स्त्री आरक्षण विधेयक के पक्ष-विपक्ष में वाद-विवाद - Debate in the pros and cons of the Women's Reservation Bill

स्त्री आरक्षण विधेयक के पक्ष-विपक्ष में वाद-विवाद - Debate in the pros and cons of the Women's Reservation Bill


स्त्री आरक्षण विधेयक के समर्थकों का कहना है कि स्त्रीयों के लिए नियमित चुनाव और अभियान चलाए जाने के बाद भी बड़ी संस्थाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उन्हें अपेक्षित भागीदारी नहीं मिल पाई है। इसके अलावा स्त्रीयाँ भी दलित और अनुसूचित जनजातियों की तरह ही वंचित श्रेणी की हैं एवं सदियों से पितृसत्तात्मक समाज में उनका उत्पीड़न व गैर बराबरी भेदभाव का शिकार होती रही है। सकारात्मक कार्य के जरिए ही पुरूष की सी स्थिति पा सकती हैं।


बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीति में धनबल, बाहुबल का प्रभाव बढ़ा तथा पुरुष प्रभुत्व के चलते स्त्रीयों का चुनाव लड़ पाना संभव नहीं रह गया है। पुरूषों की कपटपूर्ण कार्यव्यवहार व व्यवस्था की शिकार स्त्रीयाँ हर स्तर पर हो रही हैं। संसद और विधान मंडलों में स्त्रीयों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने के चलते क़ानून बनाने की प्रक्रिया में प्रभावशाली हस्तक्षेप नहीं होता और स्त्रीयों का व्यापक हित प्रभावित होता है।

काफ़ी प्रयासों के बाद भी स्त्रीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ नहीं पाई है। इसके अलावा स्त्री आरक्षण की वजह से राजनीतिक दलों की स्त्री उम्मीदवारों को चुनाव में लड़ना सुनिश्चित हो जाएगी। 

त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में विभिन्न पदों पर एक-तिहाई चुनी गई स्त्रीयों के राजस्थान, केरल, त्रिपुरा, केरल आदि विभिन्न राज्यों में किए गए उनके बेहतरीन प्रदर्शनों को देखते हुए संसद और विधान मंडलों में भी एक तिहाई सीटों पर स्त्री आरक्षण को प्रबल आधार बनता है।


दूसरी ओर विधेयक विरोधियों का तर्क हैं कि संसद और विधान मंडलों में स्त्रीयों के आ जाने से वे राजनीतिक कार्य सूची में स्त्री विषयक विषयों के शामिल कराने में समर्थ रहेंगी, यह सर्वदा संदिग्ध ही रहेगा। निरक्षरता, नियमों-विनियमों और प्रक्रियाओं से अनभिज्ञता तथा राजनीतिक अनुभवहीनता के कारण स्त्रीयों की उच्च स्तरीय राजनीति से निपटने की क्षमताएं और प्रभावशीलता संदेहपूर्ण है।

विधेयक विरोधी लोकतंत्र के विनाश की बात करते हुए कहते हैं कि स्वतंत्र चयन में कटौती होने से आरक्षण लोकतंत्र को कमज़ोर करेगा यानि लोकतंत्र व्यक्ति (पुरूष या स्त्री) को अपने पसंदीदा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अधिकार देता है और आरक्षण इसके विपरीत है। किंतु ऐसे लोग भूल जाते हैं कि भारत की संसदीय राजनीति के शुरूआती दिनों से पुरुषों के लिए अघोषित आरक्षण जारी है। अगर उससे लोकतंत्र कमज़ोर नहीं हुआ तो स्त्री आरक्षण से कैसे हो जाएगा? और यह समानता के मौलिक अधिकार के विरूद्ध कैसे जाएगा? कुछ लोग सूत्रीयों को सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के बराबर नहीं मानते और एक सजातीय समूह न मानते हुए स्त्री आरक्षण का विरोध करते है। वास्तव में निर्वाचित संस्थाओं में स्त्रीयों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होना भारतीय लोकतंत्र का एक कमज़ोर पक्ष हैं और इसे मज़बूत करने के लिए एक सकारात्मक हस्तक्षेप की ज़रूरत है।