विकास : स्वरूप एवं अवधारणा - Development: Form and concept
विकास : स्वरूप एवं अवधारणा - Development: Form and concept
'विकास' को फैलाव के अर्थ में ग्रहण किया जाता है। वृद्धि के लिए वस्तु के रूप आदि में निरंतर परिवर्तन होना ही विकास है। अर्थशास्त्र में विकास की अवधारणा का तात्पर्य है किसी भी राष्ट्र के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि और वृद्धि का नैरंतर्य बनाए रखना। विकास की अवधारणा में सभ्यता को विकास के साथ-साथ तीन केंद्रीय मूल्य समाहित हो गए जीवनयापन, आत्मगौरव तथा विकल्प चुनने की स्वतंत्रता। द चेंज दु चेंज मॉर्डनाइजेशन, डेवेलपमेंट एंड पॉलिटिक्स शीर्षक लेख में सैमुअल पी. हटिगंटन ने आधुनिकीकरण के संदर्भ में जिन नौ विशेषताओं का उल्लेख किया है, उन्हें प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दूबे ने विकास की प्रक्रिया के लिए भी समान माना है (विकास का समाजशास्त्र, पृष्ठ 28, श्यामाचरण दूबे ) जो निम्नलिखित हैं-
(1) आधुनिकीकरण और विकास, क्रांतिकारी प्रक्रियाएँ है। इसके तकनीकी और सांस्कृतिक परिणाम उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी नव लौह क्रांति के थे, जिसने खानाबदोश और शिकारी आदमी को कृषक के रूप मे स्थापित किया।
अब ग्रामीण कृषि-प्रधान संस्कृतियों को नागर-औद्योगिक संस्कृतियों में बदलने का प्रयास हो रहा है। ए. टाफलर (1980) के शब्दों में यह पहली धारा से दूसरी धारा की ओर आगे बढ़ना है।
(2) आधुनिकीकरण और विकास दोनों की प्रक्रिया जटिल और बहुआयामी है। संज्ञानात्मक, व्यवहारपरक और संस्थागत परिमार्जन तथा पुनर्रचना की श्रृंखला उनके साथ जुड़ी हुई है।
(3) दोनों ही अवधारणाएँ सर्वागिक (Systematic) प्रक्रियाएँ हैं। एक आयाम में पीरवर्तन लाता है।
(4) ये व्यापक प्रक्रियाएँ है। अपने उद्भव - केंद्र से उत्पन्न होकर विचार और तकनीक विश्व के अन्य भागों में फैल जाते हैं।
(5) ये दीर्घकालिक प्रक्रियाएँ हैं। आधुनिकीकरण तथा विकास दोनों में ही समय महत्वपूर्ण है। इन्हें तत्काल उत्पन्न करने वाला कोई तरीका ज्ञात नहीं है।
(6) ये कई चरणों में निबद्ध प्रक्रियाएँ हैं। इतिहास बताता है कि आधुनिकीकरण और विकास के लक्ष्यों
की दिशा में प्रवृत्ति पहचाने जा सकने वाले चरणों और उपचरणों में घटित होती है।
(7) ये समरूप बनाने वाली प्रक्रियाएँ है। आधुनिकीकरण और विकास ज्यों-ज्यों उच्च चरणों पर पहुँचते हैं, राष्ट्रीय समाजों के बीच अंतर घटते हैं और अंततोगत्वा एक स्थिति आती है “जब आधुनिक विचारों और संस्थाओं के सार्वभौमिक रूप लागू होते हैं, जिससे विभिन्न समाज एक ऐसे बिंदु पर पहुँचते हैं कि वे इतने एकरूप हो जाते हैं कि विश्व राज्य का निर्माण करने में समर्थ हो जाते हैं'' (ब्लेक 1966, पृष्ठ 155-174)
(8) दोनों ही ऐसी प्रक्रियाएँ हैं, जिनका रूखा पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। आधुनिकीकरण और विकास में पीछे नहीं जाया जा सकता, हालंकि यदा-कदा उथल-पुथल और अस्थायी तौर पर उतार-चढ़ाव आ सकते हैं।
(9) ये प्रगतिशील प्रक्रियाएँ हैं। आधुनिकीकरण और विकास अपरिहार्य और वांछित हैं। दीर्घकाल में ये मानव की भौतिक और सांस्कृतिक दोनों ही प्रकार की समृद्धि में योगदान करती हैं।
विकास की अवधारणा उत्तर- औपनिवेशिक काल में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व व्यवस्था के संदर्भ में अस्तित्व में आई और शीघ्र ही इसने एक अंतरराष्ट्रीय उघोग का रूप ले लिया। एमेनयुएल वालेरस्टाइन के अनुसार पूँजीवादी विश्व अर्थ-व्यवस्था की स्थापना की तीन शर्तें होती हैं विश्व के भौगोलिक आकार में वृद्धि, विश्व अर्थ-व्यवस्था के विभिन्न कटिबंधों में विभिन्न उत्पादों में श्रम-नियंत्रण की बहुवर्णी विधियाँ और पूँजीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्रीय राज्यों में सशक्त तंत्रों का निर्माण।
आरंभिक अर्थशास्त्र में विकास की अवधारणा बड़ी सरल थी विकास का तात्पर्य था राष्ट्र की स्थिर अर्थव्यवस्था की 5 से 7 प्रतिशत या उससे अधिक की दर से सकल राष्ट्रीय उत्पाद को बढ़ाना और बनाए रखना।
संयुक्त राष्ट्र ने 1960 के दशक को विकास दशक' घोषित किया था, इस अवधि के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की दर का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रयुक्त दूसरा सूचक था प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि और किसी देश की जनसंख्या दर की तुलना में अधिक तीव्र गति से अपने उत्पादन की मात्रा को तय करने के लिए प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि की दर और स्तर का निर्धारण किया गया। वित्तीय विकास की इस अवधारणा में उत्पादन तथा रोज़गार की संरचना में नियोजित बदलाव लाना ही लक्ष्य था। लेकिन बाद में देखा गया कि विकास का लाभ संपूर्ण जनसंख्या की जगह सिर्फ एक छोटे हिस्से को मिला। अंतः पुनर्परिभाषित करने की ज़रूरत महसूस की गई। अब विकसित हो रही व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में निर्धनता तथा असमानता तथा बेरोज़गारी मिटाने के लक्ष्यों के साथ इसे जोड़कर देखा गया। कुछ ही वर्षों में विकास की अवधारणा की बाधाएँ और अवरोधक तत्व सामने आ गए तथा शिक्षा और संचार माध्यमों तथा स्वास्थ्य सुविधाओं तथा सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। संरचनात्मक स्तर पर परिवर्तन के लिए जनमत का दबाव और सोद्देश्य प्रशासनिक गठन एवं क्रियान्वयन की आवश्यकता, परियोजनाओं को कार्यरूप में परिणत करने के लिए अपेक्षित कल्पनाशीलता का अनुभव विकास की प्रक्रिया में प्रमुख अवरोधक तत्वों के रूप में पहचाने गए।
तीसरी दुनिया के देशों में परंपराएं और संस्कृति विकास के मार्ग में बाधा बनी। परंपरा के प्रति निष्ठा और आधुनिकीकरण के प्रति लगाव के बीच की दूरी को पाटने के लिए जिस गतिशीलता की आवश्यकता थी, उसके अभाव ने विकास की प्रक्रिया को धीमा रखा। इसके अतिरिक्त शिक्षा तथा तकनीकी ज्ञान का पर्याप्त प्रचलन होने के कारण विकास के कार्यक्रमों का अकुशल नियोजन हुआ, इससे प्रबंधन को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा। विकास के अनंतर कुछ सफल कार्यक्रमों को कई बार अप्रत्याशित रूप से कट्टरपंथी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा और विकास की प्रक्रिया जो आधुनिकीकरण से अनिवार्यत: संबंद्ध थी, उसमें घोषित लाभ कहीं नहीं दिखे, और तीसरी दुनिया के देश और अधिक निर्धन होते गए। अपेक्षित परिणामों के अभाव ने व्यापक जनसमुदाय में विरक्ति का संचार किया सामाजिक अनुशासन की कमी ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज जबकि विश्व को 'ग्लोबल गाँव' कहा जा रहा है वहाँ वर्ग, जाति और लिंग के आधार हो रहे सामाजिक आर्थिक भेदभाव दरअसल ग्लोबल विलेज' की अवधारणा को खंडित कर रहे हैं।
विश्व के सभी देश चाहे यूरोप के देश हो, अमेरिका हो, या विकासशील देश उनके भीतर उत्तर औपनिवेशिक युग में पुरानी परंपराएं और रूढ़िया सिर उठा रही हैं- आधुनिकता और भूमंडलीकरण के इस दौर में आधुनिकताविरोधी तथा विकास विरोधी विचार धाराएँ दृढ़ हो रही हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो आधुनिकता और विकास का अर्थ है-प्रगति। लेकिन यह देखने की बात है कि इस विकास का परिणाम क्या हैं? कुछ विकसित देशों को सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर विकास की कड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। अकेलापन, व्यर्थताबोध, तलाक, विवाहेतर, संबंध, आत्महत्या की घटनाएं, मनोरोग, हिंसा (वैयक्तिक और सामूहिक) को विकास के नकारात्मक परिणामों के तौर पर देखा जा सकता है। वृद्धि के लिए वस्तु के रूप आदि में निरंतर परिवर्तन होना ही विकास है-सभ्यता के विकास के साथ इसमें तीन केंद्रीय मूल्यों का समाहार हो गया- जीवनयापन, आत्मगौरव और विकल्प चुनने की स्वतंत्रता। समाज में मनुष्य के विकास की क्रमिक अवस्थाओं के विषय में कई बौद्धिकों और विचारकों ने अपने विचार व्यक्त किए।
विश्व में पितृसत्तात्मक समाज की स्थापना 3100 से लेकर 600 ईसा पूर्व तक की एक लंबी प्रक्रिया थी, जिसमें पुरुषवर्चस्ववादी शक्तियों ने स्त्री को एक अधीनस्थ स्थिति में ला खड़ा किया। प्रसिद्ध दार्शनिक एवं चितंक ‘प्लेटो' ने पुरुषों को अपने घर के गुलामों और स्त्रियों पर अपनी सत्ता और शासन कायम रखने की सलाह दी थी।
अरस्तू' ने राजनीति को स्त्रियों का कार्यक्षेत्र ही नहीं माना और उनके अस्तित्व की सार्थकता गुलामों की तरह घरेलू काम-काज करने और सीखने में मानी तथा विकास का सारा दारोमदार पुरुषों को सौंपा। इसके बाद 'डेकार्टस' के अनुसार स्त्रियों का काम उच्चतर संधानों और बौद्धिक श्रम से थके पुरुषों के लिए भोग्या की भूमिका निभाना है। कांट' ने स्त्री-पुरुष के लैंगिक विभेद को गहरा करते हुए बताया कि पुरुषों को कोई संरक्षण और सहारा नहीं चाहिए, जबकि स्त्रियां कूप मंडूक होती हैं, और इसलिए उनकी उपस्थिति द्रवक होती है। 'हीगेल' ने अपने सिद्धांत द्वंद्ववाद में माना कि “मनुष्य के विकास की क्रमिक अवस्थाएँ होती हैं: आत्मिक और सामाजिक संरचनाएं जो बुद्धि के रास्ते प्रज्ञा में उदात्तीकरण नामक विकास-क्रमका आईना मानी जा सकती हैं। विकास की आरंभिक/अपरिपक्व अवस्था का प्रतिबिबंन स्त्री के सरल चित्र में होता है घर-गृहस्थी, भावनात्मक सुरक्षा आदि छोटी चिंताओं से ये इस क़दर भरी होती हैं कि नाक के आगे इन्हें कुछ सूझता ही नहीं, 'प्राइवेट स्फियर' लांघकर पब्लिक स्फियर' के बृहत्तर उद्देश्यों के बारेमें सोचना इनसे सधता नहीं।
इसलिए इन्हें 'नागरिक' तो माना ही नहीं जा सकता; अधिक से अधिक ये इतना कर सकती हैं कि पुरुषों को वृहत्तर सामाजिक उद्देश्य साधने की प्रेरणा और सुविधा दें। हीगेल ने पुरुषों के विकास की तुलना पशुओं से और स्त्रियों के विकास की तुलना वनस्पतियों से की।
(स्त्रीत्व का मानचित्र अनामिका पृष्ठ 21) कार्लमार्क्स ने आगे चलकर सभ्यता के विकास के केंद्रीय सत्य के रूप में वर्ग संघर्ष को पहचाना। जॉन स्टुअर्ट मिल वे पहले दार्शनिक थे जिन्होंने समाज और राष्ट्र के सम्यक विकास में स्त्री और पुरुष की बराबर की भागीदारी की बात की, लेकिन वे स्त्री के लिए 'विवाह' या कैरियर में से किसी एक को चुनने की बात की।
दार्शनिक और चिंतकों के विचारों के अलावा वर्ग और लिंग विभेद की संरचना ने पूँजीवादी व्यवस्था को सशक्त बनाया। पूँजीवादी शक्तियों ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था को हमेशा से प्रोत्साहित किया, इसका प्रभाव साहित्य और विचारधाराओं पर भी पड़ा। विकास की लंबी प्रक्रिया में पितृसत्ता, लिंग-विभेद ने स्त्रियों के संपूर्ण व्यक्तित्व, समाज में उनके प्रति सोच को प्रभावित किया। लैंगिक विभेद और विकास की अवधारणाओं को समझकर ही हम स्त्री के विकास को अच्छी तरह समझ सकते हैं लिंग और विकास की अवधारणाओं को समझने के लिए हमें कुछ पारिभाषिक शब्दों की ओर देखना होगा-
(1) संस्कृति- विचारों, विश्वासों और नियमों का एक विशिष्ट स्वरूप जो समाज के किसी एक वर्ग अथवा किसी समाज़ के संबंधों और जीवन शैली का निश्चित करता है।
(2) लैंगिक विश्लेषण- समाज में लिंगाधारित भेदभाव और सामाजिक संबंधों का विश्लेषण करना, ताकि लैंगिक भेदभाव के कारणों की तह तक पहुँचा जा सके।
(3) लैंगिक भेदभाव - किसी व्यक्ति से लिंग के आधार पर भेदभाव करना और उसे लिंग के कारण अधिकारों एवं अवसरों से वंचित करना।
(4) श्रम का लैंगिक विभाजन- समाज में प्रचलित वे विचार और अभ्यास जो पुरुष और स्त्री के उपयुक्त श्रम का विभाजन करते हैं।
(5) लैंगिक समानता और न्याय - लैंगिक समानता का अर्थ है कि स्त्रियों को भी जीवन में पुरुषों के समान अवसर मिलें। इसमें सामाजिक क्षेत्र में बराबरी के अवसर भी शामिल हैं।
लैंगिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन के साधनों में स्त्री और पुरुष को उनकी अलग-अलग आवश्यकताओं और रुचियों के आधार पर उचित भागीदारी मिले तथा शक्ति एवं उत्पादन के स्रोतों का पुनर्वितरण हो।
( 6 ) लैंगिक मुख्यधारा- किसी संस्था के सभी पक्षों उसकी नीतियों और क्रियाकलापों में लैंगिक समानता के मुद्दों पर विचार करना और उसे मुख्यधारा में लाना। में
( 7 ) लैंगिक आवश्यकताएँ- एक समूह के रूप में खियों का स्त्रीलिंग के तौर पर अपनी आवश्यकताओं को पहचानना।
(8) लिंगाधृत योजना - लैंगिक भेदभाव रहित समाज निर्माण की दिशा में तकनीकी और राजनैतिक
प्रक्रियाएं और प्रणाली की योजना का निर्माण एवं उसे व्यवहार में लाने का प्रयास। यौन और लिंग यौन किसी जैविक विशेषताओं की ओर संकेत करता है और उसे मादा या नर की श्रेणी में रखता है, जबकि लिंग का संबंध समाज द्वारा निर्धारित विचारों और प्रयतन से है जो किसी को नर या मादा के रूप में निर्धारित करता है। सामाजिक न्याय सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में औचित्य, न्याय और समानता, जो विकास के परिणाम स्वरूप ही आ सकते हैं, उनका अधिकार के रूप में प्रयोग।
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