अनुदेशन प्रारूप या व्यवस्था के विभिन्न भाग - different parts of instructional format
अनुदेशन प्रारूप या व्यवस्था के विभिन्न भाग - different parts of instructional format
निवेश ( input): इसमें विद्यार्थियों का प्रारंभिक व्यवहार ज्ञात किया जाता है। इसमें विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान पर विचार किया जाता है।
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया (Teaching Learning Process) : इसमें शिक्षण परिस्थितियों के निर्माण, शिक्षण युक्तियों, सहायक सामग्री एवं संप्रेषण युक्तियों तथा अभिप्रेरणा एवं पुनर्बलन प्रविधियों के चयन तथा प्रयोग को सम्मिलित किया जाता है।
निर्गत (Output) : इसमें विद्यार्थियों के अंतिम निर्गत व्यवहार का मूल्यांकन किया जाता है।
तंत्र उपागम के अनुसार शैक्षिक तकनीकी शैक्षिक प्रशासन एवं अनुदेशन व्यवस्था के तीनों पक्षों के विकास के लिए युक्तियों व साधनों का विज्ञान है
, जिससे उपयुक्त प्रशासन योजना तथा अनुदेशन प्रारूप का निर्माण किया जा सके। यह कठोर तथा मृदु दोनों शिल्प उपागमों को व्यवहार में लाता है। यह 'शिक्षा में तकनीकी' एवं 'शिक्षा की तकनीकी' का गठजोड़ है।
तंत्र प्रणाली की प्रक्रिया के अंतर्गत निम्नलिखित तत्व सम्मिलित होते हैं-
1. उद्देश्यों का निर्धारण (Determination of Objectives)
इसके अंतर्गत सर्वप्रथम उद्देश्यों का विश्लेषण किया जाता है जिसमें पाठ्यवस्तु को देखते हुए यह तय किया जाता है कि इसके अध्ययन के क्या ध्येय होने चाहिए? इसके उपरान्त यह निर्धारित किया जाता है कि शिक्षार्थी सीखने के किस स्तर तक पहुँच सकते हैं?
उद्देश्यों के विश्लेषण के पश्चात विद्यार्थियों की अभिरुचि, क्षमता, पूर्वज्ञान तथा कौशल का वर्णन किया जाता है। इसके पश्चात उद्देश्यों का विशिष्टीकरण किया जाता है, जिसमें शिक्षण उद्देश्यों को व्यावहारिक पक्ष में लिखा जाता है ताकि इनका आसानी से मूल्यांकन किया जा सके। अंततः यह पता लगाने के लिए कि उद्देश्यों की पूर्ति किस सीमा तक हुई है, कसौटी परीक्षण की रचना की जाती है।
2. अधिगम अनुभवों का प्रारूप (Design of Learning Experiences )
यह तय किया जाता है कि प्रत्येक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्या अधिगम क्रियाएँ की जानी चाहिए तथा इन क्रियाओं का क्रम क्या होगा? अनुकूल शिक्षण परिस्थितियों की रूपरेखा तैयार की जाती है। विद्यार्थियों को अधिगम की संरचना में समुचित सहायता प्रदान की जाती है। उद्देश्यों के अनुरूप शिक्षण युक्तियों तथा शिक्षण सामग्री का चयन किया जाता है।
संप्रेषण प्रविधियों तथा साधनों का चयन भी किया जाता है। इसके अलावा अभिप्रेरणा एवं प्रबलन की युक्तियों पर भी निर्णय लिया जाता है।
3. उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिगम अनुभवों का मूल्यांकन (Evaluation of Learning Experiences)
यह जाँच किया जाता है कि निर्धारित अधिगम अनुभव उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रभावशाली है या नहीं। विद्यार्थियों को अधिगम अनुभव में संलग्न किया जाता है तथा कसौटी परीक्षण के जरिये यह पता लागाया जाता है कि विद्यार्थियों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन किस सीमा तक हुई है। कौन से उद्देश्य प्राप्त कर लिए गए हैं तथा कौन-से उद्देश्य अभी प्राप्त नहीं हो पाए हैं।
4. मूल्यांकन के सन्दर्भ में अधिगम अनुभवों में सुधार ( Improvement in Learning Experiences):
मूल्यांकन द्वारा प्राप्त परिणामों के आधार पर अधिगम अनुभवों को परिवर्धित किया जाता है तथा इनका पुनः प्रयोग कर मूल्यांकन किया जाता है। इसके द्वारा पाठ्यक्रम के गुण एवं दोषों का भी पता चलता है तथा तदनुसार इसमें आवश्यक संशोधन किया जाता है।
तंत्र उपागम का उपयोग शैक्षिक प्रशासन संबंधी समस्याओं के समाधान में नवीन शैक्षिक व्यवस्था के निर्माण में, अनुदेशन व्यवस्था एवं परीक्षा प्रणाली के सुधार में तथा पाठ्यक्रम के संशोधन में किया जाता है साथ-ही-साथ इसे निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण तथा मूल्यांकन युक्तियों के विकास हेतु भी व्यवहार में लाया जाता है।
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