विकास के विभिन्न पक्ष - different aspects of development

विकास के विभिन्न पक्ष - different aspects of development


मानव की वृद्धि और विकास बचपन से मृत्युतक चलता रहता है जबकि बच्चे की वृद्धि एक समय के बाद रुक जाती है, लेकिन विकास निरंतर चलता रहता है। इनमें से बहुत से ऐसे परिवर्तन है जो आसानी से दिखाई नहीं देते हैं। ये दोनों तरह के परिवर्तन हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। विकास के प्रमुख आयाम निम्निलिखित हैं।

1) शारीरिक एवं गतिक-विकास (Physical and Motor Development)


2) मानसिक, बौद्धिक अथवा संज्ञानात्मक वकास (Mental, Intellectual or cognitive Development)


3) सामाजिक विकास (social Development )


(4) संवेगात्मक विकास (Emotional Development)


(5) भाषिक विकास (Language Development )


6) नैतिक या चारित्रिक विकास (Moral or Character Development)


7) सौन्दर्यात्मक विकास (Aesthetic Development)


1) शारीरिक एवं गतिक विकास (Physical and Motor Development )


शारीरिक विकास जन्म के पूर्व से ही शुरू होता है। इसके अंतर्गत शरीर में विविध प्रकार के परिवर्तन आते हैं। जन्म के बाद बच्चे कि मोटाई, ऊंचाई, भार इत्यादि में शरीर के बाहय ढाँचे और आन्तरिक अवयवों में कुछ न कुछ परिवर्तन आते रहते हैं यह विकास बहुत आसानी से अनुभव किया जाता है और दिखाई देता है। 


2) मानसिक, बौद्धिक एवं संज्ञानात्मक विकास (Mental, Intellectual or cognitive Development)


मानसिक विकास मानसिक क्रियाओं तथा क्षमताओं से संबंधित है। बौद्धिक और मानसिक विकास ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत आयु तथा अनुभव में वृद्धि होने के साथ-साथ व्यक्ति के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के विकास भी योगदान होता है। मानसिक क्षमताएँ अनेक प्रकार की होती हैं। उनमें निम्निलिखित होती हैं- 


• विचार शक्ति (Power of Thinking)


• स्मरण शक्ति (Power of Memorization)


• तर्क शक्ति (Power of Reasoning)


• निरीक्षण शक्ति (Power of Observation)


• संवेदना शक्ति (Power of Sensation) 


• प्रत्यक्षीकरण (Power of Perception)


• कल्पना शक्ति (Power of Imagination)


• सामान्यीकरण शक्ति (Power of Generalization )


• निर्णय शक्ति (Power of Judgement)


• विभेदीकरण की शक्ति (Power of Discrimination)


• समस्या समाधान योग्यता (Problem solving ability )


• संप्रत्यय योग्यता (Conceptual ability)


• सामाजिक विकास (Social Development)


सामाजिक विकास परिवार के सदस्यों और उससे बाहर के लोगों के साथ अंतःक्रिया के साथ शुरू होता है। जन्म के समय बच्चे जैविक प्राणी होते हैं और समाज में आ कर वह सामाजिक प्राणी बन जाते हैं। समाज में रहन सहन सीखना, लोगों से संचार करना सामाजिक विकास का प्रमुख भाग होता है। सामाजिक विकास से अभिप्राय सामाजिक संबंधों में परिपक्वता से है।


संवेगात्मक विकास (Emotional Development )


आस-पास परिसर से आए अनुभव, व्यवहार सम्बंधी अन्य गुण, आदतों आदि के साथ-साथ सुखदुःखप्रेम, घृणा, क्रोध आदि संवेगों का विकास व्यक्ति में धीरे-धीरे होता है। संवेगों को दो भागों में रखा गया है सकारात्मक संवेग और नकारात्मक संवेग।


भय, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आदि नकारात्मक संवेग है जबकि प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, हर्ष, प्रसन्नता, सृजनात्मकता आदि सकारात्मक संवेग है। संवेगों का विकास मानव व्यवहार के बोधात्मक पक्ष से अधिक घनिष्टता से जुड़ा होता है। बच्चे के ज्ञान और अनुभव में जैसे-जैसे वृद्धि होती है संबंगिक बुद्धि का भी विकास होता है।


भाषिक विकास (Language Development)


जन्म से ही बच्चा अपने परिसर से भाषा का ज्ञान प्राप्त करता है। आयु और अनुभवों में वृद्धि होने के साथ-साथ भाषिक विकास तीव्र होता है। शब्द सीखना बाक्यों को सीखना, भाषा के विभिन्न रूपों को अर्जित करना भाषा विकास का विषय है। बच्चे चीजों को स्मरण रखने के बाद प्रतीकों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने लगते हैं। अनुमान है कि बच्चों में डेढ़ वर्ष से 5 वर्ष की आयु के बीच भाषा अर्जन की गति सबसे तीव्र होती है।


नैतिक या चारित्रिक विकास (Moral or Character Development )


नैतिक विकास बच्चों को सही गलत का अंतर करने से जुड़ा है। सामाजिक प्राणी होने के कारण हमें समाज के मानदंडों के साथ रहना पड़ता है। इसलिये समाज में प्रचलित आदर्श और मूल्यों को अपनाना आवश्यक है। उम्र और अनुभव के साथ-साथ बच्चे का नैतिक और चारित्रिक विकास होता है। उसमें समता, परोपकार और नैतिकता का विकास होता है।


सौंदर्यात्मक विकास (Aesthetic Development )


सौंदर्यात्मक विकास में रुचि और अभिरुचि के अनुसार सौनन्दर्यात्मक बोध तथा कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास भी सम्मिलित है।


शिक्षक के लिये वृद्धी और विकास के ज्ञान का महत्व 


शिक्षक बच्चे की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षा तथा शिक्षक का उद्देश्य ही शिक्षार्थी का सर्वागीण विकास करना होता है, इसीलिये शिक्षक को विकास के विविध पहलुओं के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। हर एक बच्चा विशिष्ट होता है। इसलिये बच्चों का मनोबिज्ञान समझने के लिये शिक्षक को इन सब की जानकारी होनी चाहिये। शिक्षकों को विद्यालय का पाठयक्रम तथा अन्य शैक्षिक कार्यक्रम शिक्षार्थी के विकास के पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्मित किया जाना चाहिए। पाठ्येतर कार्यक्रमों का संचालन, परीक्षा पद्धति, मापन-मूल्यांकन करते समय विकास के पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इससे शिक्षक को हर एक विदयार्थी की तरफ प्यान रखना आसान हो जायेगा और उसका सर्वागीणविकास करते समय वह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण रख सकता है।