विकास के प्रतिमान - development model

विकास के प्रतिमान - development model


एडम स्मिथ की कृति वेल्थ ऑफ नेशन्स को विकास के अर्थशास्त्र को पहला ग्रंथ माना जाता है, लेकिन विकास के अर्थशास्त्र का व्यवस्थित अध्ययन की शुरूआत 20 वीं सदी के मध्य में प्रारंभ हुआ ।"


विकास की अवधारणा के क्रम में शुरूआती दौर में अर्थशास्त्रियों की नज़र में विकास की अवधारणा उस रूप में नहीं थी, जिस रूप में आज की तिथि में हम विकास की अवधारणा को लेते हैं। उस दौर में सिर्फ तार्किक अवधारणा की जाती थी। विकास की सीमा आर्थिक संवृद्धि तक ही सीमित होती थी। प्रगति की माप प्रति व्यक्ति आय, सकल राष्ट्रीय उत्पाद तथा सक्रिय औद्योगिक इकाईयों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता था। विकास के आर्थिक संवृद्धि के इस परिप्रेक्ष्य में विकास को इसी नजरिये से देखा गया और खास तौर से उत्पादन की भौतिक एवं मानवीय जैसे भूमि, श्रम, पूँजी एवं तकनीक मे सतत वृद्धि ही उल्लेख माने गए। इस तरह से शुरू-शुरू में विकास को आर्थिक संवृद्धि के आधार पर अर्थशास्त्र के अंतर्गत परिभाषित करने की कोशिश हुई।


एडम स्मिथ ने 18 वीं सदी की औद्योगिकी क्रांति की शुरूआती दौर में अधिक संवृद्धि की प्रस्थापना दी। वृद्धि के लिए तकनीकी विकास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शास्त्रीय अर्थशास्त्र ने आर्थिक संवृद्धि आधारित विकास पर बल दिया। इसके अंतर्गत कहा गया कि यदि वार्षिक वृद्धि दर 5 से 6 प्रतिशत हो तो उस अर्थशास्त्र को विकासशील माना जा सकता है। शास्त्रीय युगीन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डब्ल्यू. ए. लेविस ने वितरण की जगह प्रति व्यक्ति आय को आधार बनाया।


कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक क्रम विकास में प्रौद्योगिकी को एक निर्णायक कारण माना है। उनकी मान्यता है कि प्रौद्योगिक वर्ग ध्रुवीकरण को बढ़ा देती है, जिसके चलते वर्ग-संघर्ष की तीव्रता बढ़ती है और संगठित श्रमिक अपनी ताकत से पूँजीपतियों को अधिकार विहीन करके उत्पादन के साधन पर स्वामित्व प्राप्त कर लेते हैं।


एडम स्मिथ तथा डेविल रिकोर्डों ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि का आर्थिक संवृद्धि की दर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं जॉन मेनार्ड केन्स ने स्मिथ और रिकार्डो की इस मान्यता की आलोचना करते हुए कहा कि जनसंख्या वृद्धिवस्तुओं की माँग को बढ़ा देती है, जो निवेश और आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करती हैं।


एडम स्मिथ डेविड, राबर्ट माल्थस, जॉन स्टुअर्ट मिल आदि अर्थशास्त्रियों के यहाँ विकास का मानवीय दृष्टिकोण पाया जाता है, किंतु कालांतर में आर्थिक संवृद्धि की महत्व मिलने के कारण यह गौण हो गया। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम UNDP ने सन 1990 की मानव विकास रिपोर्ट ने विकास की अवधारणा को परिभाषित करते हुए कहा कि विकास इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही किया जाना चाहिए कि यह ज़रूरी नहीं कि आर्थिक संवृद्धि यथार्थ परक और जमीन से जुड़ा विकास हो । विकास का अंतिम लक्ष्म मानव कल्याण है और विकास की अवधारणा का मानव विकास परिप्रेक्ष्य विकास के मानवीय पक्ष पर केंद्रित हैं यह अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि तथा जीवन की गणवत्ता में सुधार के बीच कोई स्वतः स्फूर्ति और सीधा संबंध नहीं है।

माइकेल पी. टोडारो ने कहा कि विकास आय और उत्पादन में वृद्धि के साथ ही साथ संस्थात्मक, सामाजिक और प्रशासनिक संरचनाओं में आमूलचूल परिवर्तन पर निर्भर करता है। किसी समाज में लोगों के जीवन स्तर और भौतिक दिशाओं में सुधार तक ही विकास सीमित नहीं है, बल्कि मानव विकास सूचकांक जैसे जीवन प्रत्याशा, शिशु मृत्यु, दर व्यस्क साक्षरता तथा लोगों की सामाजिक दशाओं में सुधार को भी शामिल करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 60 और 70 के दशक को विकास दशक मानते हुए 6 प्रतिशत या अधिक का सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि का लक्ष्य प्राप्त करने वाले देश को विकासशील अर्थव्यवस्था मानने का प्रस्ताव किया तथा 6 प्रति वृद्धि दर को और जी. एन. पी. की 6 प्रतिशत वृद्धि दर को आधार बनाकर उसने विकास को परिभाषित किया।


किंतु 50 और 60 के दशक में ही विकासशील देश के अनेक देशों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित वृद्धिदर हासिल कर ली थी तब 70 के दशक में डडले सिअर्स से प्रभावित होकर बेरोज़गारी, असमानता और गरीबी उन्मुलन को आधार बनाकर विकास को परिभाषित किया जाने लगा। इसके बावजूद भी गरीबों का उन्मूलन नहीं किया जा सकता और बेरोज़गारी असमानता बनी हुई है।


जिन दिनों तीसरी दुनिया के देश आर्थिक विकास के लिए प्रयासरत थे, उन्हीं दिनों सामाजिक विकास की अवधारणा अस्तित्व में आई। अनेक अर्थशास्त्रियों एवं संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं ने इस बात को स्वीकार किया कि आर्थिक विकास के लिए आर्थिक के अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए इनका विकास भी आवश्यक है। विकासशील देशों का आधुनिकीकरण ठीक से न होने की वजह से उनके विकास में कई समस्याएँ हैं।


सामाजिक विकास की अवधारणा में आर्थिक विकास शामिल है, किंतु यह अवधारणा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्षों को भी विकास के लिए महत्वपूर्ण मानती है। इस अर्थ में सामाजिक विकास नियोजन अब सिर्फ सामाजिक सेवाओं हेतु नियोजन से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि यह आर्थिक संवृद्धि हेतु नियोजन से अधिक संबद्ध है। सामाजिक और कल्याणकारी सेवाओं के अतिरिक्त भी बहुत सारे ऐसे क्षेत्र है, जिनमें सामाजिक विकास परिप्रेक्ष्य की प्रासंगिकता है। इनमें से प्रमुख क्षेत्र है - जनसंख्या, नगरीकरण, औद्योगिक अवस्थिति तथा पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित नीतियाँ, क्षेत्रीय विकास, आय वृद्धि आय-वितरण तथा भूमि सुधार से संबंधित नीतियाँ, प्रशासन को चलाने वाली नीतियाँ तथा योजनाओं के कार्यान्वययन तथा नियोजन में जनता की सहभागिता।