विकासात्मक कार्य, निर्धारक एवं सिद्धांत Developmental Functions, Determinants and Principles

विकासात्मक कार्य, निर्धारक एवं सिद्धांत Developmental Functions, Determinants and Principles


व्यावसायिक विकास व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्र में धुनिक उपागम है जो कि समेलन उपागम की तुलना में अधिक व्यापक लक्ष्यों की सिद्धि पर बल देता है। समेलन उपागम व्यक्ति तथा व्यवसाय के मध्य समेलन स्थापित करने पर बल देता है लेकिन व्यावसायिक विकास उपागम व्यक्ति के समग्र विकास पर बल देता है। व्यावसायिक विकास का अभीष्ट उद्देश्य व्यक्ति के व्यावसायिक आत्म सप्रत्यय का अधिकतम विकास संभव बनाना है। यह उपागम व्यक्ति के लिए उसके विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर अनेक लक्ष्य निर्धारित करता है जिसकी प्राप्ति व्यक्ति द्वारा की जानी चाहिए। इस विकास की सफलता के लिए अनके निर्धारक होते हैं।


1 विकासात्मक कार्य -


विकासात्मक कार्य का अर्थ है विकास की प्रत्येक अवस्था में उचित विकास का पूरा होना।

राबर्ट हेविगर्स्ट ने विकास की सभी अवस्थाओं के लिए व्यावसायिक विकास के लक्ष्यों का निर्धारण किया है जो उनके विकासात्मक कार्यों संबंधी विचारों का विस्तार है। व्यक्ति द्वारा विकासात्मक कार्यों की प्राप्ति से उसे सुख का अनुभव होता है जबकि विफलता के कारण व्यक्तिको दुख का अनुभव होता है, समाज तिरस्कृत करता है तथा अगली अवस्था में विकास के निर्धारक लक्ष्यों की प्राप्ति में कठिनाई आती है। हेविगर्स्ट के द्वारा वर्णित लक्ष्यों का वर्णन करते हुए जोन्स 1970, एवं नायर 1972, व्यावसायिक विकास की अनेक अवस्थाओं का विभाजन करते हैं।


प्रथम अवस्था - तादात्मीकरण की होती है जो पांच से दस वर्ष की आयु तक फैली हुई है। इस अवस्था में बालक परिवार के किसी वयस्क के कार्यों के साथ तादात्मय स्थापित करता है।

प्रायः यह व्यक्ति पिता होता है। वर्तमान युग की बदली हुई परिस्थितियों में जबकि माताओं ने विश्वव्यापी स्तर पर रोजगार अपना " लिया है, मां के साथ भी तादात्म्य होना संभव है। हेविगर्स्ट का मानना है कि जिन परिवारों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता है वहां बच्चे वंचना अलाभकारी दशा में होते हैं अतः उनका व्यावसायिक विकास स्वस्थ एवं सामान्य नहीं हो पाता है। इस अवस्था में बालक बातें करना, भौतिक और सामाजिक सत्य का संप्रत्ययन करना, गलत और सही में भेद करना सीखता है तथा अन्तरात्मा का विकास करता है । व्यावसायिक विकास की दृष्टि से यह समझ विकसित होती है जब बड़ा होगा तब वह भी यह कार्य करेगा, अर्थोपार्जन करेगा एवं परिवार की खर्चों की जिम्मेदारी का निर्वाह करेगा।


द्वितीय अवस्था - दस से पन्द्रह वर्ष की आयु की होती है। इस अवधि में वह उद्यमशीलता के लिए मूलभूत प्रतिभा अर्जित करता है। जिम्मेदारी की भावना का अधिगम आरम्भ होता है।

तथा यह बोध विकसित होने लगता है क कार्य करने का अर्थ क्या होता है। अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों में बच्चें अध्ययन के साथ-साथ अल्पकालिक रोजगार करने लग जाते है ऐसी दशा में बालक खेलने के स्थान पर कार्य को महत्व देना सीखने लगता है।


तृतीय व्यावसायिक अवस्था - पंद्रह वर्ष से पच्चीस वर्ष तक की होती है। इस अवधि में किशोर नवयुवक एक रोजगार क्षेत्र का चयन कर सके इसके लिए तैयारी करने लगता है। व्यक्ति प्रायः इस अवधि के अन्त तक किसी व्यवसाय में प्रविष्ट हो जाता है। व्यक्ति स्वयं को भावी कर्मचारी के स्थान पर वास्तविक कर्मचारी के रूप में देखने लगता है। यदि कोई रोजगार नहीं मिल पाता है तब अनेक विसंगतियों की उत्पत्ति होती है।


चतुर्थ व्यावसायिक विकास अवधि - पच्चीस वर्ष की आयु से चालीस वर्ष की अवस्था तक चलती है। इस अवधि में प्रायः व्यक्ति वस्तुतः उत्पादक होता है व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में प्रोन्नतियां प्राप्त करता है तथा अपनी कार्यकुशलता की दृष्टि से उत्कृष्ट बिन्दु पर होता है।


पांचवी अवस्था-लगभग चालीस वर्ष से आरम्भ करके साठ सत्तर वर्ष की आयु तक ( अधिकतम आयु अनके भौगोलिक, जैविक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों द्वारा प्रभावित होता है) को पांचवी अवस्था यथास्थितिवादी काल कहा जा सकता है। व्यक्ति निजी विकास के लिए कम चिंतित होता है व्यक्ति का ध्यान समाज के लिए अपना योगदान सुनिश्चित करने पर केन्द्रित होने लगता है। इस अवधि में व्यक्ति अनेक प्रकार के सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों और कार्यक्रमों में भागीदारी करता है। सार्व भौमिक रूप में इस आयुवर्ग के लोग अपनी अगली पीढ़ी के भविष्य के बारे में चिन्तित होते हैं, अपने बच्चों के कैरियर तथा उनके लिए अच्छे परिवेश की रचना के प्रति योगदान करना चाहते हैं।


अंततः व्यक्ति व्यावसायिक दृष्टि से सीमित जीवन को जीने का प्रयत्न करता है, अपनी उत्पादकता के संदर्भ में गहन चिंतन करता है। अपने योगदान का गहन मूल्यांकन करता है।


हेविगर्स्ट के विचारों में व्यावसायिक विकास के संदर्भ में रेखांकित किए जाने योग्य अनेक तत्व हैं


1. व्यावसायिक विकास में तादात्मीकरण की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तादात्मय का अभाव क्षतिकारक है।


2. व्यावसायिक विकास में परिवार और विद्यालय दोनो की भूमिका महत्वपूर्ण है।


3. अध्यापक और परामर्शदाता व्यावसायिक चयन के विकास में सहायक होने के अतिरिक्त उद्यमिता, जिम्मेदारी तथा अन्य ऐसे महत्वपूर्ण गुणों के विकास में सहायक हो सकते है जो किसी भी कार्यक्षेत्र में सहायक सिद्ध होंगे।


4. विकास की किसी अवस्था में वांछित विकास कार्य की निपुणता अर्जित करने में सहयोग दिया जाना चाहिए क्योंकि एक अवस्था से संबंधित विकास का लक्ष्य पूरा न होने पर अगली अवस्था से संबंधित विकास में कठिनाई आती है, तथा


5. सामाजिक आर्थिक दृष्टि से पिछड़े परिवारों में जन्म लेने वाले, पिता के बिना बड़े होने वाले या अन्य दृष्टियों से अलाभकारी दशा में विकसित होने वाले बच्चों के लिए व्यावसायिक विकास का लक्ष्य पूरा

किए जाने हेतु विशेष प्रयत्न वांछित है। 


डोनाल्ड ई. सुपर 1957 - ने भी व्यावसायिक विकास की पांच अवस्थाओं का वर्णन किया है।


1. वृद्धि अवस्था - 14 वर्ष की अवस्था तक


2. अन्वेषणात्मक अवस्था 15 से 24 वर्ष तक 


3. स्थापना अवस्था 25 से 44 वर्ष तक


4. अनुरक्षण अवस्था 45 से 64 वर्ष तक


5. ह्रास अवस्था 65 वर्ष के पशचात


सुपर ने अपनी अगली पुस्तक सेल्फ कांसेप्ट थ्योरी 1963 में अन्वेषण और अनुरक्षण अवस्था को पांच उपअवस्थाओं अंतरिम, संक्रमण, अन्वेषणात्मक जांच परख, स्थापन जांच परख, और स्थायित्व के रूप में विभाजित किया है ।

सुपर 1963 के अनुसार व्यावसायिक विकासात्मक कार्य में 1. व्यावसायिक वरीयता का क्रिस्टलीकरण तथा 2. वरीयता का विशिष्टीकरण 3. वरीयता का क्रियान्वयन, 4. व्यवसाय में स्थापित होना, तथा 5. व्यवसाय में आगे बढ़ना होता है।


व्यावसायिक वरीयताओं का क्रिस्टलीकरण (रचना एवं पारदर्शिता / स्पष्टता) आरम्भिक किशोरावस्था (अंतिम वरीयता अवस्था) की अवधि में प्रारम्भ हो जाता है। इस अवधि में व्यक्ति कार्य क्षेत्रों और स्तरों के बारे में तथा इस संदर्भ में शिक्षा और प्रशिक्षण के बारे में सोचने लगता है। इस अवस्था में वरीयता अत्यन्त सामान्यीकृत तथा धुधली होती है तथा उसमें स्पष्टीकरण उत्पन्न करने की आवश्यकता का अनुभव होता है। आदतों की दृष्टि से व्यक्ति सूचनाओं की खोज में रहता है। उत्तर किशोरावस्था में सामान्यीकृत वरीयताओं के स्थान पर विशिष्ट चयन की उत्पत्ति होती है। व्यक्ति की अपनी विशिष्ट वरीयता में रूचि बढ़ जाती है। क्रियान्वयन आरम्भिक युवावस्था का विकासात्मक कार्य होता है। व्यवसाय क्षेत्र में प्रविष्ट होने के पश्चात वह अपने व्यावसायिक आत्म संप्रत्यय को कार्यान्वित करने लगता है ऐसा युवावस्था में होता है। तत्पश्चात व्यक्ति व्यवसाय में स्थापित होकर प्रगति करने का प्रयत्न करता है।