डीवी का शिक्षादर्शन - Dewey's Philosophy of Education
डीवी का शिक्षादर्शन - Dewey's Philosophy of Education
शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है, समाज से बाहर समाज के प्रति कर्तव्यों से अलग उसका कोई महत्व नहीं विद्यालय समाज की नकल स्कूल होना चाहिए, किंतु स्कूल समाज का वह रूप है, जहाँ आकस्मिक परिवर्तन नहीं होते। उसे हम एक विशेष प्रकार का समाज कह सकते हैं। स्कूल द्वारा ही विकास तथा रचनात्मकता दोनों ही बालक में आती हैं। सामाजिक कुशलता (Social Skills) की शिक्षा के लिए स्कूलों का जन्म हुआ है। नैतिक अनुशासन के स्थान पर शारीरिक अनुशासन थोपना अनुचित है बालक स्वयं को समाज का अंग मानकर अनुशासन भंग नहीं कर सकता।
बालक की प्रवृत्तियों को पहचानकर मनोविज्ञान की सहायता से उन्हें रचनात्मक कार्य में लगाना चाहिए। वास्तव में शिक्षा जीवन की क्रिया है, न कि किसी भविष्य के जीवन की तैयारी।
हरबर्ट के विपरीत डीवी रुचि तथा कार्यों को विभिन्न सामाजिक रूपों से ही संबंधित रखना चाहते हैं। हरबर्ट ने केवल बौद्धिक पक्ष पर ही बल दिया था पर डीबी उसके अतिरिक्त शारीरिक, सामाजिक आदि पक्षों पर बल देता है। दूसरी बात यह है कि वह शिक्षा पर कोई पूर्वनिर्धारित अपरिवर्तनशील सिद्धात लागू नहीं कर सकता। "शिक्षा को तो अनुभवों का अनवरत पुनर्निमाण समझना चाहिए। "शिक्षा का अपनों से दूर कोई भी महत्व नहीं, वह स्वयं अपना उद्देश्य है। "शिक्षा की प्रक्रिया तो सदैव ही पुनः संगठन तथा पुनः निर्माण पर आधारित और परिवर्तनशील है। शिक्षा पर बाहर के उद्देश्यों को थोपने का तात्पर्य होगा कि शिक्षा का बहुत बड़ा अर्थ समाप्त हो जाए शिक्षा को संकुचित आदशों से मुक्त कराने का श्रेय डीवी को जाता है। चूंकि जीवन में बालक को भाग लेना है अतः उसे ही सक्रिय तथा प्रगतिशील होना चाहिए। परीक्षा इसलिए नहीं लेनी है कि बाहरी अर्जित ज्ञान की सीमा परखनी है, वरन समाज हेतु योग्यता का अनुमान लगाना ही परीक्षा का मूलतः सिद्धांत है।
डीबी के अनुसार शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बालक को उचित अवसर दे ताकि वह प्रगति तथा विकास की और अग्रसर हो सका स्कूल वर्तमान जीवन के लिए है, न कि किसी भविष्य के जीवन की तैयारी हेतु सामाजिक कुशलता का उद्देश्य डीवी ने निर्धारित नहीं किया, वह तो उसके विचार से स्वयं ही पूरा हो जाता है। परंपरागत स्कूल समाज के अंग नहीं हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है स्कूल समाज के है तो स्कूल को समाज का प्रतिबिम्ब होना चाहिए। स्कूल के द्वारा ही बालक को सामाजिक आवश्यकताओं से परिचित कराया जा सकता है। प्रायः बाहरी सूत्रों से प्राप्त सत्य स्कूलों पर लाटा जाता रहा है। इन दोनों बातों से डीवी का स्कूल दूर हो गया।
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