व्यावसायिक चयन एवं विकास के निर्धारक - Determinants of Vocational Selection and Development
व्यावसायिक चयन एवं विकास के निर्धारक - Determinants of Vocational Selection and Development
व्यक्ति के समस्त व्यवहार और विचार, रूचियां और अभिवृत्तियां तथा वरीयताएं उसके मनोदैहिक प्रक्रमों के व्यक्तित्व रूपी गत्यात्मक संगठन द्वारा निर्धारित होते हैं। व्यक्तित्व का स्वयं का निर्धारण अनेक कारकों द्वारा होता है। व्यक्तित्व आनुवांशिकता और पर्यावरण परिपक्वता और अधिगम की अन्तक्रिया का परिणाम है। इसके निर्धारण में गर्भधारण के समय से ही अनेक कारकों की भूमिका प्रकट होने लगती है। व्यावसायिक चयन और विकास की प्रक्रिया जिसमें व्यावसायिक आत्म संप्रत्यय का विकास भी सम्मिलित है, व्यक्तित्व से पृथक नहीं किया जा सकता है । प्रायः ऐसे समस्त कारक जिनकी व्यक्तित्व के विकास में भूमिका स्पष्ट रूप से स्वीकार की जाती है। व्यावसायिक चयन और व्यावसायिक विकास को भी प्रभावित करते हैं । इन निर्धारकों के बारे में एक बात और यह महत्वपूर्ण है कि निर्धारक कारक व्यक्तित्व, व्यावसायिक चयन एवं व्यावसायिक विकास को प्रभावित नहीं करते हैं,
अपितु एक निर्धारक या कारक का अनेक अन्य निर्धारकों के स्वरूप पर भी प्रभाव पड़ता है। इस पुस्तक की सीमाओं में ऐसे कारकों की विस्तृत व्याख्या कठिन है। यहां पर उन महत्वपूर्ण निर्धारकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है। जिनकी व्यावसायिक चयन और विकास में भूमिका है। सुविधा की दृष्टि से ऐसे समस्त कारकों को विभिन्न वर्गो के अंतर्गत श्रेणीबद्ध किया गया है। निर्धारकों की श्रेणियां निम्नवत हैं-
1. जैविक कारक लिंग, लंबाई, शारीरिक छवि आदि,
2. वैयक्तिक विकास बुद्धि, अभिक्षमता, रूचियां, व्यक्तित्व, अन्य क्षमताएं
3. पारिवारिक कारक- परिवार संबंधी भौतिक परिवेशीय, धार्मिक, सामाजिक, मूल्य, स्वास्थ्य, आर्थिक, शैक्षिक, सांवेगिक, एवं अन्य कारक
4. विद्यालयी कारक - विद्यालय के अंदर का परिवेश, अध्यापक, मूल्य, परम्परा, परामर्शदाता एवं अन्य का प्रभाव।
5. सामाजिक सांस्कृतिक कारक स्वीकार्यता, वंचना, पूर्वाग्रह, सामाजिक स्थिति, गतिशीलता, पेशागत परम्परा आदि
6. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कारक आर्थिक दशा, नीतियां, उदारीकरण, भूमण्डलीकरण, समाजवाद, पूंजीवाद, बेरोजगारी आंतकवाद पलायन आदि ।
1 जैविक कारक - व्यक्ति किस व्यवसाय का चयन करेगा, किस व्यवसाय को अपनाएगा, और कहां स्थापित होकर प्रगति कर पाएगा यह उसके लिंग,
शारीरिक आर्कषण, और लंबाई सामान्य स्वास्थ्य जैसे कारकों से प्रभावित होता है। कुछ व्यवसाय पुरूषों की तुलना में महिलाओं को अधिक आर्कषित करते हैं । शारिरिक क्षमता पर ध्यान देने वाले व्यवसायों में स्वास्थ्य और लम्बाई का महत्व होता है। जनसंपर्क और स्वागत क्षेत्र के व्यवसाय में शारिरिक आकर्षण का महत्व देखा जाता है। व्यक्ति अपनी जैविक रचना संबंधी आत्म संप्रत्यय जैसा होगा तदनुरूप व्यक्ति का व्यावसायिक चयन तथा व्यावसायिक विकास हेतु किया गया प्रयत्न होगा।
2. वैयक्तिक कारक - व्यक्तियों की बुद्धि, अभिक्षमता, रूचियां, व्यक्तित्व विशेषताएं, शारिरिक एवं अन्य अनेक क्षमताएं एक दूसरे से भिन्न होती हैं,
व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और विशेषताओं के बारें में जैसा बोध प्राप्त होगा वैसा ही वह अपने क्षमताओं और विशेषताओं के बारें में आत्म संप्रत्यय पर 1 क्षमताओं एवं विशेषताओं के वस्तुनिष्ठ रूप से, 2 सामाजिक संबंधो के समय अन्य व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रिया का प्रभाव पड़ता है। अन्य व्यक्तियों के माता पिता, अध्यापक, मित्रों द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रियाएं, जो कि व्यक्ति के लिए आत्म संप्रत्यय के निर्माण में सूचना की भूमिका का निर्वाह करती है। क्षमताओं और विशेषताओं के वस्तुनिष्ठ और प्रत्यक्षण करने वालों व्यक्तिनिष्ठ दोनो ही रूपों से प्रभावित होते है।
3. पारिवारिक कारक - व्यक्ति के समग्र विकास में परिवार से संबंधित अनेक कारकों का प्रभाव पड़ता है । परिवार में पालन पोषण, सुरक्षा, स्नेह, तथा प्रशिक्षण ही नहीं प्राप्त होता है अपितु परिवार बच्चों के लिए बाह्य जगत से संपर्क का माध्यम भी होता है। आरम्भिक आयु अवस्था में परिवार भौतिक, सामाजिक सांस्कृतिक निर्धारकों का वाहक होता है। समस्त बाहरी निर्धारक परिवार के सदस्यों के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित करते हैं। क्योंकि बच्चों का बाह्य जगत के साथ सीधा संपर्क नहीं होता है। जब बच्चे स्वंय घर से बाहर की दुनिया के साथ संपर्क में आते हैं।
और उस समय भी परिवार की भूमिका बच्चों को प्राप्त होने वाले अनुभवों के लिए व्याख्याता की होती है। परिवार की विशेषताएं पारिवारिक प्रभाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। परिवार के जिन कारकों का व्यावसायिक चयन एवं विकास में महत्व समझा जाता है उनमें परिवार के अन्दर की भौतिक दशाएं, अधिवास का भौगोलिक स्थल, घर में रहने वालों की संख्या का निश्चित महत्व पाया जाता है। निवास स्थान यह निश्चित करता है कि व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के लिए अपने घर आ जा सकता है। परिवार में सदस्य संख्या शिक्षण और अधिगम पर ध्यान केन्द्रित कर पाने की क्षमता को प्रभावित करती है। परिवार में मुख्य जीविकोपार्जन का स्वास्थ्य और स्वास्थ की सामान्य दशा अनेक प्रकार से व्यावसायिक चयन और विकास के उद्देश्यों को बच्चों के लिए परिभाषित करती है। परिवार के अनेक सदस्यों के स्वास्थ्य का अच्छा नहीं होना व्यावसायिक चयन और तैयारी को प्रतिकुल रूप में प्रभावित करता है।
परिवार की सामाजिक आर्थिक दशा, समाज में संस्थिति, एक स्थान से दूसरे स्थान तक गतिशीलता, परिवार में सदस्यों की पेशागत श्रेष्ठता का व्यावसायिक चयन और विकास पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
ऐसी सभी दृष्टिओं से यदि परिवार की दशा अच्छी होती है तो बच्चों की व्यावसायिक आकांक्षाएं उच्च स्तरीय होती है। उच्च स्तरीय परिवार में बच्चों पर उच्च स्तरीय व्यवसाय के चयन हेतु पारिवारिक एवं मित्र परिवारों के स्तर पर दबाव डाला जाता है।
परिवार अन्य सूचनाओं के अतिरिक्त व्यवसाय संबंधी सूचनाओं का भी वाहक होता है व्यक्ति को उसकी अपनी क्षमताओं और विशेषताओं के बारे में सूचना प्रदान करने के अतिरिक्त व्यावसायिक जगत के बारे में अनेक प्रकार की ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराने का कार्य करता है। जिनका व्यावसायिक लक्ष्यों के चयन की दृष्टि से महत्व होता है। उपलब्ध करायी जाने वाली सूचनाओं का स्वरूप भी परिवार की सामाजिक स्थिति तथा पेशागत स्थिति से प्रभावित होता है।
परिवार सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों का माध्यम भी है।
धर्म तथा जाति अनेक परिवारों में वर्तमान समय के व्यवसाय को प्रभावित करते हैं। धर्म और जाति अनेक प्रकार के व्यवसायों का वरण प्रतिबंधित करते है पारम्परिक शैली के परिवार इन प्रतिबंधों से हटकर कुछ नया नही कर पाते है । कुछ जातियों में कुछ व्यासायों के लिए विशेष आर्कषण होता है।
परिवार के द्वारा कार्य संबंधी सामान्यीकृत अभिवृत्तियां तथा विशिष्ट व्यवसायों के बारे में मूल्यों और अभिवृत्तियों का निर्माण होता है। परिश्रम, लगन सफेदपोशी, जैसी अभिवृत्तियों के विकास में परिवार की विशेष भूमिका होती है। आलर्पोट वर्नन द्वारा वर्णित 6 प्रकार के मूल्यों के विकास में परिवार की विशेष भूमिका होती है तथा उक्त मूल्य व्यावसायिक चयन और विकास को प्रभावित करते है। इस प्रकार उच्च राजनीति लेते हैं। मूल्य वाले लोग राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हो जाते हैं और उसे एक व्यवसाय के भांति अपना परिवार की सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका तादात्मीकरण के उपयुक्त संदर्भ उपलब्ध कराना, तथा भूमिका अधिगम के लिए उपयुक्त प्रतिरूप उपलब्ध कराना है। जब घर में उपयुक्त मॉडल उपलब्ध नही होता है तब किसी बाहरी व्यवसायरत या पेशारत व्यक्ति को माडल के रूप में चुनना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में प्राय: भूमिका द्वन्द का सामना करना पड़ता है।
4. विद्यालयी कारक - परिवार के बाद विद्यालय की भूमिका को सभी क्षेत्रों में विकास के लिए स्वीकार किया जाता है। विद्यालय मात्र शिक्षा का केन्द्र नहीं है, विद्यालय बच्चों को उद्योग जगत के संपर्क में लाता है। व्यावसाय जगत के लोगों को विद्यालय में आमंत्रित करता है तथा बच्चों को कार्यस्थलों तक ले जाता है । इस प्रकार कार्य संबंधी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनुभव उपलब्ध कराकर विद्यालय अपने 'विद्यार्थियों को व्यावसायिक चयन एवं व्यावसायिक विकास में सहयोग देते हैं।
अच्छे विद्यालयों की अपनी परम्पराएं और मूल्य होते हैं तथा उनका एक सुनहरा इतिहास होता है। परिणामस्वरूप किसी विद्यालय या संस्थान में अध्ययनरत विद्यार्थियों में कुछ विशेष प्रकार के कार्यक्षेत्रों के प्रति गहरा लगाव देखा जा सकता है। कुछ जाने माने संस्थानों के विद्यार्थियों का आत्म संप्रत्यय वहां प्रवेश प्राप्त होते ही एक विशिष्ट रूप धारण कर लेता है। विद्यार्थी अपने आप को अधिकारी/वैज्ञानिक आदि के रूप में देखने लगता है।
विद्यालयों में निर्देशन कार्यक्रमों के संचालन द्वारा प्रत्यक्ष रूप में प्रभावित होता है। विद्यालय व्यावसायिक चयन के अतिरिक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से व्यावसायिक तैयारी और विकास को भी प्रभावित करता है।
5. सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक समाज और संस्कृति अपनी संस्थाओं और व्यवस्थाओं तथा उनके प्रतिफलों के माध्यम से हमारे व्यक्तित्व, वरियताओं एवं विकासात्मक लक्ष्यों को प्रभावित करते हैं सामाजिक समूह के प्रभावों की मात्रा का निर्धारण व्यक्ति की सामाजिक स्वीकृति द्वारा दो आधार पर होता है - समूह व्यक्ति को कितना स्वीकार करता है, तथा समूह का व्यक्ति के लिए कितना महत्व है। सामाजिक स्वीकृति का व्यक्ति के आत्म संप्रत्यय पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक संस्कृति के अभाव में व्यक्ति असुरक्षित और चिन्तित अनुभव करता है तथा असमायोजन विकसित होता है। सामाजिक तिरस्कार के परिणामस्वरूप उपलब्धि की कमी, सामाजिक अनुरूपता का अभाव तथा दूसरों के लिए स्नेह भाव की कमी देखी जाती है।
समाजिक वंचना के फलस्वरूप व्यक्ति के सामाजिक संपर्क के अवसर कम हो जाते हैं।
सामाजिक वंचना भौगोलिक एकान्त, पारिवारिक प्रतिबंध या सामाजिक बहिष्कार किसी भी कारण से घटित हो सकती है जिसके कारण व्यक्ति का आत्म समप्रत्यय प्रभावित होता है तथा व्यावसायिक विकास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सामाजिक पूर्वाग्रहों तथा विभेदन का प्रभाव इसे व्यवहार में अपनाने वाले व्यक्ति तथा जो व्यक्ति इन पूर्वाग्रहों तथा विभेदक व्यवहारों के लक्ष्य होते हैं दोनों के लिए ही क्षतिकारक होते हैं। पूर्वाग्रहों और विभेदनों से प्रभावित व्यक्तियों में आक्रामक व्यवहार, बाल अपराध, वयस्क अपराध, आक्रोश, हीनता की अनुभूति, तथा नाराजगी या कुढन देखी जा सकती है। क्षतिपूर्ति प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप उंची आकांक्षा पायी जा सकती है लेकिन प्रायः व्यक्ति सुस्त, दब्बु, न्यून आकांक्षा से पीड़ित होता है। क्योंकि उसे लगता है कि उसकी व्यावसायिक प्रगति संभव नहीं है।
सामूहिक दबाव के कारण व्यक्ति प्रायः अनेक परम्परागत व्यवसायों का चयन करने के लिए विवश हो जाता है। बहुधा सामाजिक दबावों के कारण कुछ लोगों की गतिशीलता बाधित हो जाती है। स्थानीय रूप में उपलब्ध व्यवसाय अपनाना उनकी मजबूरी बन जाती है।
व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का स्वरूप भी व्यवसाय के स्वरूप का सशक्त निर्धारक होता है। उच्च सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति उन व्यवसायों या पदों को प्राप्त करना चाहते हैं जहां उन्हें नेतृत्व के अवसर प्राप्त होते हैं।
6. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के कारक- आधुनिक विश्व को हम भूमण्डलीय गांव कहते हैं।
जहां संचार और परिवहन के नये संसाधनों एवं सभी भौगोलिक क्षेत्रों की एक दूसरे पर पारस्परिक निर्भरता, उद्योगों का आधुनिकीकरण कार्यालयों का कंप्यूटरीकरण, आर्थिक मंदी आतंकवाद और उसके फलस्वरूप लोगों का दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन, आर्थिक उदारीकरण उवं अन्य अनेक प्रकार की घटनाएं तेजी से घटित हो रही हैं।
अनेक व्यावसायिक क्षेत्रों में अवसर घट रहे हैं तथा अनेक नए उद्योग क्षेत्र विकसित हो रहे हैं। कभी सूचना प्रौद्योगिकी का वर्चस्व देखा जाता है तो कुछ ही वर्षों बाद उस क्षेत्र में संभावनाएं सिमटती हुई प्रतीत होती हैं। आज किसी व्यक्ति के व्यावसायिक चयन और विकास पर इन घटनाओं का स्वाभाविक प्रभाव स्पष्टतः देखा जा सकता है । अल्प प्रशिक्षित तकनीकी और मजदूर वर्ग को खाड़ी क्षेत्र में संभावनाएं दिखती है तो इंजीनियर, डॉक्टार को अमेरिका और यूरोप में बेहतर संभावना की तलाश रहती है। किसी देश की नीतियां भी व्यावसायिक चयन को प्रभावित करती हैं। आरक्षण जैसी नीति ऐसे प्रभावकों का एक उदाहरण है। जो यह निर्धारित करता है कि कहां व्यक्ति के लिए व्यावसायिक अवसर हैं या कहां उसके लिए मार्ग अवरूद्ध है।
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