लोकतंत्र, नागरिकता और मानवाधिकार के विमर्श और सामाजिक विज्ञान शिक्षक के निहितार्थ - Discourse on democracy, citizenship and human rights and the implications of a social science teacher
लोकतंत्र, नागरिकता और मानवाधिकार के विमर्श और सामाजिक विज्ञान शिक्षक के निहितार्थ - Discourse on democracy, citizenship and human rights and the implications of a social science teacher
15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। 150 साल की गुलामी समाप्त होकर स्वतंत्रता का नया सूर्योदय हुआ। अब एक तरफ लोगों को अधिकार दिए गए तथा लोगों के उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही भी तय की गई। आदर्श राष्ट्र के निर्माण की जिम्मेदारी कंधो पर आई। आजादी के उपरांत भारत ने लोकतंत्र का स्वीकार किया। मानवाधिकार (सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक) प्रदान कर न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता आदि मूल्यों का निर्वाह करने वाले नागरिक का निर्माण करना राष्ट्र का प्रधान उद्देश्य रहा है। भारतीय नागरिकों को अपने अधिकार प्राप्ति के साथ कर्तव्यों का निर्वाह भी करना है। देशवासी जब सुयोग्य नागरिक बनेंगे तभी स्वाधीनता का सपना पूरा होगा। यह कार्य विदयालयों को सौंपा गया। शिक्षा का यह दायित्व बना कि विद्यालयों से सुयोग्य नागरिक बनकर छात्र बाहर निकले। समाज, देश, राष्ट्र, विश्व को उन्नति की ओर अग्रसर बनाने वाला सुयोग्य नागरिक का निर्माण विद्यालयों में हो। साम्प्रदायिकता, जातीयता, गरीबी, बेईमानी आदि को नष्ट करने के लिए नागरिकता की शिक्षा आवश्यक है। लोकतंत्र एवं मानवाधिकार की रक्षा सुयोग्य नागरिक कर सकता है।
प्रेम, अहिंसा, बंधुत्व आदि मूल्यों को वैश्विक बनाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वैश्विक शांति एवं अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव बनाये रखने में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस कार्य हेतु सुयोग्य, सुजान एवं उदार दृष्टिकोण वाले नागरिक की नितांत आवश्यकता है। यह कार्य सफलतापूर्वक शिक्षा द्वारा किया जा सकता है। शिक्षा के पुनर्निर्माण में भारतीय संविधान में अन्तर्निहित तत्वों के संस्करण में विशेष ज्ञान रखा गया। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए मानव को मूल अधिकारों की प्राप्ति, लोकतान्त्रिक शासनप्रणाली, सुयोग्य नागरिक के निर्माण के लिए योग्य वातावरण का महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा द्वारा इसकी पूर्णता की आवश्यकता है। भारत में स्वतंत्रता के उपरांत शिक्षा में सुधार हेतु विविध शिक्षा आयोग एवं समितियों का गठन किया गया। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है, "भारत ने अभी हाल में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की और उसने पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात स्वयं को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया। इसलिए शिक्षा द्वारा नागरिकों में ऐसी आदतों, अभिरुचियों और चारित्रिक गुणों का विकास किया जाए, जिससे वे लोकतंत्रीय नागरिकता के दायित्वों का भली प्रकार से निर्वाह कर सके और उन विघटनकारी प्रवृत्तियों को रोक सकें जो व्यापक राष्ट्रीय एवं धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण के विकास में बाधक है।”
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