विवाह के भेद - differences of marriage

विवाह के भेद - differences of marriage


भारत में बड़ी संख्या में अंतर्विवाही जातियाँ, आदिवासी समुदाय और धार्मिक समुदाय पाए जाते हैं। जो अलग-अलग तरह के विवाह पद्धति को अपनाते हैं। भाई-बहन, माता-पुत्र, पिता-पुत्री में विवाह पर निषेध प्रायः सार्वभौम है। आदिवासी समुदायों में प्रायः अपने गोत्र और टोटम समूह के अंदर विवाह नहीं होता। गोत्र और टोटम समूह के स्तर पर वे बहिर्विवाह ( Exogamy) का पालन करते हैं। परंतु जनजातीय स्तर पर अंतर्विवाह (Endogamy) का प्रचलन है।


लुशाई, कूकी आदिवासी समुदायों में गोत्र के आधार पर बहिर्विवाह-संबंधी निषेध नहीं होता है। इसके विपरीत खासी समुदाय में इस नियम का कड़ाई से पालन किया जाता है। भील समुदाय क्षेत्रीय ईकाइयों में बँटे होते हैं, जिन्हें पाल कहते हैं, इसी आधार पर पाल-बहिर्विवाह के नियम का पालन किया जाता है।


बहुत से आदिवासी समुदायों में ममेरे- फुफेरे भाई बहनों के विवाह (cross-cousin marriages) को प्राथमिकता दी जाती थी। इस प्रकार के विवाह को कुछ विद्वानों ने देखभाल और व्यवहार के लिहाज से स्त्री के लिए लाभदायक बताया है। इसमें ऊँचे वधू मूल्य से भी बचाव होता है और परिवार की संपत्ति भी एकजुट रहती है। गोडों में इस प्रकार के विवाह को 'दूध लौटावा' कहते हैं, जिसका अर्थ है कि एक गोंड ने अपनी पत्नी के लिए जो वधु-मूल्य दिया था वह उसके परिवार में फिर उस समय वापस लौट आता है जब उसकी लड़की की शादी उसकी स्त्री के भाई के बेटे (लड़की के मामा के बेटे) से होती है। अर्थात इस प्रकार के विवाह से एक परिवार जिस परिवार से अपने लड़के के लिए लड़की लेता है, उसे फिर अपनी लड़की दे देता है। खरिया, ओरावं, खासी, कादर आदि जनजातियों में भी इस प्रकार के विवाह का प्रचलन है।


अपनी सांस्कृतिक-पारिस्थितिक स्थिति के हिसाब से भारत के आदिवासी समुदायों में एकल-विवाह और बहु-विवाह का प्रचलन है।

एकल-विवाह (Monogamy): इस प्रकार के विवाह में एक स्त्री केवल एक ही पुरुष के साथ विवाह कर सकती है और अपने इस पति के जीवित रहते वह दूसरा विवाह नहीं कर सकती। भारतीय जनजातियों में एकल-विवाह का प्रचलन आम बात है। असम की खासी, बिहार के संथाल, मध्यप्रदेश के कमार और केरल की कादर जनजातियों में एकल-विवाह का ही व्यवहार है। जो जनजाति में अत्यधिक वधु मूल्य ( bride-price) के कारण वहाँ एक पुरुष के लिए एक से अधिक स्त्री से विवाह करना असंभव हो जाता है इस कारण से भी वे एक तरह से एकल-विवाही होते हैं।


ज़्यादातर एकल-विवाही जनजातियों में पति की मृत्यु के बाद एक स्त्री को अपने पति के भाई से विवाह कर लेने का सामाजिक नियम है और इसे उपयुक्त भी माना जाता है पर व्यवहार में इसका अंतिम निर्णय स्त्री का ही होता है और वह ऐसे विवाह से इनकार भी कर सकती है। इसी प्रकार उन आदिवासी समुदायों में जिनमें वधु-मूल्य प्रथा है, पत्नी की मृत्यु के बाद या जब उस स्त्री के कोई संतान होने की संभावना नहीं होती तो उस स्त्री के माता-पिता का यह कर्तव्य होता है कि या वे तो वह वधूमूल्य वापस कर दे या फिर उस स्त्री की छोटी बहन को दामाद के घर दूसरी पत्नी बना कर भेज दे। 


बहु- हु-विवाह (polygamy): इस प्रकार के विवाह में एक स्त्री / पुरुष एक से अधिक पुरुष / स्त्री से विवाह करते हैं। जब एक स्त्री का विवाह एक से अधिक पुरूषों के साथ होता है तो इसे बहु-पति (polyandry) विवाह कहते हैं। भारत में इस प्रकार के विवाह का प्रचलन कुछ आदिवासी समुदायों में हैं। देहरादून के खस एवं नीलगीरी की पहाड़ियों पर रहने वाले टोडा समुदायों में इसका प्रचलन है। कुछ विद्वानों का मानना है कि बहु पति विवाह का प्रचलन उन समाजों में शादी योग्य स्त्रियों की संख्या में कमी के कारण है। वहीं कुछ विद्वानों का मानना है कि इस प्रथा का एकमात्र कारण स्त्रियों की कमी नहीं है क्योंकि तिब्बत, लद्दाख, सिक्किम आदि प्रदेशों में स्त्री-पुरुष की संख्या में कोई विशेष अंतर नहीं है और वहाँ भी बहु-पति विवाह का प्रचलन है। अधिकतर विद्वान इस प्रथा का कारण इन प्रदेशों में आर्थिक जीवन का कठोर एवं संघर्षपूर्ण होना मानते हैं। संयुक्त परिवार एवं सम्मिलित श्रम के बिना इन प्रदेशों में जीविका निर्वाह करना लगभग असंभव है।


बहु-पत्नी विवाह (polygyny): एक पुरुष का एक से अधिक स्त्रियों से विवाह बहु-पत्नी विवाह है। यह प्रथा नगा, गोंड, बैगा, टोडा, लुसाई, भील आदि आदिवासी समुदायों में प्रचलित है। कुछ विद्वानों का मत है कि इस प्रथा के प्रचलन का मुख्य कारण आर्थिक है। पहाड़ी एवं पठारी भागों में जीवन निर्वाह हेतु आदिवासी लोगों को कठोर परिश्रम करना पड़ता है, जिसके लिए अधिक लोगों की आवश्यकता होती है।

वहीं दूसरी तरफ, कुछ विद्वान मानते हैं कि भील, नगा आदि समुदायों में एक से अधिक पत्नी रखना संपन्नता और समृद्धि द का प्रतीक माना जाता है इसलिए वहाँ बहु-पत्नी विवाह का प्रचलन है। कारण चाहे जो भी हो बहु-विवाह में स्त्रियों की स्थिति पर विपरीत असर पड़ता है। जहाँ बहु-पति विवाह प्रथा में स्त्रियों में गुप्त रोगों के होने का खतरा अधिक हो जाता है वहीं बहु-पत्नी विवाह प्रथा में परिवार पर आर्थिक बोझ बहुत बढ़ जाता है और स्त्रियों की स्थिति भी अत्यधिक गिर जाती है।