कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of Kohlberg's theory of moral development

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत की आलोचना - Criticism of Kohlberg's theory of moral development


९. क्या नैतिक तर्क आवश्यक रुप से नैतिक व्यवहार का नेतृत्व करता है कोहलबर्ग का सिद्धांत नैतिक तर्क से संबंधित है किन्तु यह हमारे बास्तबिक कार्यों और उन कार्यों को करने वाले व जानने वाले के मध्य एक बड़ा अंतर दर्शाता है। इसीलिए, वास्तविक जीवन में इसकी उपयोगिता घट जाती है।


२. क्या न्याय नैतिक तर्क का इकलौता पहलू है जिस पर हम विचार करते हैं ?- आलोचकों का कहना है कि कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत नैतिक विकल्पों के रूप में न्याय के संप्रत्यय पर अधिक जोर देता है। इसलिए, यह संपूर्ण रूप से नैतिक विकास करने में सक्षम नहीं होगा। 


३. क्या कोहलबर्ग का सिद्धांत पश्चिमी दर्शन पर अधिक जोर देता है? व्यक्तिवादी संस्कृतियाँ व्यक्तिगत अधिकारों पर तथा सामूहिक संस्कृतियाँ समाज के महत्व पर जोर देती हैं। पूर्व की सामूहिक संस्कृतियों के नैतिक दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं जिनका समर्थन कोहलबर्ग का सिद्धांत नहीं करता। यह केवल व्यक्तिगत अधिकारों तक ही सीमित है। इसलिए सामाजिक स्तर पर नैतिक विकास के ध्येय को हासिल करना कठिन होता है।


४. कोहलबर्ग ने अपने शोध कार्य के लिए पाश्चात्य संस्कृति के पुरुषों के प्रतिदर्श का चयन किया था जिनमें अधिकांशतः अंग्रेज थे। इस सन्दर्भ में कैरल गिलिंगन (१९८२) ने देखभाल तथा राजित्व की नैतिकता /नीति (Ethics of Care and Responsibility) का सिद्धांत दिया जिसमें उन्होंने इस बात पर बल दिया कि नैतिकता मनुष्य के लिंग जाति, वंश, संप्रदाय, देश, काल एवं परिस्थिति से भी प्रभावित होती है।

गिलिंगन के अनुसार महिलाओं में दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं समर्पण की भावना अपेक्षाकृत जल्दी विकसित होती है और उनके नैतिक तर्क इससे प्रभावित होते हैं। अतः व्यक्ति (विशेषतया महिलाए) दूसरों (परिवार, साथी आदि) के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए धीरेधीरे आत्मकेंद्रित निर्णयों से नैतिक तर्क की और अग्रसर होता है। अंततः वह वसुधैव कुटुम्बकम की स्थिति तक पहुँच जाता है उदहारण के तौर पर मदर टेरेसा आदि |


इस प्रकार, विभिन्न आलोचनाओं के बावजूद कोहलबर्ग का सिद्धांत चर्चा हेतु नैतिक दुविधाओं को पेश करने के लिए शिक्षक के महत्व पर जोर देता है। साथ ही अगले नैतिक चरण में स्थानांतरित करने के लिए एक व्यक्ति के विचार को प्रोत्साहित भी करता है। शिक्षार्थियों के नैतिक विकास के लिए इन नैतिक चरणों के क्रम और विकास के विवरण को जानना शिक्षक के दायित्व का एक हिस्सा है। रोजमर्रा की जिंदगी में स्थितियों के लिए इस सिद्धांत के आवेदन को समझना संभवतः शिक्षक और छात्र दोनों के लिए उन्नत नैतिक तर्क की एक प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। इसलिए, अपने स्तर पर नैतिक तर्कों के विकास के लिए यह उपयोगी सिद्धांत है।