अनुशासन - Discipline
अनुशासन - Discipline
अनुशासन से अभिप्राय है कि बालक विद्यालय के नियमों आदर्शों तथा परंपराओं का पालन करें।
अनुशासन की आवश्यकता -
१) अनुशासन से बालक का सर्वांगीण विकास होने में मदद मिलती है। २) अनुशासन से सभी बालको को अपने अधिकारों का उपयोग करने का अवसर प्राप्त होता है।
(३) अनुशासन के द्वारा ही बालक दूसरों के अधिकारों का आदर और अपने अधिकारों का सदुपयोग करना सीखता है।
४) अनुशासन के द्वारा ही विद्यालय में योजना, समय, विभाग तक, नियम आदि का व्यवस्थित ढंग से पालन कराया जा सकता है।
५) विद्यालय ही सामाजिक अनुशासन की नींव रखते है। समाज के प्रत्येक सदस्य को अनुशासित करने का कार्य विद्यालय का है।
६) समाज में अनुशासित व्यक्तियों की ओर हो सभी लोगों का ध्यान रहता है।
अनुशासन-शिक्षा के अभिकरण (Discipline Agency of Education)
अनुशासन की शिक्षा दो प्रकार से दी जाती है
१) औपचारिक (Formal) (२) अनौपचारिक (Informali
(१) अनौपचारिक (Informal)- अनुशासन की अनौपचारिक शिक्षा देने का कार्य परिवार एवम् सामाजिक संस्थाएं करती है।
२) औपचारिक (Formal) अनुशासन की औपचारिक शिक्षा देने का दायित्व विद्यालयों का है।
विद्यालयों में अनुशासनहीनता के कारण:
१) योग्य एवं आदर्श शिक्षकों का अभाव।
२) दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था।
(३) आर्थिक कठिनाईयाँ।
४) विद्यार्थियों एवं अध्यापको में निकट संपर्क का अभाव।
५) सह-शिक्षा।
(६) राजनैतिक दल और विद्यार्थी।
(७) अनुशासन संबंधी नियमों एवं आदर्श भावना का अभाव।
(८) अध्यापकों एवं अभिभावकों में संपर्क का अभाव।
९) अनुशासन संबंधी नियमों एवं आदशों का अभाव।
१०) अनुशासन के महत्व के प्रति अज्ञानता।
(११) विद्यालयों में विद्यार्थियों की अत्यधिक संख्या
१२) विद्यालयों का व्यावसायिक रुप
१४) उद्देश्यहीन शिक्षा
(१३) उचित पथ-प्रदर्शन का अभाव।
(१५) समाज में निम्न कोटि का नैतिक स्तर
१६) उपयुक्त पाठयक्रम एवं सहगामी क्रियाओं का अभाव।
१७) अन्य कारण
अनुशासनहीनता दूर करने के उपाय
१) अपराधी की अनुशासन हीनता की समस्या को मनोवैज्ञानिक ढंग से सुलझाना चाहिए।
२) प्रशिक्षित तथा अनुभवी शिक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिए।
३) अध्यापको की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उनका वेतन अधिक होना चाहिये।।
४) छात्रों के अभिभावकों से संपर्क कर उनके अनुभवों का आदर करते हुए उनमें विद्यालय के कार्यों के प्रति रुचि उत्पन्न करनी चाहिए।
(५) छात्रों में अनुशासन करने के लिए उन्हें कार्यों का उत्तरदायित्व सौपना चाहिए।
६) प्रधानाध्यापक को विद्यालय के प्रबंध में शिथिलता नहीं आने देनी चाहिए।
(७) छात्रों को रूचिकर कार्यों में व्यस्त रखने के लिये विद्यालय में विविध सहगामी क्रियाओं (Extra Curricular Activities) का संचालन नियमित तथा नियमों के आधार पर करना चाहिए।
८) अपराधी प्रवृत्ति के छात्रों की समस्याओं का मनोवैज्ञानिक ढंग से समाधान करना चाहिए।
९) विद्यालय को विविध पत्र-पत्रिकाएँ मंगवाना चाहिए और वाचनालय के नियमों का पालन अवश्य होना चाहिए। १०) प्रधानाध्यापक एवं अध्यापकों का व्यवहार छात्रों के प्रति निष्पक्ष एवं विवेकपूर्ण होना चाहिए।
११) बच्चों को प्यार से समझाकर सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
१२) विद्यालयों का छात्रों में नेतृत्व का गुण विकसित करना चाहिए।
१३) प्रधानाध्यापक एवं अध्यापकों के आदेश स्पष्ट एवं उद्देशपूर्ण हो।
१४) निर्देश व आदेश देते समय अध्यापक को संकेत से भी काम लेना चाहिए।
१५) अनुशासन के लिये छात्रों में भय का प्रयोग कम करना चाहिये।
१६) छात्रों में अनुशासन स्थापित करने के लिये उन पर विश्वास करना चाहिए।
१७) पुरस्कार देने से भी अनुशासन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
१८) बच्चों को उचित प्रशंसा भी कभी-कभी अनुशासन के लिये अच्छी होती है।
शारिरीक दण्ड (Corporal Punishment)
अनेक शिक्षा शास्त्रियों का मानना है कि बच्चों को शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिये क्योंकि छात्र शारीरिक दंड देने के कारण मानसिक रूप से कमजोर हो जाते है।
१) शारिरिक दण्ड एक पाशविक प्रवृत्ति है अतः मानवीय व्यवहारों में इसका कोई स्थान नहीं होना चाहिये।
परंतु कुछ लोग शारिरिक दण्ड का समर्थन भी करते है।
१) साधारणत: छात्र इतने गरीब एवं गन्दे वातावरण से विद्यालय में आते है जहाँ उन्हे बात-बात पर कठोर शारिरिक यातनाएँ दी जाती है। ऐसे छात्रों को कठोर शारीरीक
दण्ड दिये बिना समझ में नहीं आता क्योंकि वे उसके अभ्यस्त हो जाते है।
दण्ड देते समय ध्यान में रखने योग्य बाते
१) शारिरिक दण्ड के प्रयोग का अधिकार प्रधानाध्यापक के अधिकार में ही रहना चाहिये।
(२) शारिरिक दंड का प्रयोगअन्तिम विकल्प के रूप में ही करना चाहिए।
(३) अपराध और दण्ड देने के बीच के समय में अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए।
(४) दंड की कठोरता धीरे-धीरे ही बढ़ानी चाहिए।
५) अपराध के अनुपात में ही दण्ड दिया जाना चाहिए।
६) कोध में दण्ड नहीं देना चाहिए।
(७) दण्ड के विकल्प के रूप में प्रायश्चित की भावना होनी चाहीये।
८) दण्ड के पश्चात भी सुधार के लिये अन्य उपाय करते रहने चाहिए।
कथा में अनुशासन (Discipline in the class)
छात्र के कक्षा में अनुशासनहीनता के कुछ कारण हो सकते है जैस
१) हो सकता है कि बालक किसी विशेष घरेलू परिस्थितियों या घटना विशेष के कारण दुःखी हो। इसलिये कक्षा में ध्यानपूर्वक पढ़ने में मन न लग रहा हो।
अतः से स्वास्थ्य के तीन पक्ष है शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक शारीरिक स्वास्थ्य का सम्बन्ध व्यक्ति के शरिर है। मानसिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य का सम्बन्ध,समाज से है।
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