आकलन परीक्षण का निर्माण - Developing an Achievement Test

आकलन परीक्षण का निर्माण - Developing an Achievement Test


परीक्षण का निर्माण एक गम्भीर कार्य है। इसके लिए पर्याप्त योजना की आवश्यकता होती है। निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देकर इस काम को अच्छी प्रकार से किया जा सकता है-


1. लक्ष्य निर्धारित करना (Setting Objectives) परीक्षण के लक्ष्य सुनिश्चित होने चाहिए। विद्यार्थियों द्वारा वांछित व्यवहार के विशिष्ट परिवर्तनों के अनुरूप परीक्षण के लक्ष्य पहले से ही निर्धारित किए जाने चाहिए। 


2. पूरे पाठ्यक्रम का ध्यान रखना (Coverage of Syllabus) परीक्षण में निर्धारित की जाने वाली सामग्री प्रत्यक्ष रूप से उस विषय-वस्तु पर आधारित की जानी चाहिए, जिसे अध्यापक द्वारा पढ़ाया जा चुका है। अध्यापक को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को दिए गए अनुभव की रूपरेखा तैयार कर ले।

यद्यपि मुख्य एवं उप-प्रकरणों को छोड़ना तो नहीं चाहिए, परंतु यह भी आवश्यक नहीं कि परीक्षा-पत्र में वह सब कुछ रख दिया जाए जिसे अध्यापक द्वारा कक्षा में पढ़ाया गया है। दूसरे शब्दों में हम यों कह सकते हैं कि विद्यार्थियों को दिए गए शिक्षण-अनुभव के विभिन्न तत्वों को उचित रूप से ध्यान में रखकर ही परीक्षा पत्र का निर्माण करना चाहिए।


3. प्रश्नों के प्रकार का निर्णय (Decision about the Questions) प्रश्नों के प्रकार का निर्णय कर लेना भी परीक्षा पत्र के निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है तीनों प्रकार के प्रश्न - निबंधात्मक, लघु-उत्तर संबंधी तथा वस्तुपरक प्रश्न परीक्षा-पत्र में रखने चाहिए।


4. समय का निर्णय (Decision about the Time)- विद्यार्थियों को प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कितना समय दिया जाएगा इसका भी पहले से निर्णय कर लेना चाहिए।


5. ब्लू-प्रिंट को तैयार करना (Preparation of the Blue Print)- परीक्षण योजना का यह सबसे कठिन चरण है। ब्लू-प्रिंट का एक प्रकार का डिजाइन होता है जिसमें विशिष्ट लक्ष्यों, उपकरणों तथा प्रश्नों के लिए अंक निर्धारित किए जाते हैं। अत: ब्लू-प्रिंट तैयार करते समय उपर्युक्त चारों बातों की ओर ध्यान देना चाहिए। 6. प्रश्नों को गठित एवं व्यवस्थित करना (Organising and Arranging the Questions)- परीक्षण में दिए जाने


वाले प्रश्नों को उचित रूप से गठित एवं व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है। इसमें निम्नलिखित बातों से सहायता


मिल सकती है


1. निबंधात्मक एवं वस्तुपरक प्रश्न अलग-अलग भागों में रखे जाने चाहिए और उनके लिए अलग-अलग समय निर्धारित होना चाहिए।


2. प्रत्येक भाग के लिए अलग-अलग निर्देश होने चाहिए। 3. प्रश्न आसान से उत्तरोत्तर कठिन होते जाने चाहिए।


4. वस्तुपरक प्रश्नों में अधिक प्रश्न देना ठीक नहीं होगा क्योंकि इस प्रकार आदेश पढ़ने में ही विद्यार्थियों का बहुत सा समय नष्ट हो जाता है। यथा सम्भव 'बहु- चुनाव' संबंधी प्रश्न ही देने चाहिए क्योंकि ये अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय एवं वस्तुपरक होते हैं।


5. ब्लू-प्रिंट को तैयार करना (Preparation of the Blue Print)- परीक्षण योजना का यह सबसे कठिन चरण है। ब्लू-प्रिंट का एक प्रकार का डिजाइन होता है जिसमें विशिष्ट लक्ष्यों, उपकरणों तथा प्रश्नों के लिए अंक निर्धारित किए जाते हैं। अत: ब्लू-प्रिंट तैयार करते समय उपर्युक्त चारों बातों की ओर ध्यान देना चाहिए। 


6. प्रश्नों को गठित एवं व्यवस्थित करना (Organising and Arranging the Questions)- परीक्षण में दिए जाने वाले प्रश्नों को उचित रूप से गठित एवं व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है। इसमें निम्नलिखित बातों से सहायता मिल सकती है


1. निबंधात्मक एवं वस्तुपरक प्रश्न अलग-अलग भागों में रखे जाने चाहिए और उनके लिए अलग-अलग समय निर्धारित होना चाहिए।


2. प्रत्येक भाग के लिए अलग-अलग निर्देश होने चाहिए। 


3. प्रश्न आसान से उत्तरोत्तर कठिन होते जाने चाहिए।


4. वस्तुपरक प्रश्नों में अधिक प्रश्न देना ठीक नहीं होगा क्योंकि इस प्रकार आदेश पढ़ने में ही विद्यार्थियों का बहुत सा समय नष्ट हो जाता है। यथा सम्भव 'बहु- चुनाव' संबंधी प्रश्न ही देने चाहिए क्योंकि ये अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय एवं वस्तुपरक होते हैं।


7. प्रश्न लिखना और उनकी कठिनाई का अनुमान लगाना (Writing Items and Finding their Difficulty Value)- उपर्युक्त ढंग से योजना बनाने के पश्चात् अध्यापक को सभी प्रश्न लिखने चाहिए।

20 प्रतिशत अधिक प्रश्न लिखना अच्छा होगा ताकी परीक्षा-पत्र को अंतिम रूप देते हुए फालतू प्रश्नों को हटाया जा सके। परीक्षा पत्र न तो बहुत कठिन होना चाहिए और न ही बहुत आसान। इसके लिए अध्यापक को उसकी कठिनाई स्तर पर भी ध्यान देना चाहिए। प्रत्येक प्रश्न की कठिनाई स्तर को जाँचने के लिए अध्यापक को उस परीक्षण का प्रयोग कुछ विद्यार्थियों पर करना चाहिए। प्रत्येक प्रश्न में उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों के प्रतिशत के आधार पर उस परीक्षण के परिणाम का विश्लेषण करना चाहिए। यदि उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों की प्रतिशत संख्या अधिक हो तो समझ लेना चाहिए कि प्रश्न आसान है। इसी विश्लेषण के आधार पर प्रश्नों का कठिनाई स्तर निश्चित करना चाहिए। 


8. अंकन - तालिका तैयार करना (Preparation of a Scoring Key)- अंकन में वस्तुपरकता लाने के लिए अंकन विधि को पहले से निश्चित किया जाना चाहिए। केवल वस्तुपरक प्रश्नों के लिए ही नहीं बल्कि निबंधात्मक प्रश्नों तथा लघु उत्तर संबंधी प्रश्नों के लिए भी अंकन विधि पहले से निर्धारित होना चाहिए।


उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखकर अध्यापक अपने विद्यार्थियों के लिए उचित उपलब्धि-परीक्षण का निर्माण कर सकता है। परीक्षण लेने के पश्चात् उसे अंकन तालिका की सहायता से विद्यार्थियों के उत्तर जाँच कर उनका अंकन करना चाहिए। इस प्रकार विद्यार्थियों की उपलब्धियों का भी मूल्याँकन किया जा सकता है और अध्यापक की शिक्षण विधियों तथा उसके प्रयासों का भी।