देकार्ते - DESCARTE

देकार्ते - DESCARTE


परिचय:


देकार्त का जन्म फ्रांस के एक धनी परिवार में हुआ था। इनकी आरंभिक शिक्षादीक्षा एक उत्तम वातावरण में हुई। बै हालैण्ड की सेना में सन् 1619 में भर्ती हो गए। 20 सालों तक वे एमस्टरडैम में रहे। सन् 1649 में स्वीडन की रानी क्रिसचियाना ने उन्हें ससम्मान अपने पास दर्शनशास्त्र पढ़ाने के लिए बुलवाया। इस दौरान उनकी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तकका नाम था The Passion of the Soul लेकिन स्वीडन का मौसम बहुत ही सर्द था और रानी की आज्ञानुसार उन्हें सुबह 5 बजे उठकर दर्शनशास्त्र पढाना पड़ता था। इसे देकार्त का शरीर बर्दास्त नहीं कर सका और उन्हें निमोनिया हो गया। फलतः सन् 1650 में ही उनका देहांत हो गया।


देकार्ते का दर्शनशास्त्र


देकार्त कई विषयों के जानकार थे। प्रसिद्ध इतिहासकारों ने उन्हें एक वैज्ञानिक दार्शनिक गणितज तथा मनोवैज्ञानिक कहा है। इनके योगदानों को निम्नाकित चार भागों में बाटा जा सकता है


1. शरीर के संबंध में उनके विचार शरीर के कार्यों का वर्णन करने में देकार्त उस समय के दैहिक उपलब्धियों से पूर्णत अवगत थे। उन्हें मासपेशियों, स्नायु-तंत्रिकाओं एवं अन्य जैविक संरचनाओं का ज्ञान था। अन्य शरीर शास्त्रियों के कामों से वे यह भलीभांति जानते थे कि मांसपेशियों विरोधी युग्मों (Opposing Pairs) के रूप में कार्य करती हैं तथा संवेदन व गति के लिए तंत्रिकाओं (Nerves) का कार्य महत्वपूर्ण होता है। उसी समय हार्वे द्वारा रक्त संचालन की खोज की गई थी। इन सभी से शरीर एवं शारीरिक क्रियाओं के बारे में उनके विचार काफी प्रभावित हुए।


उनका मत है कि तंत्रिका एक खोखली नली (Tube) होती है जिसके द्वारा विभिन्न दशाओं में पाशविक प्रवृत्ति पायी जाती है। पाशविक प्रवृत्ति से तात्पर्य गैसीय तत्वों से होता है जो रक्त के आसवन की प्रक्रिया द्वारा तैयार होती है। उन्होंने पाशविक प्रवृत्ति को एक भौतिक तत्व कहा है जो बहुत तेजी से प्रसारित होता है।

उन्होंने कहा है कि शरीर को उसकी आत्मा या मन की अनुपस्थिति में देखें तो यह एक मात्र मशीन के समान है। उन्होंने पशुओं को मात्र मशीन के समान विभिन्न तरह की क्रियाएँ करते माना है। चूंकि इसमें आत्मा नहीं होती है अतः वे स्वचालित होते हैं। यदि हम मनुष्य के शरीर से मन या आत्मा को अलग कर दें तो यह भी एक मशीन का ही उदाहरण होगा। देकार्त के इस •यांत्रिक सिद्धांत का शरीर के स्वरूप के बारे में यह निष्कर्ष रहा है कि शरीर से तात्पर्य उन सभी चीजों से होता है जो निर्जीव हैं।


2. मन या आत्मा के संबंध में उनके विचार उनका मत था कि प्रत्येक व्यक्ति में एक मन या आत्मा होती है जो उसके चिंतन को प्रभावित करती है मन को शरीर की यात्रिक क्रियाओं को निर्देशित करने तथा परिवर्तित करने का अधिकार होता है। देकार्त के अनुसार मन और शरीर दो भिन्न तत्वों के बने होते हैं। शरीर बिस्तारित पदार्थ (Extended Matter) का जबकि मन अबिस्तारित पदार्थ (Unextended Matter) का बना होता है।


3. शरीर तथा मन के अंतः क्रिया संबंधी विचार देकार्त का मत था कि यद्यपि मन तथा शरीर दो अलग-अलग तत्वों के बने होते हैं, वे दोनों एक दूसरे से संबंधित हैं। कुछ क्रियाओं जैसेसबदन एवं प्रत्यक्षण में दोनों का संयुक्त योगदान होता है। मन शरीर की यांत्रिक क्रियाओं को नियति करता है तथा उन्हें निर्देशित करता है तथा प्रत्यक्षण, संवदेन एवं सवेग आदि कियाओं द्वारा स्वा भी प्रभावित होता है। अतः इन दोनों में अंतः क्रिया (Interaction) होती है। अबप्रश्न यह उठता है कि अंतः क्रिया कैसे होती है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए देकार्त ने मस्तिष्क तथा उनके विभिन्न संरचनाओं का अवलोकन किया। इस अवलोकन के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मस्तिष्क की एक सरचना ऐसी है जो अकेली है और उसका कोई दतर Duplicate) नहीं है। यह संरचना पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) थी जो मस्तिष्क के बीच में थी। देकार्त के अनुसार मन तथा शरीर के बीच अंतक्रिया का केन्द्र बिंदु यही पीनियल ग्रन्थि होती है।

इस अंतःक्रिया की प्रक्रिया को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है किसी व्यक्ति के दृष्टि संवेदन होने के लिए आवश्यक है कि आँख में बनने वाली प्रतिमाओं द्वारा पाशविक प्रवृत्ति की उत्पत्ति हो जो मस्तिष्क के पीनियल ग्रंथि को उत्तेजित करती है तथा जिसके कारण आँख देखने की प्रक्रिया कर पाती है। इसके विपरीत कुछ क्रियाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका संचालन ठीक इनके विपरीत दिशा में होता है। जैसेमान लिया जाए कि मन किसी घटना, वस्तु या व्यक्ति को याद करना चाहता है। यह इच्छा पीनियल ग्रंथि को उत्तेजित करती है जो मस्तिष्क के छिद्रों (Pores) में पाशविक प्रवृत्ति उत्पन्न करती है जिसके फलस्वरूप उस व्यक्ति या घटना या वस्तु के चिन्हों की खोज की जाती है।


4. जन्मजात विचार का सिद्धांत: देकार्त के अनुसार मन की क्रियाओं द्वारा दो प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं अर्जित विचार तथा जन्मजात विचार अर्जित विचार संबंदी अनुभूतियों से प्राप्तहोते हैं। जहाँ तक जन्मजात विचार का प्रश्न है, इनका संबंध किसी सबंदी अनुभूति से नहीं होता है फिर भी मन में इस विश्वास के साथ उत्पन्न होते हैं कि व्यक्ति उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य हो जाता है। आत्मन (Self) तथा ईश्वर (God) से संबंधित विचार जन्मजात विचार के उत्तम उदाहरण है।