में रचनाशीलता अवश्य होती है। 


• यद्यपि रचनाशील योग्यताएँ प्रकृति प्रदत्त होती हैं, परन्तु प्रशिक्षण या शिक्षा द्वारा उनको विकसित किया जा सकता है।


• रचनात्मक अभिव्यक्ति द्वारा किसी नई वस्तु को उत्पन्न किया जाता है परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह वस्तु पूर्णरूप से नई हो । पृथक रूप से दिए गए तत्वों से नए एवं ताज्ञा सम्मिश्रण का निर्माण करना, पहले से ज्ञात तथ्यों या सिद्धान्तों का पुनर्गठन करना, किसी पूर्व-ज्ञात शैली में सुधार करना आदि उतने ही रचनाशील कार्य हैं जितना रसायन विज्ञान का कोई नया तत्व ढूँढना या गणित का कोई नया सूत्र खोजना। रचनाशीलता में केवल इस बात के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है कि किसी ऐसी वस्तु की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए जिसका व्यक्ति को पहले से ज्ञान हो।


• कोई भी रचनात्मक अभिव्यक्ति रचनाकार के लिए आनंद तथा संतुष्टि का स्रोत होती है। रचनाकार जो देखता या अनुभव करता है, उसे अपने तरीके से प्रकट करता है।

रचनाकार अपनी रचना द्वारा ही अपने आप की अभिव्यक्ति करता है। रचनाकार अपने ही तरीके से वस्तुओं, व्यक्तियों तथा घटनाओं को देखता है। अतः यह आवश्यक नहीं कि 'रचना' प्रत्येक व्यक्ति को वही ‘अनुभव’ एवं वही 'संतोष' प्रदान करे जो रचनाकार को प्राप्त हुआ हो।


• 'रचनाकार' वह व्यक्ति है जो अपने अहम्' को इस प्रकार प्रकट कर सकता हो, "यह मेरी रचना है”, “यह मेरा विचार है”, “मैंने इस समस्या को हल किया है। अतः निर्माणात्मक क्रिया में अहम् अवश्य निहित रहता है।


• रचनाशील चिन्तन बंधा हुआ चिन्तन नहीं होता है। इसमें अनगिनत विकल्पों तथा इच्छित कार्य प्रणाली को चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है। पिटे - पिटाए मार्ग पर चलने से पुनरावृत्ति तो हो सकती है, नया निर्माण नहीं।


• रचनाशील अभिव्यक्ति का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है। वैज्ञानिक आविष्कार, कविता, कहानी, नाटक आदि लिखना, नृत्य-संगीत, चित्रकला, शिल्पकला, राजनीतिक एवं सामाजिक सम्बन्ध बनाना आदि में से कोई भी क्षेत्र इस प्रकार की अभिव्यक्ति की आधारभूमि बन सकता है। हमारी दैनिक क्रियाओं में भी रचनाशील की आवश्यकता होती है। अतः जीवन अपने समूचे रूप से रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए असंख्य अवसर प्रदान करता है।


• रचनाशीलता में कौन-से विविध ज्ञानात्मक तत्व शामिल होते हैं? इस प्रकार के उत्तर के लिए अत्यन्त प्रयोगात्मक तथा अनुसंधान की आवश्यकता है। जे.पी. गिल्फोर्ड, टॉरैंस, ड्रैवडाहल आदि कई विद्वानों ने रचनाशीलता के विविध तत्वों को खोजने का प्रयास किया है। परिणामस्वरूप प्रवाहात्मक विचारधारा, मौलिकता, लचीलापन, विविधतापूर्ण-चिन्तन, आत्मविश्वास, संवेदनशीलता, सम्बन्धों को देखने तथा बनाने की योग्यता आदि रचनात्मक प्रक्रिया में सहायक माने गए हैं।