अनुकूलतम रोकड़ का निर्धारण - determination of optimum cash

अनुकूलतम रोकड़ का निर्धारण - determination of optimum cash


नकद-कोषों के प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वक्त जरूरत पड़ने पर नकदी की कमी न पड़े और एक ओर तो व्यवसाय में आने वाली रोकड़ का प्रवाह ठीक बना रहे तो दूसरी ओर समय पर सभी भुगतान ठीक से होते रहें। अतः फर्म के प्रबन्धकों को चाहिये कि वे अनुकूलतम रोकड का निर्धारण हेतु नकद-कोषों के प्रबन्ध की सुदृढ नीति तैयार करें। नकद-कोषों के प्रबन्ध में मुख्य रूप से निम्न चार बातें आती हैं :


(1) नकदी का नियोजन ( Cash Planning) – इसके अन्तर्गत, रोकड़ के अन्तर्वाहों और बहिर्वाहों का इस प्रकार पूर्वानुमान लगाना आता है कि फर्म को विभिन्न कालावधियों में रोकड़ के अतिरेक अथवा कमी का स्पष्ट पूर्वाभास हो जाए। इस बारे में रोकड़ की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।


(2) रोकड़ प्रवाहों का प्रबन्ध (Managing the Cash Flows ) रोकड़ के अन्तर्वाह एवं बहिर्वाहों का प्रबन्ध भली प्रकार करना चाहिए। अन्तर्वाहो का ठीक-ठीक पूर्वानुमान लगाना तथा बहिर्वाहों में कमी लाने के प्रयत्न करना, रोकड़ प्रवाहों के प्रबन्ध का मुख्य भाग है।


(3) नकद-काषों का अनुकूलतम शेष (Optimum Cash level) फर्म को नकद-कोषों के अनुकूलतम शेषों को भी निश्चत करना चाहिए। अधिक शेष रखने पर होने वाली लागतो तथा कम शेष रखने पर होने वाली हानियों का संतुलन करके ही प्रबन्धक लोग अनुकूलतम शेष की सीमा निश्चित कर सकते हैं।


(4) अतिरिक्त कोषों का विनियोजन ( Investing Idle Cash ) – नकदी के प्रबन्ध का चौथा पहलू है अतिरिक्त अथवा निष्क्रिय नकदी का विनियोजन करना ताकि फर्म का वह पैसा अनुत्पादक ही न पड़ा रहे। यह नकदी प्रायः बैंक निक्षेपों व शीघ्र विपणनशील प्रतिभूतियों में लगाई जाती है। अतः प्रबन्धकों को इस पहलू पर भी भली भांति विचार करना चाहिए।