पाठ्यचर्या के प्रकार - Curriculum Type

पाठ्यचर्या के प्रकार - Curriculum Type


पाठ्यचर्या का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जाता है। सामान्यता पाठ्यचर्या के प्रमुख प्रकार निम्नवत प्रस्तुत किए जा सकते हैं-


(1) विषय-केंद्रित पाठ्यचर्या विषय केंद्रित पाठ्यचर्या में विविध विषयों की प्रधानता रहती है। इसमें ज्ञान की खंड-खंड में विषयों में समाहित किया गया होता है। यह पूर्णतः संकुचित तथा जीवन के लिए अनुपयोगी होता है। विषय केंद्रित पाठ्यचर्या में व्यवहारिक पक्ष की अपेक्षा सैद्धांतिक पहलुओं को अधिक महत्व दिया जाता है। सभी विद्यार्थी एक ही तथ्य का अध्ययन करते हैं, जिससे उनकी रुचि, आवश्यकता, अभिक्षमता की अवहेलना होता है। यह पाठ्यचर्या पूर्णतः मनोवैज्ञानिक तथा अप्रगतिशील होती है।


विषय केंद्रित पाठ्यचर्या मूलतः पुस्तक प्रधान होता है। इसके पाठ्यवस्तु में परिवर्धन,

परिवर्तन, काट-छाँट करने में सरलता होती है। इस प्रकार की पाठ्यचर्या के अध्ययन तथा अध्यापन में सुगमता रही है। शिक्षक और शिक्षार्थी पूरे मनोयोग और रुचि से तथ्यों को आत्मसात करने में तल्लीन होते हैं।


(2) बाल-केंद्रित पाठ्यचर्या - बाल केंद्रित पाठ्यचर्या में बालकों की रुचि, आवश्यकता, अभिक्षमता, सीखने की क्षमता, आयु, योग्येता आदि को ध्यान में रखकर विषय-वस्तु का चयन किया जाता है। जेम्स एम. ली. का कथन है कि - "बाल केंद्रित पाठ्यचर्या वह है जो पूर्णत: और समग्र रूप से सीखने वाले में निहित होती है।" वास्तव में बाल केंद्रित पाठ्यचर्या में बालक को केंद्रित बिंदु मानकर उसकी मनोवैज्ञानिक स्थिति एवं दशा के अनुरूप पाठ्यचर्या का सृजन किया जाता है। मान्टेसरी, फ्रोवेल योजना की पाठ्यचर्या बाल केंद्रित दृष्टिकोण पर आधारित है। 


(3) अनुभव केंद्रित पाठ्यचर्या - अनुभव केंद्रित पाठ्यचर्या में विषयों की अपेक्षा अनुभवों को महत्व दिया जाता है। इसमें बालकों को विविध कार्य स्वयं करके सीखने एवं अनुभव में एकता की भावना का होना अत्यंत आवश्यक है। इस कार्य को संपादित करने में अनुभव केंद्रित पाठ्यचर्या विशेष उपादय होता है। अनुभव केंद्रित पाठ्यचर्या मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों से ओतप्रोत मननीय, सर्वांगीक विकास का मूर्त रूप देने वाला है। किंतु उसका संचालन करना अत्यंत खर्चीला तथा मूल्यांकन प्रक्रिया में दिक्कत उत्पन्न करती है। 


(4)क्रियाकेंद्रित पाठ्यचर्या - पाठ्यचर्या का वह रूप, जिसमें कार्य या क्रिया करके बालकों को सीखने की व्यवस्था होती है वह क्रिया केंद्रित पाठ्यचर्या कही जाती है। वास्तव में बच्चों की रुचि किसी क्रिया द्वारा किसी चीज को सीखने में अधिक होती है। बच्चे पूरे मनोयोग से इससे सीखते हैं

और आनंदित भी होते हैं। कमेनियम ने स्पष्ट कहा है कि - "जो कुछ भी सीखना है द्वारा करके ही सीखा जाए।"


डीवी का मत है कि - "क्रिया पाठ्यचर्या बच्चे की क्रियाओं का सतत प्रवाह है, जिसे विधिवत विषयों द्वारा खंडित नहीं किया जाता है और बच्चों की रुचियों तथा आवश्यकताओं से प्रवाहित होता है।" वास्तव में क्रियाकेंद्रित पाठ्यचर्या बालक की प्राकृतिक एवं मूल प्रवृत्तियों को सही दिशा प्रदान करने, बच्चे का शारीरिक, बौद्धिक, भावात्मक तथा सामूहिकता की भावना जगाने में अत्यंत कारगर होती है। किंतु क्रिया केंद्रित पाठ्यचर्या की रूपरेखा सैद्धांतिक विषयों में नहीं बनाई जा सकती है। यह केवल वैज्ञानिक विषयों में ही अत्यंत सहायक भूमिका अदा कर सकती हैं।


(5) शास्त्री य पाठ्यचर्या - शास्त्रीय पाठ्यचर्या को परंपरावादी पाठ्यचर्या भी कहा जाता है।

इस पाठ्यचर्या में आध्यात्मिकता एवं नैतिकता प्रधान विषयों को शामिल किया जाता है। शास्त्रीय पाठ्यचर्या में भाषा, साहित्य के साथ-साथ कुछ आधुनिक विषयों को भी महत्व दिया जाता है। प्राय: संस्कृत विद्यालयों की पाठ्यचर्या शास्त्रीय ही होती है, जिसमें व्याकरण, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, नक्षत्र विज्ञान, आयुर्वेद आदि को महत्व दिया गया होता है। आधुनिक समय में शास्त्रीय पाठ्यचर्या महत्वहीन समझा जा रहा है।


(6) शिल्पं केंद्रित पाठ्यचर्या - पाठ्यचर्या में जब किसी हस्तशिल्प या कारीगरी से युक्त अवयवों को स्थान दिया गया होता है तो उसे शिल्प केंद्रित पाठ्यचर्या कहा जाता है। महात्मा गांधी ने अपने बेसिक शिक्षा योजना में पाठ्यर्चा का शिल्प केंद्रित स्वरूप दिया था, जिसमें किसी शिल्प या हस्तकार्य को केंद्र में रखकर अन्य विषयों की शिक्षा देने का प्रावधान था। जैसे कृषिकार्य करने वाले को कृषि संबंधित ज्ञान के साथ-साथ रसायनशास्त्र, भूगोल, गणित की जानकारी दी जाती थी।


(7) कोर पाठ्यचर्या – कोर पाठ्यचर्या या केंद्रित पाठ्यचर्या वह होती है, जिसमें कुछ विषय छात्रों को अनिवार्य रूप से पढ़ने पड़ते हैं तो कुछ विषयों का चुनाव विविध विषयों के विकल्प में से कर सकते हैं। वस्तुतः इस पाठ्यचर्या का उदय सर्वप्रथम अमेरिका में हुआ, किंतु इसकी उपयोगिता को दृष्टि में रखकर अब वह भारतीय शिक्षा कि पाठ्यचर्या का एक अहम हिस्सा बन चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित है कि- "हमारा भारतीय समाज अनेक वर्गों, जातियों संप्रदायों, भौगोलिक स्थितियों तथा विविध भाषाओं में बँटा हुआ है। इसीलिए पाठ्यचर्या का सृजन स्थांनीय, सामाजिक, भाषाओं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। पाठ्यचर्या में कुछ विषय ऐच्छिक तो कुछ अनिवार्य होना चाहिए। इससे कुशल, कर्तव्यपरायण तथा परिश्रमी व्यक्तियों का निर्माण हो सकेगा। इसके साथ ही व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याओं का भी अंत होगा। कोर पाठ्यचर्या में निम्नलिखित विषयों को रखा जाएगा जो अनिवार्य होगा - 


1. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास


2. संवैधानिक उत्तरदायित्व तथा राष्ट्रीय अस्मिता से संबंधित तत्व


3. समानतायुक्त भारतीय सांस्कृतिक विरासत के तत्व


4. लोकतंत्र 


5. धर्मनिरपेक्षता


6. स्त्री-पुरुषों के बीच समानता


7. पर्यावरण संरक्षण


8. सामाजिक समानता


9. जनसंख्यास वृद्धि को रोकन हेतु सीमित परिवार का महत्व समझाना।


10. मानवाधिकार


(8) एकीकृत पाठ्यचर्या अथवा पाठ्यचर्या का एकीकरण एकीकृत पाठ्यर्चा का आशय, उस - पाठ्यचर्या से है, जिसमें विषयों क्रियाओं को खंड-खंड में न बाँटकर, बल्कि एकीकृत रूप में रखा जाता है। इससे बालक एक विषय में प्राप्त ज्ञान का दूसरे विषय में लाभ उठाने में समर्थ होता है। वास्तव में एकीकृत पाठ्यचर्या के उदय में मनोविज्ञान के गेस्टाल्ट सिद्धांत का महत्वपूर्ण योगदान है। गेस्टासल्टीवादियों की मान्यता है कि मानव मस्तिष्क एक इकाई के रूप में कार्य करता है, इसलिए इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर देखना उचित नहीं है। मानव मस्तिष्क की भाँति ज्ञान भी अविभक्त है। इसे खंड-खंड में विभाजित करना यथेष्ट नहीं कहा जा सकता है। अतएव मानव मस्तिष्क एवं ज्ञान के स्वरूप को दृष्टिगत रखकर पाठ्यचर्या को छोटे छोटे इकाइयों में विभक्त न करके एक पूर्ण इकाई के रूप में ग्रहण करना चाहिए। विषयों में पारस्परिक भिन्नता नहीं होनी चाहिए, बल्कि पाठ्यचर्या में एकात्मकता, संतुलन, केंद्रीकरण और सजीवता विद्यामान होनी चाहिए।


शिक्षा मानव जीवन को समुन्नत बनाने वाली प्रक्रिया है। मानव जीवन उनके परिवर्तित आयामों से परिवर्तित स्वरूप धारण करता रहता है। शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या कुछ विषयों में विभाजित होती है।