डीवी का प्रायोगिक स्कूल - Dewey's Laboratory School
डीवी का प्रायोगिक स्कूल - Dewey's Laboratory School
डीबी के प्रायोगिक स्कूल की स्थापना सन् 1896 में शिकागों में हुई। यहाँ साधारण स्कूलों से भिन्न, बिभिन्न प्रवृत्तियों के आधार पर व्यावहारिक तथा रचनात्मक पाठ्यक्रम के अनुसार 4 वर्ष से 13 वर्ष तक के बालकों को शिक्षा दी जाती है। (1) यहाँ प्रामाणिक प्रयोगों (Crucial Experiments) द्वारा शिक्षण सिद्धातों को परखना, तथा (2) ऐसे सिद्धांतों तथा ज्ञान की खोज करना, जिनकी जानकारी अभी तक शिक्षाशास्त्रियों को भी नहीं थी ये उद्देश्य इस प्रायोगिक स्कूल के थे।
इस स्कूल के सिद्धांतों की खोज तो अवश्य हो सकती है पर क्या यहाँ रसायनशाला की भाँति शिक्षा के प्रयोग भी संभव है? प्रो. चार्ल्स हाड़ी इस बात पर विश्वास नहीं करते। शिक्षा का प्रभाव तो जीवन में उतर आने पर ही देखा जा सकता है इसलिए स्कूल में ही इस प्रकार के प्रयोग संभव नहीं हो पायेंगे। उनका ऐसा मानना था कि डीबी यदि शिक्षा के सिद्धांतों को सिद्ध करने तथा परखने के बजाय केवल खोज पर ही बल देते तो ठीक रहता।
शिक्षा का उद्देश्य (Aims of Education):
पूर्व निर्धारित उद्देश्य डीबी द्वारा मान्य नहीं हो सकते। बर्तमान जीवन में उचित साधनों का उपयोग ही भविष्य के लिए तैयारी है। भविष्य की बात परिवर्तनशील विश्व में पहले से बताई नहीं जा सकती। शिक्षा का उद्देश्य बालक की रुचि के अनुसार सम्यक विकास है। सामाजिक कुशलता उसकी आधारशिला है। "भोजन तथा संतानोत्पत्ति जिस प्रकार भौतिक शारीरिक जीवन के लिए है ठीक उसी प्रकार शिक्षा समाज के लिए है।" उपयोगिता पर परखी हुई शक्तियों का विकास ही बालक में होना चाहिए।
पाठ्यक्रम (Curriculum):
परम्परागत विषयों की निर्धारित सीमाएँ भ्रामक हैं। ज्ञान एक है, सम्पूर्ण सामाजिक जीवन की एकता विषयों की एकता में परिलक्षित होनी चाहिए। लचीले पाठ्यक्रम द्वारा ही बालक समाज की सदस्यता प्राप्त कर सकता है। डॉ. अदाबाल ने उदाहरण दिया है कि डीवी के विचार से प्रारंभिक विद्यालय का आधार बालक की चार अभिरुचियाँ (भाव-विनिमय, सबाद, जिज्ञासा, रचना तथा सौंदर्यभिव्यक्ति) ही होनी चाहिए।
अतः पाठ्यक्रम में पठन, लेखन, गणना, हस्तकार्य तथा चित्र कला का समावेश होना चाहिए। शैक्षिक अनुभवों तथा समस्याओं से पाठ्यक्रम पूरा होना चाहिए। बालकों द्वारा पूर्व अर्जित ज्ञान भविष्य के ज्ञानार्जन के लिए आधाररूप होना चाहिए। पाठ्यक्रम बालकों के वर्तमान अनुभवों पर ही निश्चित करना ठीक होगा। विभिन्न विषयों में समन्वय होना चाहिए। मनोविज्ञान के आधार पर विभिन्न विषयों की सूची भ्रामक है।
शिक्षण विधि (Method of Teaching):
'करके सीखना' (Learning by Doing) पद्धति के अनुसार एक क्रिया का बालक की अभिरूचि के अनुसार तथा उपयोगिता के आधार पर चुनाव होता है, वह क्रिया से संबंधित कुछ विषयों का ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। बुनियादी शिक्षा प्रणाली तथा योजना पद्धति (जिसका पहले कोई नाम न था) मूलतः एक ही विचार से प्रेरित है। ये पद्धति बालक में आत्म-विश्वास, आत्मनिर्भरता तथा मौलिकता के विकास में सहायक होती है।
प्रो. चार्ल्स हार्डी के अनुसार योजना पद्धति की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. जो काम बच्चे को करना है, उसका सुझाव वह स्वयं रखे।
2 उन्हें केवल वही कार्य करने देना चाहिए जिनसे उत्तम चित्तवृत्तियों का निर्माण हो।
3. इन कार्यों की पूर्ति के लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता हो उस जान को देना चाहिए।
4. बच्चे के समस्त कार्यों में सहायता व पथ-प्रदर्शन की आवश्यकता है जिससे वे आगामी अनुभवों की अभिवृद्धि कर सकें।
अनुशासन (Discipline)
समाजोन्मुखी शिक्षा में बच्चे के सहयोग तथा स्कूल के कार्यों द्वारा उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करके हम उसमें आज्ञापालन अनुशासन, नियम आदि आवश्यक बातों को उसके चरित्र निर्माण का अंग बना सकते हैं। सहयोग तथा रुचि पर आधारित शिक्षा में अनुशासन के भंग होने की आशंका सम्भव नहीं है। बल का प्रयोग अनुशासन की व्यवस्था में अनुचित है। वैयक्तिक पक्ष को वह सामाजिक पक्ष के सन्मुख झुकाकर अनुशासन की समस्या हल कर देता है। प्रजातंत्र में सहयोग आत्मनिर्भरता, समता इत्यादि की उन्नति होती है। लेविन तथा लिप्पिट (Kurt Lewin and Lippitt) के प्रयोगों द्वारा यह बात सिद्ध हो चुकी है। इसलिए ऐसे स्कूलों में जिनमें प्रजातांत्रिक समाज का प्रतिबिम्ब हो, इन गुणों का विकास तथा अनुशासन की स्थापना स्वाभाविक रूप से हो जाती है।
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