विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की परिभाषा तथा अवधारणा - Definition and concept of students with special needs
विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की परिभाषा तथा अवधारणा - Definition and concept of students with special needs
वह विद्यार्थी जो मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और संवेगात्मक आदि विशेषताओं में औसत से विशिष्ट हो और यह विशिष्टता इस स्तर की हो कि उसे अपनी विकास क्षमता की उच्चतम सीमा तक पहुँचने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता हो असाधरण या विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी कहलाते हैं।”
क्रो एवं क्रो के अनुसार- .. विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी शब्दावली का प्रयोग उन विद्यार्थियों के लिए करते है जो सामान्य विद्यार्थियों से शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक या सामाजिक विशेषताओं में इतने अधिक भिन्न होते है कि उन्हें अपनी क्षमता के अधिकत्तम विकास हेतु विशेष सामाजिक और शैक्षिक सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है।"
टेलफोर्ड और सारे के अनुसार विशिष्ट अथवा असाधरण विद्यार्थी वे है जो शारीरिक, सामाजिक एवं मानसिक दृष्टि से बाधित हैं। साथ ही वे विद्यार्थी भी इस श्रेणी में शामिल है जो मानसिक मापन में किसी भी क्षेत्र में प्रतिभाशाली होते है।"
हेक के अनुसार - " असाधारण विद्यार्थी वे है जो कि सामान्य बच्चों से शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक या सामाजिक विशेषताओं में इतना अधिक अलग होते हैं कि अपनी उच्चतम योग्यता तक विकसित होने के लिए उन्हें विशेष शैक्षिक सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है।”
विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी से अभिप्राय उन विद्यार्थियों से है जो व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों से संबंधित किसी एक या अन्य व्यक्तित्व गुणों और विशेषताओं के संदर्भ में सामान्य या औसत बालकों से इस सीमा तक अलग और भिन्न होते है
कि उनके शिक्षण और समायोजन के लिए विशेष प्रकार की देखभाल एवं शिक्षा-दीक्षा की जरुरत पड़ती है। विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के संबंध में दी गई उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर उनकी प्रकृति और विशेषताओं के बारे में निम्नलिखित बातें कही जा सकती हैं-
• विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी सामान्य या औसत विद्यार्थियों से अधिक अलग और भिन्न होते है।
• सामान्य या औसत विद्यार्थियों से विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी की यह भिन्नता या विशेष दूरी विकास की दोनों दिशाओं धनात्मक और ऋणात्मक में से किसी भी एक में हो सकती है।
• सामान्य या औसत वाले विद्यार्थी से विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थी की यह भिन्नता या विशेष दूरी इस सीमा तक बढ़ी हुई होती है कि इसके कारण उन्हें अपने और अपने वातावरण से समायोजित होने में विशेष समस्याओं का सामना करना पड़ता है और अपनी विशेष योग्यताओं और क्षमताओं के विकास, उचित समायोजन तथा आवश्यक बृद्धि एवं विकास हेतु विशेष देख-रेख एवं शिक्षा दिक्षा की आवश्यकता पड़ती है।
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