सीमान्त लागत का निर्धारण - Determination of Marginal Cost
सीमान्त लागत का निर्धारण - Determination of Marginal Cost
सीमावर्ती लागत-पद्धति का सुचारू रूप से अध्ययन करने के लिए यह जानना अति आवश्यक है कि सीमान्त लागत क्या है और इसका निर्धारण किस प्रकार से होता है। सीमान्त लागत के दो सम्भावित अर्थ हो सकते हैं। प्रथम, मूल लागत और परिवर्तनशील अप्रत्यक्ष व्ययों को सीमान्त लागत के रूप में माना जा सकता है, अर्थात् सम्पूर्ण परिवर्तनशील लागत चाहे वे किसी प्रकार की क्यों न हो, सीमान्त लागत हो सकते हैं। सीमान्त लागत का जो दूसरा अर्थ लगाया जा सकता है, उसके अन्तर्गत इन परिवर्तनशील व्ययों को एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग किया जाता है अर्थात् कुल उत्पादन की इकाई में एक और इकाई को घटाने या बढ़ाने पर कुल लागत में जो कमी या वृद्धि होती है, उसे ही सीमान्त लागत कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि 100 इकाई के उत्पादन में कुल लागत 500 रु है और 101 इकाई के उत्पादन में कुल लागत 503 रु हो जाती है तो कुल लागत में 3 रु की वृद्धि अर्थात् 3 रु सीमान्त लागत के रूप में माना जायेगा। मूलतः यह विचारधारा अर्थशास्त्रीय है।
अर्थशास्त्र में सीमान्त इकाई की लागत को सीमान्त लागत कहते हैं। इस विचारधारा को प्रबन्ध के प्रयोग हेतु सीमावर्ती लागत विधि के रूप में लाया जाता है परन्तु लेखापालक इस अर्थ में प्रयुक्त सीमान्त लागत के स्थान पर भेदात्मक लागत (Differential Cost) या वृद्धिशील लागत (Incremental Cost) का प्रयोग करते हैं। परन्तु सीमान्त लागत पद्धति के उद्देश्य के लिए सीमान्त लागत को प्रथम वर्ष में ही प्रयोग किया जाता है। अर्थात् सीमान्त लागत में निम्न को शामिल कर सकते हैं :
(1) मूल लागत (Prime Costs )
(2) अस्थिर अप्रत्यक्ष व्यय (Variable Overheads)
साधारणतया मूल लागत के निर्धारण में कोई कठिनाई नहीं होती हैं। मूल लागत में प्रत्यक्ष सामग्री, प्रत्यक्ष श्रम व अन्य प्रत्यक्ष व्ययों को शामिल किया जाता है। \
प्रत्यक्ष सामग्री की लागत सामग्री सम्बन्धी आवश्यकता प्रपत्र (Materials Requisition Form) से सरलतापूर्वक ज्ञात की जा सकती है। इसी प्रकार प्रत्यक्ष श्रम लागत की गणना कार्य घड़ी कार्ड (Job- Clock Card) या टाइम शीट के प्रयोग द्वारा सम्भव बनायी जा सकती है। अप्रत्यक्ष व्यय का स्थिर और अस्थिर लागत व्ययों के अन्तर्गत बंटवारा करना ही सबसे कठिन कार्य है। लागत के कुछ तत्व तो ऐसे हैं जिनके बारे में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे स्थिर हैं अथवा अस्थिर । परन्तु कुछ लागत व्यय ऐसे भी होते हैं, जिनके सम्बन्ध में निश्चित रूप से ऐसी कोई धारणा नहीं बनायी जा सकती। साथ ही कुछ ऐसे व्यय भी होते हैं जो अर्द्ध-स्थिर होते हैं। अर्द्ध-स्थिर लागत में निहित स्थिर व अस्थिर तत्व को अलग करने में प्रयुक्त विभिन्न रीतियों का वर्णन पीछे किया जा चुका है।
सीमावर्ती लागत विधि के अन्तर्गत कुल लागत का निर्धारण उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर कुल लागत की गणना विधि इस प्रकार होगी : चूंकि उत्पादन के विभिन्न स्तर पर स्थायी लागत एक समान रहेगी, अतः विभिन्न स्तरों पर परिवर्तनशील लागत की गणना ही आवश्यक होती है। चूंकि परिवर्तनशील लागत प्रति इकाई विभिन्न स्तरों पर एक समान रहती है, इसलिए उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर उत्पादित इकाइयों को परिवर्तनशील लागत प्रति इकाई से गुणा करने पर कुल परिवर्तनशील लागत ज्ञात हो जाती है। इसे स्थिर व्यय में जोड़ने पर कुल लागत ज्ञात हो जाती है। सूत्र के रूप में
Total Cost = Fixed Cost+ (Output in units Variable cost per unit)
TC = F +VQ
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