आकलन का वर्तमान परिदृश्य - Current Scenario of Assessment

आकलन का वर्तमान परिदृश्य - Current Scenario of Assessment


भारत में स्कूली शिक्षा के आकलन तथा मूल्यांकन की वर्तमान व्यवस्था परीक्षा-आधारित है। इसलिए, उसका ध्यान केवल संज्ञानात्मक ढंग से सीखने के परिणामों पर ही केन्द्रित रहता है। इस प्रक्रिया में पाठ्यक्रमेतर (को- करीकुलर) क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। हालाँकि को करीकुलर क्षेत्र भी बच्चे के विकास के समान रूप से महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। पाठ्यक्रम के क्षेत्रों में भी जोर रटकर सीखने और याद रखने पर रहता है, जिसका परिणाम उच्चतर मानसिक योग्यताओं, जैसे कि समीक्षात्मक सोच, समस्याओं का समाधान करना तथा सृजनात्मक योग्यता आदि की उपेक्षा के रूप में दिखाई देता है। भारत में, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005. ने शिक्षा के हर क्षेत्र की पड़ताल की है। यह दस्तावेज कहता है कि मूल्यांकन तथा आकलन के सन्दर्भ में परीक्षाओं में सर्वांगीण सुधारों की आवश्यकता है। सीखने वालों में असफल रहने वाले विद्यार्थियों की ऊँची दर. स्कूल छोड़ देने वाले विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या, अस्वास्थ्यप्रद स्पर्धा, तनाव, मानसिक रूप से टूटने तथा आत्महत्याओं के मामले भारतीय शिक्षाशास्त्रियों के लिए देश की मूल्यांकन व्यवस्था, जो वर्तमान में परीक्षा-उन्मुख है, की पड़ताल करना अनिवार्य रूप से आवश्यक बना देते हैं। समय की माँग हमारे युवा सीखने वालों को. रटकर सीखने वालों के बजाय, समस्याओं को सुलझाने वाले अभिनव विचारकों के रूप में तैयार करने की है।

परन्तु परीक्षा की वर्तमान व्यवस्था बिलकुल लचीली नहीं है। यह एक ही साइज सबको माफिक बैठ जाती है' के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसमें सीखने वाले के व्यक्तित्व और सृजनात्मकता पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह सीखने वालों के वास्तविक अन्तर्निहित सामर्थ्य को मापने में असफल रहती है और विद्यार्थियों को दिए जाने वाले अंक दरअसल कच्चे अंक होते हैं जो सीखने वालों की असली तस्वीर पेश नहीं करते। स्कूल अन्त की परीक्षाओं, जो बोर्ड परीक्षाएँ कहलाती हैं, के ढर्रे का ही स्कूलों में भी पालन किया जाता है और वहाँ भी जोर अंकों पर ही होता है, जिसके चलते शिक्षा का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाता है। परीक्षा के इस प्रतिकूल प्रभाव ने सिखाने तथा सीखने के शैक्षणिक सिद्धान्तों को खासी क्षति पहुँचाई है। इस विकृति को सुधारने के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 ने कुछ मार्गदर्शक सिद्धान्त प्रस्तावित किए हैं, जो इस प्रकार हैं


• ज्ञान को स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ना।


• यह सुनिश्चित करना कि सीखने को रटने की पद्धतियों से दूर कर लिया जाए।

• पाठ्यचर्या के पाठ्यपुस्तक पर केन्द्रित रहने के बजाय उसको बच्चों को व्यापक विकास प्रदान करने के लिए समृद्ध बनाना।


• परीक्षाओं को अधिक लचीला बनाना तथा उनको कक्षा के जीवन में समेकित करना।


• फिक्र करने योग्य सरोकारों के आधार पर देश की लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था के भीतर विद्यार्थी की एक सर्वोपरि राष्ट्रीय पहचान को पोषित करना। 


इन मार्गदर्शक सिद्धान्तों से सीखने-सिखाने के दृष्टिकोण में, पारम्परिक पद्धतियों से एक स्पष्ट परिवर्तन, अर्थात व्यवहारवाद से निर्माणवाद (कंस्ट्रक्टिविज्म) की ओर बदलाव दिखाई देता है।

शिक्षण का नया दृष्टिकोण सीखने वाले पर केन्द्रित है और आकलन की प्रक्रिया का लक्ष्य भी सीखने वालों की व्यापक प्रगति पर गौर करते हुए उनकी सीखने की क्षमताओं में वृद्धि करना होता है। दृष्टिकोण में आया यह परिवर्तन अपने आप में आकलन के उपकरणों तथा तकनीकों में बड़े बदलाव की माँग करता है।


राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 ने सीखने-सिखाने के दृष्टिकोण में पुराने व्यवहारवाद के दृष्टिकोण से निर्माणवाद के दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन प्रस्तावित किया है। व्यवहारवाद के दृष्टिकोण के अन्तर्गत विद्यार्थी की उपलब्धि का निर्धारण याददाश्त के आधार पर होता था, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतर संज्ञानात्मक (मेटा कॉग्नीटिव) कौशलों, जैसे कि समीक्षात्मक सोच. तर्क क्षमता तथा समस्याओं को सुलझाने की क्षमता पूरी तरह उपेक्षित रह जाती थीं। दूसरी ओर, निर्माणवाद की मान्यता है कि सीखना एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें अर्थ अनुभव के आधार पर विकसित होता है. और यह भी कि सीखने को वास्तविक स्थितियों में स्थापित किया गया होना चाहिए,

उसे सामाजिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना चाहिए और सीखने की विश्वसनीय सामग्री / कार्यों का उपयोग करना चाहिए। एक निर्माणवाद कक्षा में सीखने की प्रक्रिया में विद्यार्थियों को पहल करने के लिए प्रेरित किया जाता है। विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने, मुक्त रूप से पारस्परिक क्रियाकलाप करने और स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। और यह फिर उनको समीक्षात्मक विचार क्षमता तथा समस्याओं को सुलझाने का दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है। इस पद्धति के अंग के रूप में, विद्यार्थियों से उत्तरों की खुली सम्भावनाओं वाले तथा जानकारी के अनुमानित विस्तार पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं और उनके विचारों को समुचित मान्यता दी जाती है। सामूहिक कार्य तथा जोड़ों में किए जाने वाले कार्य को प्रोत्साहन दिया जाता है. क्योंकि विचारों का आदान-प्रदान अवधारणात्मक स्पष्टता तथा भाषा सीखने में सहायता करता है। निर्माणवादी पद्धति इस मान्यता पर आधारित है कि सभी मनुष्य अपना ज्ञान स्वयं निर्मित करते हैं, और सही अवसर तथा वातावरण दिए जाने पर सीखने वाले अपने ज्ञान की रचना स्वयं कर सकेंगे। शिक्षण की यह नई पद्धति अपने साथ ही स्कूलों में आकलन के तरीकों में भी संगत परिवर्तनों की माँग करती है।