निगमनात्मक तर्क - Deductive Reasoning

निगमनात्मक तर्क - Deductive Reasoning


विश्वसनीय ज्ञान प्राप्ति के साधनों को विकसित करने के लिए पुराने ग्रीकवासी दार्शनिक (Philosopher) अरस्तू और उसके अनुयायियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसने पहले पदों में उदाहरण से Syllogism से जानी जाने वाली वह बिधि विकसित की जिसे गहन चिन्तन कहा जा सकता है जिसमें कोई एक सामान्य कथन तर्क द्वारा विशिष्ट कथन पर पहुँच सकता है। यह जात से अज्ञात तक चल कर किसी निष्कर्ष या विचार की वैधता के परीक्षण का साधन प्रदान करता है।

इस तरह के तकों में सम्मलित है.


1. प्रमुख साध्य जो स्वयं प्रत्यक्ष या पूर्व स्थापित तथ्य या संबंध पर आधारित हो


2. किसी एक प्रकरण से संबंधित लघु साध्य जिस पर सत्य, तथ्य या संबंध अपरिवर्ती रूप से अनुप्रयोज्य हो 


3. निष्कर्ष यदि मुख्य या लघु साध्य सही पाया जाता है तो उन पर आधारित निष्कर्ष भी सही होंगे।


इसका एक उदाहरण देखिए:


सब जीव जन्तु नश्वर है।


कुत्ता एक जीव है।


अतः कुत्ते की मृत्यु होगी।


निष्कर्ष निकालने में उपयोगी होते हुए भी इस विधि की निम्नलिखित सीमाएं है-


1. सिलोजिज्म से निकाले गए निष्कर्ष साध्य में निहित विचारों पर आधारित होते हैं। यदि साध्य का वास्तविकता से संबंध नहीं है या आंशिक रूप में वह गलत है तो निकाला गया निष्कर्ष वध नहीं होगा। 


2. इसकी दूसरी सीमा यह है कि यह सिलोजिज्म मौखिक रूप से ही उपलब्ध होते हैं।


3. निगमनिक तर्क से पहले से ही जात बातें व्यवस्थित हो सकती है और ज्ञात से अज्ञात कीओर जाने से नए संबंधों की पहचान हो। सकती है परन्तु इसे विश्वसनीय ज्ञान प्राप्ति का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।