विद्यार्थियों में रचनाशीलता का विकास - development of creativity in students
विद्यार्थियों में रचनाशीलता का विकास - development of creativity in students
रचनाशीलता को पल्लवित एवं पोषित करने के लिए उचित वातावरण एवं देख-रेख की आवश्यकता होती है। यदि इसे उचित प्रशिक्षण, शिक्षा तथा अभिव्यक्ति के पर्याप्त अवसर प्रदान न किए जाएँ तो यह व्यर्थ चली जाती है। इसके अतिरिक्त जैसा कि हम पहले पढ़ चुके हैं, रचनाशीलता सार्वभौमिक होती है, इस पर कुछ एक प्रतिभा संपन्न व्यक्तियों का एकाधिकार नहीं होता है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति कुछ-न-कुछ मात्रा में रचनात्मक योग्यताएँ रखता है।
अतः अध्यापकों तथा माता-पिता के लिए यह आवश्यक है कि वे बच्चों की रचनाशीलता के विकास के लिए उचित वातावरण तथा स्थितियों की व्यवस्था करें। यह समस्या कठिन अवश्य है, परन्तु इसका समाधान भी है। उचित अभिप्रेरणा तथा परिस्थितियों द्वारा रचनात्मक योग्यताओं को विकसित किया जा सकता है।
मौलिकता, लचीलापन, प्रवाहात्मक विचारधारा, विविध-चिन्तन, आत्मविश्वास, सतत् परिश्रम, संवेदनशीलता, सम्बन्धों को देखने तथा बनाने की योग्यता आदि कुछ ऐसी योग्यताएँ हैं जिनका विकास रचनाशीलता के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है। इन योग्यताओं को विकसित करने के लिए निम्नलिखित सुझाव सहायक सिद्ध हो सकते हैं:
• उत्तर देने की स्वतंत्रता- अक्सर देखा जाता है कि अध्यापक और माता-पिता अपने बच्चों से पुराने पिटे - पिटाए उत्तर की आशा रखते हैं। इससे बच्चों में रचनाशीलता विकसित नहीं होती है। अतः हमें बच्चों को उत्तर देने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए। उन्हें समस्या के समाधान के लिए अधिक-से-अधिक विचारों का चिन्तन करने के लिए उत्साहित करना चाहिए।
• अहम् अभिव्यक्ति के लिए अवसर - "यह मेरी रचना है”, “मैंने इसे हल किया है”- यह भावना बच्चों को अधिक संतुष्टि प्रदान करती है। वस्तुतः वे तभी रचनात्मक कार्यों में निश्चित रूप से जुटते हैं जब उनमें उनका अहम् निहित हो अर्थात् जब वे अनुभव करें कि उन्हीं के प्रयासों से ही अमुक रचनात्मक कार्य संभव हो सका है। अतः हमें बच्चों को ऐसे अवसर प्रदान करने चाहिएँ जिनसे उन्हें अनुभव हो सके कि यह रचना उनके द्वारा ही संपन्न हुई है।
• मौलिकता तथा लचीलेपन को प्रोत्साहित करना- बच्चों में किसी भी रूप में विद्यमान मौलिकता को प्रोत्साहित करना चाहिए। तथ्यों का अंधाधुंध अनुसरण करना, जैसी की तैसी नकल कर देना, निष्क्रिय भाव से ज्ञान प्राप्त करना, रटना आदि रचनात्मक अभिव्यक्ति में बाधक होते हैं। अतः इन पर यथासंभव नियंत्रण रखना चाहिए। किसी समस्या का समाधान करते समय या किसी काम को सीखते समय यदि वे अपनी विधियों को परिवर्तित करना चाहते हैं तो उनको प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
• झिझक और डर को दूर करना कई बार डर तथा हीन भावना से मिश्रित झिझक रचनात्मक अभिव्यक्ति में बाधा डालती है। कई बार हमने लोगों को यह कहते सुना है “मैं जानता हूँ कि मेरा मतलब क्या है लेकिन मैं दूसरों के सामने लिख या बोल नहीं सकता। इस प्रकार के डर या झिझक के कारणों को यथासंभव दूर करने का प्रयास करना चाहिए। अध्यापक एवं माता-पिता को चाहिए कि वे इस प्रकार के बच्चों को कुछ कहने या लिखने की प्रेरणा दें।
• रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उचित अवसर एवं वातावरण प्रदान करना- बच्चों में रचनाशीलता को बढ़ावा देने के लिए स्वस्थ एवं उचित वातावरण की व्यवस्था करना अत्यन्त आवश्यक है। सीखने और प्रयोग करने, ज्ञान की निष्क्रिय प्राप्ति या निजी प्रयत्नों द्वारा ज्ञान प्राप्ति एवं निश्चित स्थिरता तथा जोखिम में पर्याप्त संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए। बच्चे की जिज्ञासा तथा सहनशीलता को किसी भी सूरत में दबाना नहीं चाहिए।
रचनात्मक अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करने के लिए हम पाठ्य सहगामी क्रियाओं, सामाजिक उत्सवों, धार्मिक मेलों, प्रदर्शनी आदि का प्रयोग कर सकते हैं। नियमित कक्षा-कार्य को भी इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है जिससे बच्चों में रचनात्मक चिन्तन का विकास हो।
• बच्चों में स्वस्थ आदतों का विकास करना- श्रमशीलता, आत्म-निर्भरता, आत्मविश्वास आदि कुछ ऐसे गुण हैं जो रचनाशीलता में सहायक होते हैं। बच्चों में इन गुणों का निर्माण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति पर हो रही आलोचना के विरुद्ध भी खड़े रहने का भी प्रशिक्षण देना चाहिए। उन्हें यह बात अनुभव करनी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने रचा है वह अनुपम है और उसके द्वारा वह चीज़ अभिव्यक्त हो रही है जिसे वे अभिव्यक्त करना चाहते हैं।
• समुदाय के रचनात्मक साधनों का प्रयोग करना बच्चों को रचनात्मक कला केन्द्रों तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक निर्माण केन्द्रों की यात्रा करनी चाहिए। इससे उन्हें रचनाशील कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। कभी-कभी कलाकारों, वैज्ञानिकों तथा अन्य रचनाशील व्यक्तियों को भी स्कूल में आमंत्रित करना चाहिए। इस प्रकार बच्चों के ज्ञान-विस्तार में सहायता मिल सकती है और उनमें रचनाशीलता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
• अपना उदाहरण एवं आदर्श प्रस्तुत करना- यह कथन सत्य है कि “अपना उदाहरण सिद्धान्त से अच्छा होता है”। बच्चे हमेशा अनुसरण करते हैं। जो अध्यापक और माता-पिता हमेशा पिटे पिटाए रास्ते पर चलती हैं, जीवन में खतरे मोल लेकर मौलिकता नहीं दिखाते, कोई नया अनुभव नहीं करते या कोई नया काम नहीं करते वे अपने बच्चों में रचनाशीलता का विकास नहीं कर सकते। अतः उन्हें परिवर्तन, नवीनता तथा मौलिकता में विश्वास करना चाहिए। उनके शिक्षण तथा व्यवहार में सृजनप्रियता की झलक मिलनी चाहिए, तभी वे बच्चों में रचनात्मकता का विकास कर सकते हैं।
• रचनात्मक चिन्तन के अवरोधों से बचना- परम्परावादिता, शिक्षण की त्रुटिपूर्ण विधियों, असहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, बच्चों में व्याप्त अनावश्यक चिंता एवं कुण्ठा, न बदले जाने वाली स्थिर और परंपरागत कार्य आदतें, पुराने विचारों, आदर्शों और वस्तुओं के नवीन के प्रति भय और विरक्ति की भावना छोटे-छोटे प्रत्येक कार्य में उपलब्धि की उच्च स्तर की माँग, परीक्षा में अधिक अंक अर्जित करने के कार्य को सर्वोच्चता, शिक्षकों और दुराग्रह और अभिभावकों का बच्चों के प्रति निरंकुश और तानाशाही दृष्टिकोण, बच्चों को लीक से हटकर सोचने या कार्य करने को निरुत्साहित करना आदि ऐसे अनेक कारण और परिस्थितियाँ हैं जिनसे बच्चों में रचनाशीलता के विकास और पोषण में बाधा पहुँचती है। अतः अध्यापक और अभिभावकों का यह कर्तव्य है कि वे वे रचनात्मकता के शत्रु इन सभी कारणों और परिस्थितियों
से बच्चों की रचनात्मकता को नष्ट होने से बचाने के लिए हर संभव प्रयत्न करें।
• पाठ्यक्रम का उचित आयोजन- पाठ्यक्रम अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अतः विद्यालय पाठ्यक्रम को इस प्रकार आयोजित किया जाना चाहिए कि वह बच्चों में अधिक-से-अधिक रचनाशीलता विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सके। निम्न उपाय इस दिशा में अधिक लाभप्रद हो सकते हैं:
• तथ्यों की अपेक्षा संप्रत्ययों को पाठ्यक्रम के आयोजन का आधार बनाया जाना चाहिए।
• सभी बच्चों की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के स्थान पर बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति को ही पाठ्यक्रम द्वारा प्राथमिकता दी जानी चाहिए ।
• “सत्य की खोज की जाती है, वह स्वयं ही प्रकट नहीं होता। इस दार्शनिक दृष्टिकोण को पाठ्यक्रम के चयन और आयोजन में विशेष स्थान दिया जाना चाहिए।
• पाठ्यक्रम काफी लचीला होना चाहिए और उसमें परीक्षा और मूल्यांकन की आवश्यकता से परे हटकर कुछ और पढ़ने-पढ़ाने एवं करने की पर्याप्त स्वतंत्रता होनी चाहिए।
• संक्षेप में पाठ्यक्रम का आयोजन सब प्रकार से इस तरह किया जाना चाहिए कि उसके द्वारा रचनाशीलता में सहायक विभिन्न गुणों- प्रवाहात्मकता, लचीलापन, मौलिकता, विविधतापूर्ण चिन्तन, अन्वेषणशीलता और विस्तारीकरण आदि के विकास में भरपूर सहयोग मिल सके।
• मूल्यांकन प्रणाली में सुधार जो कुछ भी विद्यालय में पढ़ा और पढ़ाया जाता है वह सब प्रकार से परीक्षा केन्द्रित होता है। अतः जब तक परीक्षा और मूल्यांकन के ढांचे में अनुकूल परिवर्तन नहीं आता तब तक किसी भी शिक्षा व्यवस्था के द्वारा रचनाशीलता का पोषण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए हमें रटन्त स्मृति (Rote memory) केन्द्रित और एक विध चिन्तन (Convergent thinking), घिसे-पिटे एक से उत्तर अथवा अनुक्रियाओं की माँग आदि रचनात्मकता को नष्ट करने वाली बातों के स्थान पर परीक्षा प्रणाली में उन सभी बातों का समावेश करना चाहिए जिनके द्वारा विद्यार्थियों को ऐसे अधिगम अनुभव अर्जित करने के लिए प्रोत्साहन मिले जो रचनाशीलता का पोषण और विकास करते हैं।
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