परम्परागत बजटन और शून्य आधार बजटन में अन्तर - Difference between traditional budgeting and zero base budgeting

परम्परागत बजटन और शून्य आधार बजटन में अन्तर - Difference between traditional budgeting and zero base budgeting


शून्य आधार बजटन निम्नलिखित बातों में परम्परागत बजटन से भिन्न है :


1. परम्परागत बजटन लेखोन्मुखी है। इसमें मुख्य बल व्यय के गत स्तर पर रहता है। शून्य आधार बजटन का दृष्टिकोण निर्णयोन्मुखी होता है।


2. परम्परागत बजटन में गत व्यय के संदर्भ में तथा नवीन कार्यक्रमों के लिए व्यय की राशि के विस्तार की मांग की जाती है। शून्य आधार बजटन नई या पुरानी सभी क्रियाओं के लिए शून्य से प्रारम्भ होता है।


3 परम्परागत बजटों में व्यय की राशियां दर्शाई जाती है।

विभिन्न बजटों में श्रेणीयन नहीं किया जाता है। शून्य आधार बजटन में विभिन्न निर्णय पैकेजों का लागत लाभ विश्लेषण किया जाता है तथा उनका उनकी महत्ता के अनुसार श्रेणीयन किया जाता है जिससे सर्वोच्च प्रबन्ध केवल प्राथमिकता वाले पैकेजों पर ही ध्यान दे सकते हैं।


4. परम्परागत बजटन में तैयार करते समय चालू क्रियाओं पर सामान्यतया पुनर्विचार नहीं किया जाता है जबकि शून्य आधार बजटन में मौजूदा कार्यक्रमों के नियोजन के लिये प्रत्येक बजट के वर्ष में व्यय का औचित्य बतलाना आवश्यक है।


5. परम्परागत बजटन में सर्वोच्च प्रबन्ध ही निर्णय लेता है

कि किसी विशेष निर्णय इकाई पर क्यों एक विशेष राशि व्यय की जानी चाहिये जबकि शून्य आधार बजटन में यह उत्तरदायित्व सर्वोच्च प्रबन्ध से शिफ्ट होकर निर्णय इकाई के प्रबन्ध को चला जाता है।


6. परम्परागत बजटन बजट तैयार करने में नैत्यिक दृष्टिकोण रखता है जबकि शून्य आधार बजटन का दृष्टिकोण बड़ा ही स्पष्ट और सीधा है। इसमें प्राथमिकता वाले निर्णय पैकेजों की पहचान स्पष्ट नहीं है।


7. परम्परागत बजटन में वस्तुनिष्ठता का अभाव रहता है तथा व्यय के सम्बन्ध में पूर्व स चली आ रही अकुशलता का क्षेत्र बना रहता है। शून्य आधार बजटन में प्रत्येक बजट प्रस्ताव का वस्तुनिष्ठ और तार्किक विश्लेषण किया जाता है।