विद्यार्थियों में रचनाशीलता का विकास (2) - development of creativity in students

विद्यार्थियों में रचनाशीलता का विकास (2)- development of creativity in students

रचनाशीलता के विकास के लिए विशेष तकनीकों का प्रयोग रचनाशीलता के क्षेत्र में कार्य कर रहे अनुसंधानकर्ताओं ने बच्चों में रचनात्मकता के विकास के लिए जिन विशेष तकनीक एवं विधियों का उपयोग उचित ठहराया है, इनमें से कुछ का उल्लेख हम नीचे कर रहे हैं: -


i. मस्तिष्क उद्वेलन (Brainstorming ) - मस्तिष्क उद्वेलन एक ऐसी तकनीक एवं विधा है जिसके द्वारा किसी समूह विशेष से बिना किसी रोक-टोक, आलोचना, मूल्यांकन या निर्णय की परवाह किए बिना किसी समस्या विशेष के हल के लिए विभिन्न प्रकार के विचारों एवं समाधानों को जल्दी जल्दी प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है और फिर विचार-विमर्श के बाद उचित हल एवं समाधान तलाशने का प्रयत्न किया जाता है।


तकनीक की प्रयोग विधि-मस्तिष्क उद्वेलन तकनीक को काम में लाने हेतु बच्चों को एक समूह के साथ बैठाकर किसी समस्या विशेष का समाधान ढूंढने के लिए प्रेरित किया जाता है। उदाहरण के लिए कुछ समस्याएँ इस प्रकार की हो सकती हैं यथा-विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता, देश में बढ़ती जनसंख्या अथवा बेरोज़गारी, 'अलगाववाद और सम्प्रदायवाद की समस्या, विद्यालय पुस्तकालय की सेवाओं में सुधार', 'परीक्षाओं में बढ़ती हुई नकल की प्रवृत्ति' आदि। किसी एक समस्या पर बच्चों का ध्यान केन्द्रित करते हुए यह स्पष्ट बता दिया जाता है कि कोई भी बच्चे बिना किसी झिझक या हिचकिचाहट के अपने विचार व्यक्त करने एवं समाधान प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र हैं। वे जितने भी समाधान प्रस्तुत करना चाहें, कर सकते हैं। इस तरह से पूरा का पूरा समूह समस्या विशेष पर समाधानों से युक्त अपने-अपने विचारों तथा सुझावों की एक आंधी स हैं। इसी विचाररूपी आंधी में से रह-रह कर नए-नए समाधानों तथा रचना के रूप में विद्युत् छटा सी कौंधती रहती है और इस तरह सभी बच्चों को रचनात्मक चिन्तन का पूरा-पूरा अवसर मिलता रहता हैं।


• रचनाशीलता के विकास में सहायक इस तकनीक से उचित लाभ उठाने की दिशा में कुछ निम्न बातों पर ध्यान देना विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है:


• समूह में सभी को विचार एवं सुझाव प्रस्तुत करने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। कोई भी विचार या सुझाव सही या गलत नहीं है, बच्चों को यह समझाकर पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए तथा साथ में यह भी बता देना चाहिए कि जिस समय सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हों तब बीच में रोका-टोकी या आलोचना आदि कदापि नहीं की जानी चाहिए।


• कोई भी बच्चा समस्या समाधान के लिए जितने विचार एवं विविध तरीके प्रस्तुत करना चाहे, कर सकता है। परंपरागत प्रतिमानों से हटकर असाधारण विचारों (), समाधान और सुझावों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।


• बच्चों द्वारा सर्वथा नए विचार और बिल्कुल ही अलग प्रकार के समाधान प्रस्तुत किए जाएँ, यह आवश्यक नहीं। वे दूसरों के द्वारा दिए गए विचारों में जितना भी फेर-बदल और परिवर्तन करवाने विचारों एवं संसाधनों को नवीन ढंग से प्रस्तुत कर सकें, ये भी रचना में शामिल होता है अतः ऐसा करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


• अंत में मूल्यांकन और समालोचना का कार्य मिल बैठकर किया जाना चाहिए। जितने भी विचार एवं समाधान बच्चों द्वारा प्रस्तुत किए जाएँ उन्हें लिखित रूप में समूह के सामने रखा जाना चाहिए और उन पर निष्पक्ष रूप से खुलकर चर्चा होनी चाहिए ताकि समस्या समाधान में सहायक उपयुक्त युक्तियों एवं विचारों का ठीक चयन हो सके।


i. शिक्षण प्रतिमानों का प्रयोग शिक्षा शास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित कुछ विशेष शिक्षण प्रतिमानों का प्रयोग भी बच्चों की रचनाशीलता के विकास में पर्याप्त योगदान दे सकता है।

उदाहरण के लिए, ब्रूनर का संप्रत्यय उपलब्धि प्रतिमान संप्रत्ययों को ग्रहण करने के अलावा बच्चों को रचनाशील बनाने में भी सहयोग देता है और इसी तरह सचमैन का पूछताछ प्रशिक्षण प्रतिमान (Suchman's Inquiry Training Model) वैज्ञानिक ढंग से पूछताछ करने के कौशल को विकसित करने के अतिरिक्त रचना में सहायक विशेष गुणों को विकसित करने में पर्याप्त सहायता करता है।


ii. क्रीड़न तकनीकों का प्रयोग खेल-खेल में ही रचनात्मकता का विकास करने की दृष्टि से क्रीड़न तकनीकों का अपना एक विशेष स्थान है। इस कार्य हेतु इन तकनीकों में जो प्रयोग सामग्री काम में लाई जाती है वह शाब्दिक (Verbal) तथा अशाब्दिक (Non verbal) दोनों ही रूपों में होती है। शाब्दिक सामग्री के अंतर्गत प्रायः निम्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं:


• जितनी भी गोल वस्तुओं के बारे में आप सोच सकते हैं, उन सभी के नाम बताइए।


• एक चाकू को जितने विभिन्न ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है, उनका उल्लेख कीजिए ।


• कुत्ता और बिल्ली किन-किन बातों में समान ठहराए जा सकते हैं, उन सभी बातों को बताइए।


अशाब्दिक क्रीड़न सामग्री के अंतर्गत बच्चों को कोई भी चित्र बनाने, अधूरे चित्र को पूरा करने, किसी डिज़ाइन या नमूने की रचना करने अथवा उसकी व्याख्या करने, ब्लॉक या टुकड़ों की सहायता से दी हुई आकृति या चित्र के अनुरूप कोई प्रतिमान बनाने, रेखाचित्र या कार्टून बनाने और दिए हुए कच्चे माल एवं उपलब्ध उपकरणों की सहायता से कोई विशेष निर्माण अथवा अपनी इच्छानुसार कुछ भी नया बनाने के लिए कहा जा सकता है। इस प्रकार की क्रीड़न सामग्री द्वारा बच्चों को खेल खेल में ही निर्माण एवं रचना के लिए जो बहुमूल्य अवसर प्राप्त होते हैं उन सभी का उनकी रचनाशीलता के विकास एवं पोषण हेतु पूरा-पूरा लाभ उठाया जा सकता है।