समुदाय, विद्यालय और अन्य सामाजिक संगठनकृत / संगठनों द्वारा समाजीकरण की भूमिका का आलोचनात्मक अध्ययन - Critical study of the role of socialization by the community, school and other social organisations/organisations
समुदाय, विद्यालय और अन्य सामाजिक संगठनकृत / संगठनों द्वारा समाजीकरण की भूमिका का आलोचनात्मक अध्ययन - Critical study of the role of socialization by the community, school and other social organisations/organisations
भारतीय समाज में स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाती हैं वहीं पहचान की यह समस्या पुरुष के समक्ष नहीं आती क्योंकि उसकी पहचान स्थायी होती है। स्त्री की तो पहचान भी उसकी अपनी नहीं होती है। वह पहले पिता, फिर पति, फिर पुत्र पर अपनी पहचान के लिए निर्भर होती है, यह विचारणीय प्रश्न है। जेंडर के संदर्भ में समझा जाए तो स्त्री को सदा ही समाज ने कमजोर व आश्रित माना व बनाया जिसके लिए पहले पिता फिर पति फिर पुत्र के संरक्षण की व्यवस्था की गई ।
हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा लिखती हैं- "स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है। शरीर के केवल एक गुणसूत्र के अलग होने मात्र से हम स्त्री के व्यक्तित्व को पूर्णतः पुरुष से अलग कर देते हैं। जबकि ऐसा नहीं है यह शारीरिक संरचना भर है।" जेंडर आधारित पहचान का विकास सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो परिवार, समुदाय, विद्यालय एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रभाव में विकसित होती है।
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