राष्ट्रीय विकास में निर्देशन - direction in national development
राष्ट्रीय विकास में निर्देशन - direction in national development
निर्देशन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि [Historical Background of Guidance]
जब से मानव सभ्यता का उदय हुआ है, मानव को जीवन यापन करने के लिए निर्देशन मिला ही है। जीवन में निर्देशन का स्थान महत्वपूर्ण है । प्राचीन सभ्यताओं में निर्देशन के तरीके अलग-अलग थे। वर्तमान समय में ये अलग-अलग है अतः निर्देशन के विकास क्रम को निम्नलिखित चरणों में समझने का प्रयास करेंगे।
1 प्राचीन भारत में निर्देशन :- प्राचीनकाल में वर्ण-व्यवस्था का बोलबाला था तथा शिक्षा समाप्त होने के पश्चात् गुरू अपने दीक्षान्त उपदेश में जीवन की सफलता के लिए आवश्यक उपदेश देते थे ऐसा ही एक उपदेश "तैत्रिरीय उपनिषद" में मिलता है जिसके मुख्य अंश का भाव है- सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय से प्रमाद मत करो, अपने व्यवसाय से सम्बन्धित अध्ययन से प्रमाद मत करो।
अब तुमने अपनी शिक्षा पूरी कर ली है किन्तुयह मत समझना कि आगे अध्ययन की क्या आवश्यकता है अत: अपनी दक्षता में वृद्धि करते जाओ। यही शिक्षा है, यही आदेश है, वेद, उपनिषद् भी यही कहते हैं।
2 प्राचीन यूनान में निर्देशन :- यूनान में निर्देशन का प्रारम्भ प्लेटो से माना जाता है। प्लेटो ऐसे समाज के निर्माण में प्रयत्नशील थे जहाँ सृजनात्मक ढंग से कार्य की व्यवस्था हो। यह सब, स्वाभाविक ही निर्देशन व्यवस्था की अपेक्षा रखता है और प्लेटो ने शिक्षा में निर्देशन को महत्वपूर्ण स्थान दिया ।
प्लेटो के अनुयायियों तथा बाद में यूनानी विचारकों ने भी किसी न किसी रूप में निर्देशन की ओर ध्यान दिया ।
ये विचारक शिक्षा के बौद्धिक एवं सामाजिक दोनों ही पक्षों पर समुचित बल देते थे शिक्षा की व्यवस्था समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप की जाती थी। फलतः अप्रत्यक्ष रूप से निर्देशन की सहायता इस उद्देश्य को प्राप्त करने में ली जाती थी। अरस्तू ने भी शिक्षा में निर्देशन को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। इस प्रकार प्लेटो से लेकर उसके अनुयायियों एवं उसके बाद के विचारकों ने यूनानी युवा पीढ़ी की शिक्षा की व्यवस्था करते हुए निर्देशन को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया ।
3 आधुनिक काल में निर्देशन :- निर्देशन का वर्तमान औपचारिक व सुगठित स्वरूप बीसवीं सदी की देन है। आधुनिक काल में निर्देशन का जन्मस्थान संयुक्तराज्य अमेरिका का बोस्टन नगर माना जाता है तथा फ्रेंक पारसन्स को व्यावसायिक निर्देशन का जन्मदाता माना जाता है
सन् 1905-1906 में पारसन्स ने ब्रेड विनर्स इंस्टीट्यूट की स्थापना की जिसके माध्यम से योजनाबद्ध ढंग से व्यावसायिक निर्देशन का काम प्रारम्भ हुआ। सन् 1908 में पारसन्स ने 'वोकेशन ब्यूरो की स्थापना की तथा निर्देशकों के समक्ष प्रथम बार 'व्यावसायिक निर्देशन' शब्द का प्रयोग किया। बाद में वोकेशनल ब्यूरो को हार्वर्ड विश्वविद्यालय का व्यावसायिक निर्देशन ब्यूरो बना दिया गया। सन् 1910 के बाद अमेरिका में 'राष्ट्रीय शिक्षा संघ' तथा 'औद्योगिक शिक्षा विकास समिति' आदि संस्थानों ने निर्देशन आन्दोलन में अपना ठोस योगदान दिया । प्रथम विश्वयुद्ध में निर्देशन आन्दोलन का तेजी से विकास हुआ जब युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप सैनिकों तथा अन्य अधिकारियों के वैज्ञानिक ढंग से चुनाव तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता का अनुभव किया गया ।
पारसन्स शिक्षा के क्षेत्र में भी निर्देशन के महत्व को स्वीकार करते थे। उनके देहान्त के बाद उनके द्वारा स्थापित ब्यूरो का कार्यभार डेविस एच. हीलर, फ्रेडरिक एच. एलेन तथा मेयर ब्लूम फील्ड ने संभाला। इनके द्वारा विद्यालयी शिक्षकों को प्रशिक्षित करने पर बल दिया गया।
• इंग्लैण्ड में निर्देशन कार्य का विकास :- इंग्लैण्ड में निर्देशन का विकास 18 वीं शताब्दी में हुआ जब श्रम मंत्रालय ने राष्ट्रीय रोजगार कार्यालयों में निर्देशन कार्य प्रारम्भ किया। इंग्लैण्ड में निर्देशन के विकास का सूत्रपात सैमुअल हार्टलिव के द्वारा किया गया। जॉन मिल्टन, विलियम पेटी, जॉन ड्यूवी आदि का भी योगदान इस दिशा में उल्लेखनीय है। वास्तव में इन विचारकों ने निर्देशन की नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इन विचारकों के गम्भीर प्रयत्नों के फलस्वरूप ही इंग्लैण्ड की स्थानीय संस्थाओं तथा तात्कालिक सरकारों में निर्देशन सेवाओं का स्पष्ट रूप उभरा। सन् 1944 में इंग्लैण्ड सरकार द्वारा पारित एक कानून के आधार पर ही निर्णय लिया गया कि निर्देशन का व्यापक स्तर पर प्रयोग जरूरी कर दिया जाये
फ्रांस में निर्देशन का विकास :- सर्वप्रथम 1922 में एक सरकारी निर्णय के अनुसार फ्रांस में निर्देशन को में आवश्यक घोषित किया गया तथा इस क्रम में व्यावसायिक निर्देशन कार्यालय स्थापित किए गए । सन् 1928 में शिक्षा मंत्रालय के अधीन व्यावसायिक निर्देशन संस्थान' की स्थापना की गई। इस संस्थान ने देश के निर्देशनकर्ताओं तथा परामर्शदाताओं को प्रशिक्षित करने का कार्य प्रारम्भ किया। स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी व्यावसायिक निर्देशन हेतु अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर पेरिस में 'चैम्बर ऑफ कामर्स' की स्थापना की गई जो उन बालकों की सहायता देने का कार्य करता था जो विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही किसी व्यवसाय में लगना चाहते थे। वहां निर्देशन सेवा का संचालन एवं नियंत्रण वर्तमान में श्रम एवं शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों के अधार पर किया जाता है ।
• जर्मनी में निर्देशन का विकास :- प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् जर्मनी में स्वयंसेवी संस्थाओं ने अपना व्यापक सहयोग व्यावसायिक निर्देशन के विकास में दिया।
1900 ई. के आस-पास वहाँ व्यवसाय चुनने की इच्छुक महिलाओं के लिए विशेष सूचना केन्द्रों की स्थापना तथा प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् सरकार द्वारा एक 'राष्ट्रीय सार्वजनिक निर्देशन संस्थान' की स्थापना की गई। जिसका क्षेत्र निर्देशन संस्थान व्यावसायिक निर्देशन तक ही सीमित रखा गया था।
जर्मनी में 1927 में एक कानून पारित हुआ जिसके आधार पर देश के बेरोजगार लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा व्यावसायिक निर्देशन का उत्तरदायित्व सरकार ने अपने ऊपर ले लिया । अधिकांश नगरों में व्यावसायिक निर्देशन कार्यालयों की स्थापना की गई तथा इनके द्वारा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का भी प्रयोग किया जाने लगा तथा सन् 1933 तक निर्देशन का विकास विस्तृत हो गया । फ्रेंकफर्ट में 'राष्ट्रीय संस्थान' की स्थापना हुई तथा मूल्यांकन की नूतन पद्धतियों व परीक्षणों के आधार पर सूचनाएँ प्रदान करने हेतु अनेक व्यावहारिक प्रयास किए गए।
• आधुनिक भारत में निर्देशन का विकास :- भारत में निर्देशन आन्दोलन का प्रारम्भ 20 वीं सदी के चतुर्थ दशक में हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त इसकी आवश्यकता अधिक अनुभव की गई तथा इस ओर शिक्षा संस्थाओं व विशेषकर विश्वविद्यालयों ने निर्देशन ब्यूरो के संगठन में विशेष भूमिका अदा की। भारत को निर्देशन से परिचित कराने का श्रेय भी श्री सोहनलाल एवं श्री के. जी. सैयदेन को है। भारत में 1938 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग जिसके अध्यक्ष श्री जी.एस. बोस थे - ने में निर्देशन कार्य प्रारम्भ किया। मुम्बई में भी व्यावसायिक निर्देशन सम्बन्धी एक शाखा रिटायर्ड सी. ए. श्री बाटलीबॉय के प्रयत्न से 1941 में खोली गई। जालंधर में संयुक्तईसाई मिशन, बम्बई में रोटरी क्लब तथा वाई. एम. सी. ए. कलकत्ता ने इस सम्बन्ध में कई पुस्तकें प्रकाशित कीं ।
सन् 1947 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में मनोविज्ञान ब्यूरो की स्थापना आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में की गई जिसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश की माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा के साथ निर्देशन का भी प्रावधान करना था ।
इसके साथ ही साथ भारत में विभिन्न प्रान्तों में व्यावसायिक सूचनाओं के एकत्रीकरण, वितरण तथा मानव मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण के उद्देश्य से निर्देशन ब्यूरो स्थापित किए गए। पटना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक शोध संस्थान ने विभिन्न शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों में निर्देशन सेवाओं के संगठन में अपना योगदान दिया।
सन् 1952-53 में मुदालियर आयोग (माध्यमिक शिक्षा आयोग) ने निर्देशन को महत्वपूर्ण समझा तथा इससे सम्बन्धित सुझाव भी अपनी रिपोर्ट में दिए-
1. शिक्षा निर्देशन में शिक्षा अधिकारियों के कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जाए।
2. सभी शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित निर्देशन कार्यकर्ताओं एवं कैरियर मास्टर्स की नियुक्ति की जाए।
3. केन्द्र द्वारा समस्त राज्यों में प्रशिक्षण केन्द्र खोलने चाहिए जहाँ निर्देशनकर्ता उत्तम प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। खत चाहिए जहाँ निर्देश माध्यमिक शिक्षा आयोग के द्वारा दिए गए उक्त सुझावों के आधार पर 'केन्द्रीय मंत्रालय' ने 'केन्द्रीय शिक्षा तथा व्यावसायिक ब्यूरो' की स्थापना कर निर्देशन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए।
सन् 1954 में दिल्ली में 'केन्द्रीय शिक्षा तथा व्यावसायिक ब्यूरो' की स्थापना की गई सन् 1960 में 'अखिल भारतीय निर्देशन कार्यालय भवन' की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य देश की माध्यमिक शिक्षा की प्रगति को जाँचना तथा इस क्षेत्र से सम्बन्धित संस्थानों को प्रोत्साहन देना था
सन् 1961-62 में लखनऊ विश्वविद्यालय में 'शिक्षक परामर्शदाताओं' की योजना प्रारम्भ की गई तथा 'विश्वविद्यालय रोजगार ब्यूरो' की भी स्थापना टैगोर पुस्तकालय के एक भाग में की गई।
सन् 1964 में कोठारी आयोग की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष डॉ. दौलतसिंह कोठारी थे। इस आयोग ने भी निर्देशन को महत्वपूर्ण माना तथा इससे सम्बन्धित निम्नलिखित संस्तुतियाँ दीं।
1. निर्देशन को शिक्षा का एक अभिन्न अंग मानना चाहिए । निर्देशन छात्रों को घर तथा विद्यालयी परिस्थितियों में सर्वोत्तम संभावित समायोजन में भी सहायता प्रदान करे।
2. निर्देशन प्राथमिक कक्षा की सबसे छोटी इकाई से प्रारम्भ करना चाहिए।
3. प्राथमिक विद्यालय के अध्यापकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में उन्हें नैदानिक परीक्षणों एवं व्यक्तिगत विभिन्नताओं की समस्याओं से अवगत कराने का प्रावधान हो
4. यथासम्भव शिक्षकों हेतु 'लघु सेवा पाठ्यक्रम' की व्यवस्था की जाए।
5. माध्यमिक स्तरीय अध्यापकों के प्रशिक्षण में निर्देशन प्रत्ययों व तकनीकों को कार्यक्रम में शामिल किया जाए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 1986 में भी इस पक्ष पर विशेष बल दिया गया है। इसके पश्चात् राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, (2000), (2005) में भी उच्च माध्यमिक स्तर के छात्रों को विषय चुनकर किस धारा में प्रवेश लेना है इसके लिए विद्यालयों में कैरियर अध्यापक नियुक्त करने की बात की, परन्तु आज की निर्देशन के क्षेत्र में आशानुरूप कार्य नहीं हो पा रहा है। आज प्रत्येक क्षेत्र में जिस तीव्रता से विकास हो रहा है उसे देखते हुए विभिन्न प्रकार के निर्देशन की आवश्यकता तेजी से अनुभव की जा रही है।
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